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डीएम अस्मिता लाल की पहल से विरासत को मिला नया जीवन, बड़ी संख्या में उमड़े लोग

विश्व धरोहर दिवस पर बागपत ने रचा इतिहास: पहली हेरिटेज ट्रेल बनी ‘जीवंत विरासत महोत्सव’

खानपान, कला, संगीत और इतिहास का अनूठा संगम, अनुभव आधारित हेरिटेज मॉडल बना बागपत

नई पीढ़ी ने जाना अपना अतीत तो बुजुर्गों ने सुनाए किस्से, हेरिटेज ट्रेल बना पहचान का सेतु

महाभारतकालीन धरोहर से नवाबी विरासत तक: एक ट्रेल में समाया बागपत का इतिहास

बागपत, 18 अप्रैल 2026। सुबह की पहली किरण के साथ ही जनता वैदिक कॉलेज, बड़ौत परिसर में ऐसा उत्साह उमड़ा, मानो बागपत अपनी ही पहचान से मिलने निकल पड़ा हो। विश्व धरोहर दिवस के अवसर पर आयोजित जनपद की पहली “हेरिटेज ट्रेल” ने आज इतिहास रच दिया। बड़ी संख्या में लोग इस अनूठी पहल का हिस्सा बने और अपनी आंखों के सामने अपनी विरासत को जीवंत होते देखा। यह बागपत की आत्मा से जुड़ने का उत्सव था, जहां हर कदम पर इतिहास, हर कोने में संस्कृति और हर चेहरे पर गर्व नजर आया।

विश्व धरोहर दिवस के अवसर पर जनपद बागपत ने आज एक नया इतिहास रच दिया। जिले में पहली बार आयोजित “बागपत हेरिटेज ट्रेल” ने न केवल अतीत को जीवंत किया, बल्कि इसे एक जनआंदोलन का रूप दे दिया। सुबह से ही जनता वैदिक कॉलेज, बड़ौत में लोगों का जनसैलाब उमड़ पड़ा। युवा, विद्यार्थी, बुजुर्ग और परिवार—हर वर्ग के लोग अपनी विरासत को जानने और उसे महसूस करने के लिए उत्साह के साथ शामिल हुए। “Explore, Experience, Preserve” की थीम पर आधारित यह आयोजन एक सामान्य कार्यक्रम नहीं रहा, बल्कि बागपत की पहचान, उसकी खुशबू, उसके स्वाद और उसके सुरों से जुड़ने का एक अद्वितीय अवसर बन गया।

जनपद के इतिहास में यह पहली बार हुआ जब विरासत को केवल दिखाया नहीं गया, बल्कि उसे जीने का अवसर दिया गया। डीएम अस्मिता लाल के नेतृत्व में जिला प्रशासन और सेंटर फॉर हिस्टोरिक हाउसेज ऑफ इंडिया की संयुक्त पहल ने यह साबित कर दिया कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति और नवाचार से किसी भी जिले की पहचान को नई दिशा दी जा सकती है। डीएम स्वयं व्यवस्थाओं की लगातार निगरानी करती रहीं।

सुबह 10 बजे जनता वैदिक कॉलेज से शुरू हुई यह हेरिटेज ट्रेल दिनभर एक जीवंत सांस्कृतिक यात्रा में बदल गई। कॉलेज परिसर में पिएत्रा ड्यूरा, ब्लॉक प्रिंटिंग, पॉटरी और परफ्यूम निर्माण जैसी पारंपरिक कलाओं की कार्यशालाएं आयोजित की गईं। मिट्टी की खुशबू, रंगों की छटा और इत्र की सुगंध ने वातावरण को पूरी तरह विरासतमय बना दिया। बच्चों के सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने इस आयोजन में नई ऊर्जा भर दी, जहां नई पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ती नजर आई। भारतीय शास्त्रीय संगीत कार्यशाला में तबले और तानपुरे की धुनों ने पूरे वातावरण को सुरमय कर दिया। ऐसा लगा जैसे बागपत का इतिहास संगीत बनकर बह रहा हो। लोग केवल दर्शक नहीं रहे, बल्कि उस अनुभव का हिस्सा बन गए—यही इस आयोजन की सबसे बड़ी सफलता रही।

हेरिटेज ट्रेल के दौरान पारंपरिक कलाओं का जीवंत प्रदर्शन भी आकर्षण का केंद्र रहा। मिट्टी कला के चाक पर कारीगरों ने अपने हुनर का प्रदर्शन किया, तो वहीं कंबोडिया शैली से प्रेरित पत्थर डिजाइन, हैंडलूम बेडशीट्स, इत्र निर्माण और शास्त्रीय संगीत ने इस आयोजन को एक बहुआयामी सांस्कृतिक अनुभव में बदल दिया। प्रतिभागियों ने इन कलाओं को न केवल देखा, बल्कि उन्हें महसूस भी किया, जिससे यह आयोजन “देखो और सीखो” से आगे बढ़कर “जीओ और समझो” का अनुभव बन गया।

इस आयोजन ने यह साबित कर दिया कि विरासत केवल इमारतों में नहीं, बल्कि जीवन के हर पहलू में बसती है। स्थानीय खानपान, हस्तशिल्प, इत्र, संगीत और परंपराएं—सबने मिलकर इसे एक सम्पूर्ण सांस्कृतिक उत्सव बना दिया। इस ट्रेल की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि यह केवल भ्रमण तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसे अनुभव आधारित मॉडल के रूप में विकसित किया गया। जनता वैदिक कॉलेज से शुरू होकर डाक बंगले होते हुए खुर्शीद मंजिल तक की यह यात्रा समय के साथ एक संवाद बन गई। हर पड़ाव ने इतिहास के एक नए अध्याय को सामने रखा।

हेरिटेज ट्रेल के माध्यम से स्थानीय कलाकारों, कारीगरों और छोटे उद्यमियों को मंच मिला, जिससे उनकी कला और उत्पादों को पहचान मिली। इससे न केवल सांस्कृतिक संरक्षण को बल मिला, बल्कि रोजगार और आय के नए अवसर भी उत्पन्न हुए। जनपद प्रशासन ने इस आयोजन से पहले ही नागरिकों से अपील की थी कि वे बढ़-चढ़कर इसमें भाग लें और अपनी विरासत को समझने का प्रयास करें। इस अपील का व्यापक असर भी देखने को मिला, जहां बड़ी संख्या में लोगों ने स्वयं आगे आकर इस पहल को सफल बनाया।

बागपत की यह पहल उत्तर प्रदेश सरकार की उस सोच को साकार करती नजर आई, जिसमें “विकास भी, विरासत भी” को समान महत्व दिया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के “देखो अपना देश” के आह्वान और पंच प्रण में शामिल “विरासत पर गर्व” के संकल्प को जनपद ने जमीनी रूप देते हुए इसे “देखो अपना बागपत” के रूप में जीवंत कर दिया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में प्रदेश में जिस तरह सांस्कृतिक धरोहरों को पहचान दिलाने, पर्यटन को बढ़ावा देने और स्थानीय गौरव को पुनर्जीवित करने की दिशा में निरंतर प्रयास हो रहे हैं, उसी कड़ी में यह हेरिटेज ट्रेल एक मजबूत उदाहरण बनकर उभरी है। यह आयोजन केवल भ्रमण नहीं रहा, बल्कि एक संदेश बन गया—कि जब अपनी मिट्टी, अपनी संस्कृति और अपनी पहचान पर गर्व जुड़ता है, तभी विकास की गति भी नई ऊंचाइयों को छूती है।

बागपत की इस हेरिटेज ट्रेल ने यह स्पष्ट कर दिया कि जनपद महाभारतकालीन इतिहास, प्राचीन मंदिरों, नवाबी हवेलियों और जीवंत परंपराओं से जुड़ी एक समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है। इस पहल के माध्यम से प्रशासन ने इन बिखरी हुई धरोहरों को एक सूत्र में पिरोकर “बागपत हेरिटेज” के रूप में एक नई पहचान देने का प्रयास किया है।

इस हेरिटेज ट्रेल को केवल भ्रमण तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि इसे ज्ञानवर्धक और अनुभवात्मक बनाने के लिए विशेषज्ञों का मार्गदर्शन भी शामिल किया गया। प्रतिभागियों को प्रत्येक स्थल के इतिहास, उसकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि और वास्तु महत्व की विस्तृत जानकारी दी गई। इससे यह आयोजन एक “लर्निंग एक्सपीरियंस” बन गया, जहां लोग केवल देख नहीं रहे थे, बल्कि समझ भी रहे थे।

खुर्शीद मंजिल, शिकवा हवेली, बामनोली की हवेलियां और पुरा महादेव मंदिर जैसे स्थल इस विरासत की गहराई को दर्शाते हैं। यहां की दीवारें केवल पत्थर नहीं, बल्कि इतिहास की जीवंत कहानियां हैं, जिन्हें आज लोगों ने करीब से महसूस किया। इस आयोजन में बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी ने इसे एक जनआंदोलन का रूप दे दिया। युवा कैमरों में इतिहास कैद करते नजर आए, तो बुजुर्ग अपनी स्मृतियों को साझा करते दिखे। यह संकेत है कि समाज अपनी विरासत को पहचानने और उसे आगे बढ़ाने के लिए तैयार है।

इस पहल ने बागपत को एक उभरते पर्यटन केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में मजबूत कदम बढ़ाया है। ऐतिहासिक स्थल, सांस्कृतिक अनुभव और स्थानीय सहभागिता—ये सभी मिलकर बागपत को एक नया पर्यटन मॉडल बना सकते हैं। यह आयोजन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के “विरासत पर गर्व” और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सांस्कृतिक पुनर्जागरण एवं पर्यटन विकास के विजन को साकार करता हुआ नजर आया। बागपत ने यह दिखा दिया कि कैसे स्थानीय स्तर पर प्रयास करके राष्ट्रीय सोच को धरातल पर उतारा जा सकता है।

इस आयोजन ने युवाओं और बच्चों को अपनी संस्कृति से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया। यह केवल एक दिन का कार्यक्रम नहीं, बल्कि भविष्य के लिए एक मजबूत आधार तैयार करने की दिशा में कदम है। बागपत की यह पहल आने वाले समय में प्रदेश ही नहीं, बल्कि देश के अन्य जिलों के लिए भी एक प्रेरक मॉडल बन सकती है। यह दिखाता है कि कैसे विरासत, पर्यटन, जनभागीदारी और प्रशासनिक नवाचार को एक साथ जोड़कर विकास की नई कहानी लिखी जा सकती है। आज बागपत ने केवल अपनी विरासत को देखा नहीं, बल्कि उसे जीकर यह साबित कर दिया कि जब समाज और प्रशासन साथ चलते हैं, तो इतिहास खुद बनता है।

इस आयोजन में विभिन्न संस्थाओं और विशेषज्ञों की सक्रिय भागीदारी ने इसे और भी प्रभावशाली बना दिया। सेंटर फॉर हिस्टोरिक हाउसेज ऑफ इंडिया की निदेशक डॉ. एस्थर श्मिट, जनता वैदिक कॉलेज के प्राचार्य डॉ. वीरेंद्र प्रताप सिंह, प्रोफेसर डॉ. गीता, जन उदय फाउंडेशन के भानु प्रताप सिंह और नितिन तोमर, शास्त्रीय संगीतज्ञ राम पंचाल तथा सेंटर से जुड़ी अनुष्का सहित कई विशेषज्ञों और शिक्षाविदों ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

सूचना विभाग बागपत

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