Latest Post

स्वर्ग, नरक और हम “संगठन में बहुत भीड़ हो गई है और इस भीड़ में अच्छे इंसानों की कमी है”यह कथन केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि एक गंभीर सामाजिक और संगठनात्मक प्रश्न भी खड़ा करता है। यह प्रश्न केवल किसी एक संगठन का नहीं, बल्कि उन सभी संस्थाओं का है जिनकी पहचान व्यक्ति निर्माण, अनुशासन और मूल्य आधारित कार्यशैली से रही है।वो दौर भी था जब शाखा कार्यवाह से लेकर विभाग कार्यवाह तथा नगर प्रचारक से लेकर विभाग प्रचारक तक प्रत्येक पदाधिकारी अपने कार्यकर्ताओं का व्यक्तिगत रूप से ध्यान रखते थे। कार्यकर्ता केवल संख्या नहीं, बल्कि परिवार का सदस्य माना जाता था। उसके सुख-दुःख, पारिवारिक परिस्थितियों, शिक्षा, रोजगार और व्यक्तिगत विकास तक की चिंता की जाती थी। यही आत्मीयता संघ की सबसे बड़ी शक्ति थी।उस समय कार्य करने वाले स्वयंसेवकों की सबसे बड़ी पहचान उनकी प्रामाणिकता, निस्वार्थ सेवा, अनुशासन और समर्पण थी। दायित्व पद प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि स्वयं को समाज के लिए समर्पित करने का अवसर माना जाता था। शाखा केवल दैनिक कार्यक्रम नहीं थी, बल्कि चरित्र निर्माण की ऐसी पाठशाला थी, जहाँ से निकलने वाला स्वयंसेवक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपनी अलग पहचान स्थापित करता था।समय के साथ संगठन का विस्तार हुआ, प्रभाव बढ़ा और उससे जुड़े लोगों की संख्या भी तेजी से बढ़ी । विस्तार स्वाभाविक और आवश्यक है, लेकिन जब संख्या गुणवत्ता पर भारी पड़ने लगे, तब आत्ममंथन की आवश्यकता होती है। यदि ऐसे लोग भी महत्वपूर्ण दायित्वों तक पहुँच जाएँ, जिनका संगठन की मूल कार्यपद्धति, संस्कार और विचारधारा से गहरा परिचय न हो, तो अनुभवी और समर्पित कार्यकर्ताओं में आत्मग्लानि वं निराशा स्वाभाविक है।आधुनिकता की अंधी दौड़, बदलती जीवनशैली और बढ़ती. औपचारिकता ने भी उस आत्मीय वातावरण को धीरे-धीरे कमजोर किया है। पहले प्रचारकों का पुराने स्वयंसेवकों के घरों पर नियमित आना-जाना होता था। संवाद, मार्गदर्शन और पारिवारिक संबंध संगठन की संस्कृति का हिस्सा थे। आज परिस्थितियाँ बदल गई हैं। संपर्क तो है, लेकिन वह आत्मीयता और व्यक्तिगत जुड़ाव पहले जैसा कम दिखाई देता है।यही कारण है कि कैलाश विजयवर्गीय का कथन केवल शब्द नहीं, बल्कि आत्ममंथन का विषय है। किसी भी संगठन की वास्तविक शक्ति उसकी भीड़ नहीं, बल्कि उसके संस्कारित, प्रामाणिक और समर्पित कार्यकर्ता होते हैं। यदि व्यक्ति निर्माण की प्रक्रिया कमजोर होगी, तो संख्या बढ़ने के बावजूद संगठन की आत्मा कमजोर पड़ने लगेगी।आज आवश्यकता किसी व्यक्ति या पीढ़ी को दोष देने की नहीं, बल्कि उस मूल परंपरा को पुनर्जीवित करने की है जिसने संघ को समाज में विशिष्ट स्थान दिलाया। शाखा का उद्देश्य केवल उपस्थिति दर्ज कराना नहीं, बल्कि ऐसे व्यक्तित्वों का निर्माण करना है जो अपने आचरण, सेवा, विनम्रता और राष्ट्रभाव से समाज का मार्गदर्शन करें।भीड़ बढ़ना अच्छी बात है, लेकिन यदि उस भीड़ में संस्कार, प्रामाणिकता और आत्मीयता का अनुपात घटने लगे, तो यह किसी भी संगठन के लिए चिंतन का विषय बन जाता है। आज आवश्यकता संख्या बढ़ाने से अधिक उस परंपरा को सशक्त करने की है, जिसने स्वयंसेवक को केवल कार्यकर्ता नहीं, बल्कि राष्ट्र और समाज के लिए आदर्श नागरिक बनाया। एक बात तो है देश में भाजपा के विरुद्ध आक्रोश बढ़ता ही जा रहा है यमुना जल स्तर की प्रशासन द्वारा की जा रही निगरानी बाढ़ चौकिया पर कर्मचारी अलर्ट राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में पुराने वाहनों के प्रतिस्थापन हेतु “परिवर्तन योजना” लागू

स्वर्ग, नरक और हम

मृत्यु के बाद स्वर्ग मिले—इस आशा में मनुष्य जीवन भर कितने जतन करता है। कोई व्रत रखता है, कोई दान-पुण्य करता है, कोई तीर्थों की यात्रा करता है, तो कोई…

“संगठन में बहुत भीड़ हो गई है और इस भीड़ में अच्छे इंसानों की कमी है”यह कथन केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि एक गंभीर सामाजिक और संगठनात्मक प्रश्न भी खड़ा करता है। यह प्रश्न केवल किसी एक संगठन का नहीं, बल्कि उन सभी संस्थाओं का है जिनकी पहचान व्यक्ति निर्माण, अनुशासन और मूल्य आधारित कार्यशैली से रही है।वो दौर भी था जब शाखा कार्यवाह से लेकर विभाग कार्यवाह तथा नगर प्रचारक से लेकर विभाग प्रचारक तक प्रत्येक पदाधिकारी अपने कार्यकर्ताओं का व्यक्तिगत रूप से ध्यान रखते थे। कार्यकर्ता केवल संख्या नहीं, बल्कि परिवार का सदस्य माना जाता था। उसके सुख-दुःख, पारिवारिक परिस्थितियों, शिक्षा, रोजगार और व्यक्तिगत विकास तक की चिंता की जाती थी। यही आत्मीयता संघ की सबसे बड़ी शक्ति थी।उस समय कार्य करने वाले स्वयंसेवकों की सबसे बड़ी पहचान उनकी प्रामाणिकता, निस्वार्थ सेवा, अनुशासन और समर्पण थी। दायित्व पद प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि स्वयं को समाज के लिए समर्पित करने का अवसर माना जाता था। शाखा केवल दैनिक कार्यक्रम नहीं थी, बल्कि चरित्र निर्माण की ऐसी पाठशाला थी, जहाँ से निकलने वाला स्वयंसेवक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपनी अलग पहचान स्थापित करता था।समय के साथ संगठन का विस्तार हुआ, प्रभाव बढ़ा और उससे जुड़े लोगों की संख्या भी तेजी से बढ़ी । विस्तार स्वाभाविक और आवश्यक है, लेकिन जब संख्या गुणवत्ता पर भारी पड़ने लगे, तब आत्ममंथन की आवश्यकता होती है। यदि ऐसे लोग भी महत्वपूर्ण दायित्वों तक पहुँच जाएँ, जिनका संगठन की मूल कार्यपद्धति, संस्कार और विचारधारा से गहरा परिचय न हो, तो अनुभवी और समर्पित कार्यकर्ताओं में आत्मग्लानि वं निराशा स्वाभाविक है।आधुनिकता की अंधी दौड़, बदलती जीवनशैली और बढ़ती. औपचारिकता ने भी उस आत्मीय वातावरण को धीरे-धीरे कमजोर किया है। पहले प्रचारकों का पुराने स्वयंसेवकों के घरों पर नियमित आना-जाना होता था। संवाद, मार्गदर्शन और पारिवारिक संबंध संगठन की संस्कृति का हिस्सा थे। आज परिस्थितियाँ बदल गई हैं। संपर्क तो है, लेकिन वह आत्मीयता और व्यक्तिगत जुड़ाव पहले जैसा कम दिखाई देता है।यही कारण है कि कैलाश विजयवर्गीय का कथन केवल शब्द नहीं, बल्कि आत्ममंथन का विषय है। किसी भी संगठन की वास्तविक शक्ति उसकी भीड़ नहीं, बल्कि उसके संस्कारित, प्रामाणिक और समर्पित कार्यकर्ता होते हैं। यदि व्यक्ति निर्माण की प्रक्रिया कमजोर होगी, तो संख्या बढ़ने के बावजूद संगठन की आत्मा कमजोर पड़ने लगेगी।आज आवश्यकता किसी व्यक्ति या पीढ़ी को दोष देने की नहीं, बल्कि उस मूल परंपरा को पुनर्जीवित करने की है जिसने संघ को समाज में विशिष्ट स्थान दिलाया। शाखा का उद्देश्य केवल उपस्थिति दर्ज कराना नहीं, बल्कि ऐसे व्यक्तित्वों का निर्माण करना है जो अपने आचरण, सेवा, विनम्रता और राष्ट्रभाव से समाज का मार्गदर्शन करें।भीड़ बढ़ना अच्छी बात है, लेकिन यदि उस भीड़ में संस्कार, प्रामाणिकता और आत्मीयता का अनुपात घटने लगे, तो यह किसी भी संगठन के लिए चिंतन का विषय बन जाता है। आज आवश्यकता संख्या बढ़ाने से अधिक उस परंपरा को सशक्त करने की है, जिसने स्वयंसेवक को केवल कार्यकर्ता नहीं, बल्कि राष्ट्र और समाज के लिए आदर्श नागरिक बनाया।

एक अपनापन आनौचारिक वार्तालाप ,सुख दुख में उपस्थिति उसे जोड़े रहती है।दैनंदिन शाखा संघ की केवल पद्धति नहीं है प्राण हैनियमित प्रवास ,संपर्क और संवाद इस संघ रूपी शरीर की…

एक बात तो है देश में भाजपा के विरुद्ध आक्रोश बढ़ता ही जा रहा है

यकीन मानिए 2015 के आसपास मैंने वीडियो व लिखित भी पोस्ट की थी कि देश के चारों स्तंभ, न्यायपालिका कार्यपालिका विधायिका और मीडिया खत्म कर दिए गए।लेकिन मेरी बात का…

यमुना जल स्तर की प्रशासन द्वारा की जा रही निगरानी बाढ़ चौकिया पर कर्मचारी अलर्ट

बागपत, 13 जुलाई 2026: जनपद में संभावित बरसात एवं बाढ़ की स्थिति को देखते हुए जिलाधिकारी अस्मिता लाल ने समस्त उप जिलाधिकारियों को अलर्ट कर दिया है। साथ ही बाढ़…

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में पुराने वाहनों के प्रतिस्थापन हेतु “परिवर्तन योजना” लागू

बीएस-6, सीएनजी एवं विद्युत चालित वाहनों को प्रोत्साहन, विभिन्न रियायतों का मिलेगा लाभ बागपत 13 जुलाई 2026 सहायक सम्भागीय परिवहन अधिकारी विपिन कुमार ने बताया कि भारत सरकार के सड़क…

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में पुराने वाहनों के प्रतिस्थापन हेतु “परिवर्तन योजना” लागू

बीएस-6, सीएनजी एवं विद्युत चालित वाहनों को प्रोत्साहन, विभिन्न रियायतों का मिलेगा लाभ बागपत 13 जुलाई 2026 सहायक सम्भागीय परिवहन अधिकारी विपिन कुमार ने बताया कि भारत सरकार के सड़क…

13 जुलाई 26 दिन सोमवार उ.प्र. का संभल कलेक्ट्रेट इस तारीख और संभल कलेक्ट्रेट को जनता याद रखेगी इस दिन यहाँ से कांग्रेस का आंदोलन शुरू हुआकांग्रेस के इस आंदोलन की शुरुआत मैं इस आंदोलन का साथ देने के लिए मेरे तीनों साथी राजेश यादब भूरे सिंह राणा और नरेंद्र सिंह तीनों साथ रहेकांग्रेस के इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे विनोद साथी नें कहा यह आंदोलन भले ही संभल कलेक्ट्रेट से शुरू हुआ है लेकिन अब यही आंदोलन मोदीजी को सत्ता से बाहर करेगासाथीजी नें कहा की इस प्रदर्शन को शुरू होंने से पहले हमसे मालूम किया जा रहा था कि इसकी क्या मांगे हैं हमनें बताया था जनपद संभल की सभी नगर पालिकाओं सभी नगर पंचायतों के आज से लेकर पिछले 10 विकास कार्यों की जांच की जाय जो भी दोषी पाया जाय उसके चेयरमेन EO और बह इंजीनियर जिसनें यह विकास कार्य पास किये उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही की जाय इसके साथ संभल जनपद की सभी तहसीलों के अधिकारीयों और विदधुत बिभाग के जे और जिम्मेदार अधिकारीयों की सम्पत्तियों की जांच की जायसाथी जी नें संभल कलेक्ट्रेट को साफ शब्दों मैं कहा अगर इन मागों को नहीं माना गया तो प्रत्येक सोमबार को संभल कलेक्ट्रेट पर इसी प्रकार से कांग्रेस का प्रदर्शन चलेगाआज के प्रदर्शन को सम्बोधित करते हुए इस आन्दोलन के प्रमुख नेता राजेश यादव और भूरे सिंह राणा नें किसानों की समस्याओं से जिला अधिकारी संभल को जानकारी दी कांटों पर किसानों को होंने बाली समस्याओं से अबगत कराया खाद को लेकर भी जिलाधिकारी संभल को तुरंत ही इस समस्या पर ध्यान देने को कहासाथ ही जिला प्रशासन को आगाह किया कि अब संभल कलेक्ट्रेट से कांग्रेस का आंदोलन शुरू हो चुका है अब प्रशासन योगीजी मोदीजी को खुश करने के लिए नहीं संविधान के अनुसार जनता की समस्याओं का समाधान करने पर ध्यान देबहीं नरेंद्र सिंह नें संभल मैं चल रही एक फैक्ट्री की चर्चा करते हुए कहा की उसका मालिक अपने फोटो के साथ योगीजी का फोटो लगा कर मजदूरों का शोसड़ करता हैसोमवार को होंने बाले प्रदर्शन मैं इसकी जान कारी जिला प्रशासन को दी जाएगीकांग्रेस का यह आंदोलन मोदीजी को सत्ता से बाहर करेगा और आने बाले उ.प्र. बिधानसभा मैं योगीजी को सत्ता से बाहर करके देश को बताएगा कि अब देश की राजनीती कांग्रेस के इस आंदोलन से तय होगीधन्यवादआपका अपना विनोद साथीजिला उपाध्यक्षसंभल कांग्रेसजिला संयोजकठगी पीड़ित जमाकर्ता परिवारसंभल8791674785 9720026990 wजय हिन्द जय भारत जय कांग्रेस

13 जुलाई 26 दिन सोमवार उ.प्र. का संभल कलेक्ट्रेट इस तारीख और संभल कलेक्ट्रेट को जनता याद रखेगी इस दिन यहाँ से कांग्रेस का आंदोलन शुरू हुआकांग्रेस के इस आंदोलन…

UP में SDM के देर रात तबादले…

PCS सुरभि शर्मा SDM कानपुर देहात को उपजिलाधिकारी बागपत बनाया गया पुष्पेंद्र पटेल SDM गाज़ीपुर को SDM अम्बेडकर नगर बनाया गया शुभम यादव उपजिलाधिकारी उन्नाव को SDM बुलन्दशहर बनाया गया…

सिनियर सिटीजन समाज सेवी शिक्षक जितेन्द्र तोमर ने जन मुद्दों पर एस डीएम भावना सिंह बडौत को ज्ञापन सौपा धरने के माध्यम से.मुद्दे _ बावली चूँगी बडौत रोडवेज बस स्टेड भूमि की नाप तौल कर अतिक्रमण हटवाने

नियम विपरीत दस साल एक तहसील एक जनपद एक कस्बे का लेखपाल नियुक्त रहने पर लेखपाल शैलकुमार यादव का अन्य जनपद तबादला करानेउनकी आय से अधिक सम्मपत्ति की जाँच की…

You missed

“संगठन में बहुत भीड़ हो गई है और इस भीड़ में अच्छे इंसानों की कमी है”यह कथन केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि एक गंभीर सामाजिक और संगठनात्मक प्रश्न भी खड़ा करता है। यह प्रश्न केवल किसी एक संगठन का नहीं, बल्कि उन सभी संस्थाओं का है जिनकी पहचान व्यक्ति निर्माण, अनुशासन और मूल्य आधारित कार्यशैली से रही है।वो दौर भी था जब शाखा कार्यवाह से लेकर विभाग कार्यवाह तथा नगर प्रचारक से लेकर विभाग प्रचारक तक प्रत्येक पदाधिकारी अपने कार्यकर्ताओं का व्यक्तिगत रूप से ध्यान रखते थे। कार्यकर्ता केवल संख्या नहीं, बल्कि परिवार का सदस्य माना जाता था। उसके सुख-दुःख, पारिवारिक परिस्थितियों, शिक्षा, रोजगार और व्यक्तिगत विकास तक की चिंता की जाती थी। यही आत्मीयता संघ की सबसे बड़ी शक्ति थी।उस समय कार्य करने वाले स्वयंसेवकों की सबसे बड़ी पहचान उनकी प्रामाणिकता, निस्वार्थ सेवा, अनुशासन और समर्पण थी। दायित्व पद प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि स्वयं को समाज के लिए समर्पित करने का अवसर माना जाता था। शाखा केवल दैनिक कार्यक्रम नहीं थी, बल्कि चरित्र निर्माण की ऐसी पाठशाला थी, जहाँ से निकलने वाला स्वयंसेवक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपनी अलग पहचान स्थापित करता था।समय के साथ संगठन का विस्तार हुआ, प्रभाव बढ़ा और उससे जुड़े लोगों की संख्या भी तेजी से बढ़ी । विस्तार स्वाभाविक और आवश्यक है, लेकिन जब संख्या गुणवत्ता पर भारी पड़ने लगे, तब आत्ममंथन की आवश्यकता होती है। यदि ऐसे लोग भी महत्वपूर्ण दायित्वों तक पहुँच जाएँ, जिनका संगठन की मूल कार्यपद्धति, संस्कार और विचारधारा से गहरा परिचय न हो, तो अनुभवी और समर्पित कार्यकर्ताओं में आत्मग्लानि वं निराशा स्वाभाविक है।आधुनिकता की अंधी दौड़, बदलती जीवनशैली और बढ़ती. औपचारिकता ने भी उस आत्मीय वातावरण को धीरे-धीरे कमजोर किया है। पहले प्रचारकों का पुराने स्वयंसेवकों के घरों पर नियमित आना-जाना होता था। संवाद, मार्गदर्शन और पारिवारिक संबंध संगठन की संस्कृति का हिस्सा थे। आज परिस्थितियाँ बदल गई हैं। संपर्क तो है, लेकिन वह आत्मीयता और व्यक्तिगत जुड़ाव पहले जैसा कम दिखाई देता है।यही कारण है कि कैलाश विजयवर्गीय का कथन केवल शब्द नहीं, बल्कि आत्ममंथन का विषय है। किसी भी संगठन की वास्तविक शक्ति उसकी भीड़ नहीं, बल्कि उसके संस्कारित, प्रामाणिक और समर्पित कार्यकर्ता होते हैं। यदि व्यक्ति निर्माण की प्रक्रिया कमजोर होगी, तो संख्या बढ़ने के बावजूद संगठन की आत्मा कमजोर पड़ने लगेगी।आज आवश्यकता किसी व्यक्ति या पीढ़ी को दोष देने की नहीं, बल्कि उस मूल परंपरा को पुनर्जीवित करने की है जिसने संघ को समाज में विशिष्ट स्थान दिलाया। शाखा का उद्देश्य केवल उपस्थिति दर्ज कराना नहीं, बल्कि ऐसे व्यक्तित्वों का निर्माण करना है जो अपने आचरण, सेवा, विनम्रता और राष्ट्रभाव से समाज का मार्गदर्शन करें।भीड़ बढ़ना अच्छी बात है, लेकिन यदि उस भीड़ में संस्कार, प्रामाणिकता और आत्मीयता का अनुपात घटने लगे, तो यह किसी भी संगठन के लिए चिंतन का विषय बन जाता है। आज आवश्यकता संख्या बढ़ाने से अधिक उस परंपरा को सशक्त करने की है, जिसने स्वयंसेवक को केवल कार्यकर्ता नहीं, बल्कि राष्ट्र और समाज के लिए आदर्श नागरिक बनाया।

sbobet

situs judi bola

sbobet

situs judi bola

sbobet

situs judi bola

sbobet

situs judi bola

sbobet

situs judi bola

situs judi bola

situs judi bola

sbobet

sbobet

sbobet

sbobet

sbobet

sbobet

sbobet

sbobet

sbobet

sbobet

sbobet

sbobet

sbobet

sbobet

sbobet

sbobet

situs judi bola

situs judi bola

situs judi bola

situs judi bola

situs judi bola

situs judi bola

situs judi bola

situs judi bola

situs judi bola

situs judi bola

situs judi bola

situs judi bola

situs judi bola

situs judi bola

situs judi bola

situs judi bola

×