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हुआ यह कि_ ट्रम्प की अपनी “पवित्र पिता” (Holy Father) वाली फोटो और टिप्पणीयों को मेलोनी ने जैसे ही “अस्वीकार्य” बताया_ ट्रम्प “झंडू” तो वैसे ही ओवन में फुला हुआ चीज़ पिज्जा है. उसने बिना देर किये मेलोनी को इटली की प्रधानमंत्री के रुप में “अस्वीकार्य” घोषित करते हुये कहा_ “अगर आप मुझे पसंद नहीं करते, तो आप अस्तित्व में ही क्यों हैं.?”

ट्रम्प ने ईरान और परमाणु हथियारों का जिक्र ऐसे किया मानो ईरान कोई डिलीवरी बॉय है, जो दो मिनट में पिज्जा की जगह परमाणु बम इटली के दरवाजे पर छोड़ जायेगा_

मेलोनी ने साबित कर दिया कि वो ट्रम्प जैसे “झंडू पागलों” को बातों में लपेटना भी जानती हैं_
(मेलोनी ने ट्रम्प को इतिहास का वो आईना दिखाया जिसे अमेरिका अक्सर अलमारी के पीछे छिपा कर रखता है)
मेलोनी ने कहा_

“दुनियाँ में नौ देशों के पास परमाणु बम है, लेकिन उसका बटन एक बार नही दो-दो बार सिर्फ एक ही देश ने दबाया है और मिस्टर ट्रम्प, वो आपका देश अमेरिका ही है”_

मेलोनी ने ट्रम्प को सलाह देते हुये कहा_
“ट्रम्प को अपनी ज़बान पर लगाम लगानी चाहिये”

मेलोनी की गुगली ने ट्रम्प का मिडिल स्टंप उखाड़ दिया है_

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सिर्फ चुनाव नहीं हारा था, अहंकार भी पराजित हुआ था!जुलाई 2022 में संसद के गलियारों में एक स्वर बार-बार सुनाई दे रहा था— “जवाब दो सोनिया गांधी…” “सुनो सोनिया गांधी…” “माफ़ी मांगो सोनिया गांधी…”अधीर रंजन चौधरी के एक बयान को लेकर तत्कालीन केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी से तीखे अंदाज़ में सवाल किए। राजनीतिक बहस और आरोप-प्रत्यारोप लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन राजनीति में शब्दों और व्यवहार की मर्यादा भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।कहा जाता है कि उस घटना ने कांग्रेस नेतृत्व, विशेषकर राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को भीतर तक प्रभावित किया। इसके बाद अमेठी में राजनीतिक संघर्ष केवल चुनावी मुकाबला नहीं रहा, बल्कि प्रतिष्ठा और सम्मान का प्रश्न भी बन गया।2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने अमेठी से अपने समर्पित कार्यकर्ता किशोरी लाल शर्मा को उम्मीदवार बनाया। चुनाव प्रचार की कमान प्रियंका गांधी ने संभाली और परिणाम सबके सामने था। स्मृति ईरानी को भारी अंतर से पराजय का सामना करना पड़ा।राजनीति के जानकार इस परिणाम को केवल चुनावी हार नहीं, बल्कि सत्ता और पद के अहंकार पर जनता के निर्णय के रूप में भी देखते हैं।सत्ता स्थायी नहीं होती। पद, प्रतिष्ठा और अधिकार समय के साथ आते-जाते रहते हैं। जो स्थायी रहता है, वह है व्यक्ति का व्यवहार, उसकी विनम्रता और लोगों के प्रति उसका सम्मान।यही कारण है कि इतिहास बार-बार हमें सिखाता है—”ये सत्ता का दबदबा, ये हुकूमत, ये दौलत का नशा, किरायेदार हैं सब, घर बदलते रहते हैं।”पद का अहंकार कभी नहीं करना चाहिए। आज जो शिखर पर है, कल उसे भी जनता के बीच खड़ा होना पड़ सकता है। इसलिए शब्दों में संयम, व्यवहार में विनम्रता और विरोधियों के प्रति भी सम्मान बनाए रखना ही सच्चे नेतृत्व की पहचान है।

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