दिल्ली ::- देश के ऊर्जा क्षेत्र में जबरदस्त बदलाव हुआ है। जनवरी, 2026 तक भारत की स्थापित विद्युत क्षमता 520.51 गीगावाट तक पहुंच गई है। साथ ही, बिजली की कमी वित्त वर्ष 2014 के 4.2 फीसदी से घटकर दिसंबर, 2025 तक मात्र 0.03 फीसदी रह गई, जो आपूर्ति की पर्याप्तता में एक महत्वपूर्ण सुधार को दर्शाता है। 1.85 लाख करोड़ के निवेश से 18,374 गांवों का विद्युतीकरण और 2.86 करोड़ घरों को बिजली कनेक्शन देना संभव हुआ। स्मार्ट मीटर लगाने से कार्यक्षमता और पारदर्शिता बढ़ी है। वहीं, नवीकरणीय ऊर्जा खासकर सौर ऊर्जा में तेजी से हुई बढ़ोतरी ने नवीकरणीय स्रोतों को बिजली मांग का रिकॉर्ड हिस्सा पूरा करने में सक्षम बनाया है, जिससे ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हुई है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश के लिए विश्वसनीय, किफायती और सार्वभौमिक बिजली उपलब्धता सुनिश्चित करना एक तकनीकी चुनौती एवं गवर्नेंस की उपलब्धि, दोनों है। आपूर्ति की औसत लागत (एसीएस) व प्राप्त औसत राजस्व (एआरआर) के बीच का अंतर वित्त वर्ष 2025 में 0.78 रुपये प्रति यूनिट से तेजी से घटकर 0.06 रुपये प्रति यूनिट रह गया है। 2025-26 के दौरान (31 जनवरी, 2026 तक) सभी स्रोतों से रिकॉर्ड 52,537 मेगावाट की उत्पादन क्षमता जोड़ी गई है। इसमें से 39,657 मेगावाट नवीकरणीय ऊर्जा से प्राप्त हुई, जिसमें 34,955 मेगावाट सौर ऊर्जा और 4,613 मेगावाट पवन ऊर्जा शामिल है। यह एक ही वर्ष में अब तक की सबसे अधिक क्षमता वृद्धि है। इसने 2024-25 में हासिल किए गए 34,054 मेगावाट के पिछले रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया है। यह वृद्धि देश की कुल स्थापित क्षमता में 11 फीसदी से अधिक बढ़ोतरी को दर्शाती है।
पारंपरिक ईंधन पर घटी निर्भरता
एक दशक पहले, बिजली की कमी आर्थिक गतिविधियों और दैनिक जीवन के लिए बाधा बनी हुई थी, लेकिन 2025-26 में भारत ने सफलतापूर्वक 242.49 गीगावाट बिजली की पीक मांग को पूरा किया। डीजल जनरेटर और पारंपरिक ईंधनों पर निर्भरता घटी है, जिससे लागत में कमी आई है।