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डॉक्टर कहते हैं कि सेवानिवृत्त (वरिष्ठ नागरिकों) को अधिक बात करनी चाहिए क्योंकि वर्तमान में स्मृति हानि को रोकने का कोई उपाय नहीं है। अधिक बात करना ही एकमात्र तरीका है। वरिष्ठ नागरिकों को ज्यादा बात करने से कम से कम तीन फायदे हैं।
पहला: बोलना मस्तिष्क को सक्रिय करता है और मस्तिष्क को सक्रिय रखता है, क्योंकि भाषा और विचार एक दूसरे के साथ संवाद करते हैं, खासकर जब जल्दी जल्दी बोलते हैं, जो स्वाभाविक रूप से तेजी से सोच प्रतिबिंब में परिणाम देता है और स्मृति को भी बढ़ाता है। वरिष्ठ नागरिक जो बात नहीं करते हैं, उनकी याददाश्त कम होने की संभावना अधिक होती है।
दूसरा: ज्यादा बोलने से तनाव दूर होता है, मानसिक बीमारी से बचा जाता है और तनाव कम होता है। हम अक्सर कुछ नहीं कहते, लेकिन हम इसे अपने दिलों में दबा लेते हैं और घुटन और असहज महसूस करते हैं।यह सच है, इसलिए, अच्छा होगा कि सीनियर्स को ज्यादा बात करने का मौका दिया जाए।
तीसरा: बोलने से चेहरे की सक्रिय मांसपेशियों का व्यायाम हो सकता है और साथ ही गले का व्यायाम हो सकता है और फेफड़ों की क्षमता भी बढ़ सकती है, साथ ही यह आंखों और कानों के खराब होने के जोखिम को कम करता है और गुप्त जोखिमों को कम करता है जैसे कि चक्कर आना, घुमनी और बहरापन।
संक्षेप में, सेवानिवृत्त, यानी वरिष्ठ नागरिक, अल्जाइमर को रोकने का एकमात्र तरीका है कि जितना हो सके बात करें और लोगों के साथ सक्रिय रूप से संवाद करें। इसका कोई दूसरा इलाज नहीं है।
सिनीयर सिटीजन के लिए संदेश
〰️🪷♾️🙏🏻♾️🪷〰️

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जिस नौकरी को पाने के लिए छात्र दिन रात मेहनत करते हैं मैडम ने हंसते हुए त्याग पत्र दे दिया। अंदर का पता नहीं लेकिन पाती को पढ़ना चाहिए। धन्य है वो परिवार जिसके साये में संस्कार मिले। पढ़िए ये त्यागपत्र…IAS दिव्या मित्तल मैडम ने x पर लिखा है कि आज मैंने 13 वर्षों की अविस्मरणीय यात्रा को अपनी इच्छा से विराम देते हुए IAS से त्यागपत्र दे दिया है।साधारण परिवेश में पलते हुए मैंने एक अच्छे, सफल जीवन का सपना देखा था। दिन-रात एक कर IIT दिल्ली और IIM बैंगलोर से पढ़ने के बाद, लंदन में नौकरी लग गयी। पर ‘सब कुछ’ पा लेने पर भी कुछ अधूरा था। अपने देश में न होना खलता था। मेरी पढ़ाई, आत्मविश्वास, दुनिया में कहीं भी सिर उठाकर चलने की ताक़त, सब इस मिट्टी का कर्ज़ था मुझ पर। वो कर्ज़ चुकाना था। चाहती थी जिस भारत का सपना देखा था, उसे बनाने वाली ईंटों पर मेरे भी हाथों के निशान हों। सो लौट आई, और IAS अधिकारी बनने का सौभाग्य मिला।बहुत कुछ करने का मौका मिला और बहुत सीखा। देवरिया ने सिखाया कि सही के साथ खड़ा होना विकल्प नहीं, कर्तव्य है। मीरजापुर ने सिखाया कि ‘असंभव’ कोई तथ्य नहीं, बस एक राय है। और माँ विंध्यवासिनी के चरणों में बैठकर सीखा कि शक्ति किसी पद से नहीं, उनकी कृपा और लोगों के विश्वास से आती है। सबसे बड़ी सीख यह थी कि अपने लिए देखे सपने तो पूरे हो चुके थे, अब अपने लोगों के लिए देखे सपनों को जीना था। इस जीवन का असली सुकून उन आँखों में दिखा, जिस परिवार को पहली बार ज़मीन का हक़ मिला, जिस दिव्यांग को सम्मान से जीने का अवसर मिला, और जिस किसान के खेत को पानी मिला। उनके संघर्षों में साथ चलते हुए मैंने सीखा कि हर सरकारी फ़ाइल के पीछे एक व्यक्ति है, और उसकी गरिमा बनाये रखना ही न्याय है। #ias #divyamittal #Resignation

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