
मोहित चौहान (सामाजिक कार्यकर्ता ) की कलम से
सहारनपुर से शुरू होकर बागपत, मेरठ, शामली, गाजियाबाद और नोएडा तक बहने वाली हिंडन और कृष्णा नदियां आज महज जलस्रोत नहीं, बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जनमानस के लिए साइलेंट किलर बन चुकी हैं। जो नदियां कभी इस क्षेत्र की समृद्ध कृषि और ग्रामीण जीवन की जीवनरेखा हुआ करती थीं, आज उनमें पानी की जगह फैक्ट्रियों का गाढ़ा, काला और तेजाबी रसायन बह रहा है। कागजी दावों और चुनावी चकाचौंध के बीच ज़मीनी हकीकत यह है कि इन नदियों का रिसता ज़हर अब सीधे तौर पर लोगों की जान ले रहा है।
प्रशासनिक लापरवाही और ‘मृत’ हो चुकी नदियों का खामियाजा अब ग्रामीण अपनी जान देकर चुका रहे हैं। रमाला क्षेत्र के असारा, गांगड़ोली गाँव में कृष्णा नदी के दूषित पानी का कहर इस कदर बढ़ चुका है कि एक ही दिन में दो ग्रामीणों—55 वर्षीय इनाम और 54 वर्षीय यूनुस—की कैंसर से मौत हो गई। गाँव में एक साल के भीतर 20 से अधिक लोग कैंसर के कारण अपनी जान गंवा चुके हैं, जबकि 10 से अधिक मरीज आज भी दिल्ली, मेरठ और अन्य शहरों के अस्पतालों में जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहे हैं। इससे पहले जून महीने में भी शाहिद, जुमेद्दीन, तहसीन और कलसूम जैसे कई ग्रामीण इस बीमारी की बलि चढ़ चुके हैं। वहीं अकेले बागपत जिले की बात करें तो कृष्णा और हिंडन नदी के तट पर बसे 55 से अधिक गाँवों में कैंसर का फैलाव बेहद डरावना रूप ले चुका है। यहाँ 420 से अधिक लोग गंभीर बीमारियों से ग्रस्त हैं और हर महीने किसी न किसी घर का चिराग बुझ रहा है।
एक तरफ देश में विश्वस्तरीय स्वास्थ्य सुविधाओं के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ इस कैंसर प्रभावित बेल्ट के गरीब ग्रामीणों के पास इलाज का कोई ठोस जरिया तक नहीं है। बागपत इंडस्ट्रियल एरिया या ग्रामीण क्षेत्रों में डिस्पेंसरी शुरू करने की मांग सालों से उठ रही है, लेकिन व्यवस्था के कान पर जूं तक नहीं रेंगती। हद तो तब हो जाती है जब ज़िम्मेदार अधिकारी ज़मीनी हकीकत से ही आँखें मूँद लेते हैं। मौतों के बावजूद स्वास्थ्य विभाग और प्रशासनिक अधिकारी वैज्ञानिक जांच कराने और पानी में भारी धातुओं की पुष्टि करने के बजाय लीपापोती में जुटे रहते हैं। गरीब मरीजों को या तो दिल्ली के एम्स की लंबी लाइनों में घुट-घुटकर मरने पर मजबूर होना पड़ता है या फिर निजी अस्पतालों के भारी-भरकम कर्ज के तले दब जाना पड़ता है।
यह स्थिति किसी प्राकृतिक आपदा की देन नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही और राजनीतिक विफलता का सीधा परिणाम है। चुनाव आते ही नदियों की सफाई, स्वच्छ पेयजल और अस्पतालों के लंबे-चौड़े वादे किए जाते हैं। लेकिन वोट बटोरने के बाद जनप्रतिनिधि और हुक्मरान अपनी आँखें मूँद लेते हैं। मिल-मालिकों और भ्रष्ट तंत्र के गठजोड़ के कारण रात के अंधेरे में बेखौफ होकर नदियों में ज़हरीला केमिकल उड़ेला जाता है।
पानी अब सिर से ऊपर निकल चुका है। यह मुद्दा अब केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि मानव अधिकारों और संविधान द्वारा दिए गए ‘जीने के अधिकार’ का सीधा उल्लंघन है। हिंडन-कृष्णा बेसिन के लिए तत्काल एक अधिकार-संपन्न ‘विशेष टास्क फोर्स’ गठित कर जल स्रोतों में ज़हर घोलने वाली औद्योगिक इकाइयों के खिलाफ सख्त आपराधिक मामले दर्ज किए जाने चाहिए। इसके साथ ही असारा समेत प्रभावित सभी 55 से अधिक गाँवों में विशेषज्ञों की टीम भेजकर पेयजल की वैज्ञानिक जांच और घर-घर जाकर कैंसर व अन्य गंभीर बीमारियों की स्क्रीनिंग कराई जानी चाहिए। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, जो राज्य को सबसे ज्यादा राजस्व देता है, वहाँ स्वास्थ्य आपातकाल जैसी स्थिति को देखते हुए युद्धस्तर पर एक समर्पित एम्स (AIIMS) संस्थान या आधुनिक कैंसर अस्पताल की स्थापना की जानी चाहिए। सरकार और जनप्रतिनिधियों को यह समझना होगा कि एक्सप्रेस-वे और चमचमाते शहरों का विकास तब तक पूरी तरह बेमानी है, जब तक बगल के गाँव में दूषित पानी पीकर बच्चे और बुजुर्ग असमय मौत के मुँह में समा रहे हों। लाचार और बीमार जनता की लाशों पर कभी एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण नहीं किया जा सकता।
✍️मोहित चौहान (सामाजिक कार्यकर्ता )