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इस सजे-सजाए मंच पर बैठकर आज जो चेहरा चमकाया जा रहा है, उसका सच यह है कि 2026 तक देश का कुल कर्ज ₹55 लाख करोड़ से बढ़कर ₹198 लाख करोड़ के पार पहुंच चुका है।

जनता की जेब से हर महीने ₹2,12,000 करोड़ का रिकॉर्ड जीएसटी (GST) वसूलने वाली सरकार ने इस असीमित वित्तीय ताकत का इस्तेमाल युवाओं को रोज़गार देने में नहीं, बल्कि 24 घंटे हिंदू-मुस्लिम विमर्श को जिंदा रखने और ट्रोल सेना खड़ी करने में लगा दिया।

​वैश्विक बाजार में जब 2014 से 2026 के बीच सिलिकॉन चिप्स और फाइबर ऑप्टिक्स की बुनियादी लागत में 83% की ऐतिहासिक गिरावट आई, तो भारत में इंटरनेट उपयोगकर्ता 25 करोड़ से बढ़कर 95 करोड़ हो गए।

ताइवान और चीन में ₹5,000 के स्मार्टफोन बनने लगे, जिससे यह तकनीक हर हाथ में पहुंच गई—इसमें किसी घरेलू नेता की कोई दूरदर्शिता नहीं, बल्कि वैश्विक बाजार का नियम था।

मगर अफ़सोस, इस ऐतिहासिक उपहार का उपयोग शिक्षा, एडवांस्ड एआई या अनुसंधान के बजाय केवल हर लाभार्थी के मोबाइल पर प्रधानमंत्री के चेहरे वाले संदेश भेजने और पीआर स्टंट के लिए किया गया।

​यही कहानी सौर ऊर्जा की भी है, जहां 2014 की ₹12 प्रति यूनिट की दर चीन और जर्मनी में सोलर फोटोवोल्टिक सेल्स की लागत 90% गिरने के कारण आज ₹2.20 प्रति यूनिट पर आ गई। रेलवे का 95% से अधिक विद्युतीकरण हो गया, लेकिन गणितीय रूप से जो यात्री किराया और माल ढुलाई आधी होनी चाहिए थी, वह कम नहीं हुई।

जनता पर टैक्स का बोझ वैसे ही बना रहा, और इस सस्ती तकनीक से बचे अरबों रुपये का उपयोग केवल भव्य रैलियों, विज्ञापनों और मंदिर-मस्जिद के विवादों में देश की ऊर्जा को व्यर्थ करने के लिए किया गया।

​’चाइना प्लस वन’ नीति के तहत अमेरिका, यूरोप और जापान ने जब चीनी कम्युनिस्ट पार्टी पर निर्भरता कम करने के लिए भारत की ओर रुख किया, तो सालाना 75 बिलियन डॉलर का एफडीआई (FDI) स्वतः भारत आया।

यह निवेश 150 करोड़ की विशाल आबादी के बाजार से मुनाफा कमाने आया था, न कि किसी की कूटनीति से प्रभावित होकर। लेकिन इस विदेशी धन का उपयोग भारी बुनियादी उद्योग लगाने के बजाय केवल व्यक्तिगत छवि चमकाने वाले विदेशी दौरों के विज्ञापन में उड़ा दिया गया,

जबकि देश की 65% युवा आबादी (जो 35 वर्ष से कम आयु की है) आज भी भयानक बेरोज़गारी दर से जूझ रही है।

​सबसे बड़ा विरोधाभास तो अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर दिखता है, जहां घरेलू रैलियों में राष्ट्रवाद का ढिंढोरा पीटने वाली सरकार आज भी अपनी ऊर्जा जरूरतों का 85% कच्चे तेल के आयात से पूरा करती है। इसके लिए हर साल $120,00,00,00,00,000 की भारी-भरकम राशि देश से बाहर जाती है।

जब भी रूस, यूक्रेन या मध्य-पूर्व में भू-राजनीतिक तनाव होता है, तो अमेरिका की प्रतिबंधों की धमकी मिलते ही भारत को यह हिसाब लगाना पड़ता है कि वह किससे तेल खरीदे और किससे नहीं।

56 इंच की छाती का दावा करने वाले आज भी ईंधन खरीदने के लिए विदेशी गाइडलाइंस और छूट की कतार में खड़े रहते हैं,

जो यह साबित करता है कि सारा पावरहाउस सिर्फ कागजी और चुनावी है।
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