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ऋषि ने दोबारा और कठिन तपस्या की। इस बार ब्रह्मा जी स्वयं उनके सम्मुख प्रकट हुए और उनसे मनोवांछित वरदान मांगने का आग्रह किया, लेकिन ऋषि ने फिर से किसी भी सांसारिक या स्वर्गीय सुख को लेने से साफ इनकार कर दिया। देवताओं में इस बात को लेकर भारी व्याकुलता और भय फैल गया। देवताओं ने सोचा कि जो व्यक्ति बार-बार वरदान देने पर भी कुछ स्वीकार नहीं कर रहा है, उसकी प्रवृत्ति कहीं हिरण्यकश्यप जैसी तो नहीं है? हिरण्यकश्यप ने भी इसी तरह घोर तप कर स्वयं को अजेय बना लिया था और तीनों लोकों को अपने वश में कर लिया था। देवताओं को डर सताने लगा कि यदि ऋषि की तपस्या इसी तरह चलती रही, तो एक दिन उनका तपोबल इतना बढ़ जाएगा कि देवलोक स्वतः ही उनके अधीन हो जाएगा।

देवताओं का महादेव से आग्रह-
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जब कामदेव सहित अन्य सभी देवता ऋषि की तपस्या को भंग करने में पूरी तरह असफल हो गए, तब देवराज इंद्र व्याकुल होकर भगवान शिव की शरण में पहुंचे। देवताओं ने महादेव से प्रार्थना की, “हे प्रभु! हिमालय पर एक ऋषि अत्यंत कठोर तप कर रहे हैं। उनका बल निरंतर बढ़ता जा रहा है, जो भविष्य में देवलोक के लिए संकट बन सकता है। इसलिए आप किसी भी प्रकार से उनकी तपस्या के स्थान को नष्ट कर दीजिए।”भोलेनाथ ने पहले तो देवताओं से कहा कि यदि कोई ऋषि तपस्या कर रहा है, तो इसमें बुराई क्या है? उसे तप करने देना चाहिए। परंतु देवताओं ने अत्यंत करुण भाव से बार-बार आग्रह किया कि यदि उनकी तपस्या नहीं रोकी गई, तो देवताओं का अस्तित्व सूक्ष्म हो जाएगा। देवताओं के अत्यधिक हठ और बार-बार किए गए अनुरोध के कारण आशुतोष भगवान शिव उनकी बात मान गए।

एक दिन जब ऋषि अपने आश्रम से दूर वन में कंदमूल या अन्य कार्यों के लिए गए हुए थे, तब भगवान शिव वहां पहुंचे। देवताओं के कार्य की सिद्धि के लिए महादेव ने उस ऋषि के कुटिया और पूरे आश्रम क्षेत्र को अंतर्ध्यान (भस्म) कर दिया।जब ऋषि लौटकर अपने आश्रम पहुंचे, तो वहां केवल राख और उजाड़ भूमि देखकर स्तब्ध रह गए। उन्होंने बिना किसी कारण के अपने पवित्र साधना स्थल की ऐसी दुर्गति देखी, तो वे अत्यंत क्रोधित हो गए। ऋषि ने यह नहीं जाना कि यह कार्य किसने किया है, परंतु उन्होंने क्रोध में आकर ब्रह्मांड को कंपाने वाला एक भयंकर श्राप दे दिया, “जिस किसी ने भी, बिना किसी वैध कारण के मेरे इस पावन आश्रम को जलाकर नष्ट किया है, मैंने कभी किसी का अहित नहीं किया, फिर भी जिसने मेरे साथ यह दुर्व्यवहार किया है, मैं श्राप देता हूं कि उसके संपूर्ण शरीर में अभी इसी क्षण से अग्नि की तरह तीव्र और भयानक ज्वाला प्रकट हो जाएगी। उसका पूरा अंग-अंग तपने लगेगा।”

ऋषि के तपोबल से दिया गया वह श्राप अत्यंत अमोघ था। साक्षात महादेव का दिव्य शरीर उस श्राप के प्रभाव से भीतर ही भीतर बुरी तरह जलने लगा। उनका पूरा अंग लाल पड़ गया, वे पसीने-पसीने होने लगे और उनके शरीर में वैसी ही भयंकर जलन होने लगी जैसे साक्षात आग की लपटों में घिरे किसी जीव को होती है। महादेव की यह व्याकुलता देखकर देवताओं में हाहाकार मच गया। भगवान शिव के मस्तक पर स्वयं शीतल गंगा जी विराजमान थीं, उनके शरीर पर शीतल भस्म लगी थी, फिर भी ऋषि के श्राप की वह अग्नि शांत नहीं हो रही थी। खूब जल डाला गया, परंतु सब निष्फल रहा।जब यह बात वैकुंठ धाम में भगवान लक्ष्मीनारायण के पास पहुंची, तो वे अपने आराध्य महादेव के इस कष्ट को देखकर अत्यंत द्रवित हो गए। नारायण ने तुरंत अपनी परम प्रिय कामधेनु माता (दिव्य गाय) को बुलाया और आदेश दिया, हे माता! आप शीघ्र ही हिमालय पर जाइए, जहां महादेव श्राप की अग्नि से व्याकुल हैं। आप अपने थनों से सीधे उनके पावन मस्तक और शरीर पर शीतल दुग्ध (दूध) की वर्षा कीजिए।

नारायण की आज्ञा पाकर कामधेनु माता तुरंत शिव जी के पास पहुंचीं। उन्होंने अत्यंत स्नेह और श्रद्धा से अपने थनों से दूध की अविरल धारा बहाकर महादेव का दुग्धाभिषेक करना प्रारंभ किया। जैसे-जैसे कामधेनु के दूध की पवित्र बूंदें महादेव के तप्त शरीर पर पड़ती गईं, वैसे-वैसे ऋषि के श्राप की वह भयानक और तीव्र अग्नि शांत होती चली गई। दुग्धाभिषेक पूरा होते ही महादेव का शरीर पूर्णतः शीतल, कांतिमय और स्वस्थ हो गया।

परम शांत और प्रसन्न होकर महादेव ने पूछा, हे कामधेनु! तुम्हें मेरे इस कष्ट का निवारण करने के लिए यहां किसने भेजा है?तब कामधेनु ने उत्तर दिया, “प्रभु! आपके परम प्रिय, जिन्हें आप सदैव अपने हृदय में धारण करते हैं, उन भगवान नारायण ने मुझे आपकी सेवा में भेजा है।अपने आराध्य नारायण की इस परम कृपा और चिंता को देखकर महादेव का हृदय गद्गद हो गया। उन्होंने उसी क्षण यह नियम और परंपरा स्थापित कर दी कि, मेरे प्रिय नारायण ने कामधेनु के माध्यम से मुझ पर दूध चढ़वाकर मुझे इस घोर कष्ट से मुक्त किया है और परम प्रसन्नता प्रदान की है। अतः आज के बाद जो कोई भी मनुष्य पृथ्वी लोक पर या कहीं भी, मुझ पर श्रद्धापूर्वक दुग्ध से अभिषेक करेगा, अथवा दूध से बनी सामग्रियों (जैसे दही, घी) से मेरा अभिषेक करेगा, मैं उस पर अत्यंत प्रसन्न हो जाऊंगा। मैं यह मानूंगा कि उसने मेरे प्रिय नारायण की ही आज्ञा का पालन किया है। ऐसा दुग्धाभिषेक करने वाले भक्त की मैं समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करूंगा और उसे मनचाहा वरदान प्रदान करूंगा।

तभी से भगवान शिव की पूजा में नित्य दुग्धाभिषेक, घृताभिषेक और दधिअभिषेक करने की यह महान कल्याणकारी परंपरा प्रारंभ हुई। कथा का आध्यात्मिक ज्ञान यही है कि जब हम किसी भी धार्मिक कृत्य के पीछे की वास्तविक कथा और उसके ज्ञान को समझकर भक्ति करते हैं, तभी वह भक्ति सार्थक और फलदायी होती है..!!
🙏🏽 हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे , हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे 🙏🙏🏼हर हर महादेव🙏🏾🙏🏿🙏🏻

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