please esi bhasha na likhe ……….
copy Paste from social media सत्ता के दलालों और मोती के अंडों को समर्पित पोस्ट ।
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एक पढ़ा-लिखा दिखने वाला नमूना कह रहा है कि “गांधीजी नंगे-पुंगे रहकर नाटक कर रहे थे।”
मैं उसी की भाषा में कहना चाहता हूं कि जो तुम्हारे बाप थे, और उनके बाप और उनके भी बाप, उनके पास गांड़ पर सुथन्ना ढंकने का सुबिस्ता नहीं था। सिर्फ तुम्हारे ही नहीं, हमारे भी पुरखे, पूरे भारत के पुरखे नंगे-पुंगे रहकर ही जिंदगी काट रहे थे, खाने को अनाज नहीं था। भूख से काया बिदुर जाती थी। कौवा आंख निकाल ले जाते थे। दुर्भाग्य से गांधी को उस भूखे और नंगे-पुंगे भारत का नेता बनना पड़ा। उन नंगे-पुंगे कंकालों के बीच में सूटबूट पहनकर शेखी बघारने की बात तुम्हारे जैसा निर्लज्ज ही सोच सकता है।
उन्हीं नंगे लोगों का तन ढांकने के लिए बापू चरखा लाए। सूत कातो, आमदनी होगी, आपके लिए स्वदेशी कपड़ा तैयार होगा। तन मूंदने का जुगाड़ भी होगा। यह जो नंगा भारत था , यह कपास उगाता था जिसे तुम्हारे नाजायज बाप लोग लंदन लेकर जाते थे। वहां कपड़ा बनाकर उसे भारत लाकर बेचते थे। गांधी का विलायती कपड़ा उतारकर धोती पहनना इस लूट का भी प्रतिरोध था। जिसका विस्तार है विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार। तुम्हारे बुलबुलसवार वीर जब दलाली में व्यस्त थे, तब गांधी के नेतृत्व में भारत उन्हीं अंग्रेजों की जड़ उखाड़ रहा था।
विंस्टन_चर्चिल भी गांधी को ‘अधनंगा_फ़क़ीर’ कहता था, चर्चिल के जासूस और चाटुकार चमन भी गांधी को नंगा पुंगा बताएं तो इसमें हैरानी कैसी?
विलायत से बैरिस्टर बनकर भारत लौटे गांधी के सूटबूट उतार फेंकने और महात्मा बनने की यात्रा काफी लंबी है। गांधी के निर्वस्त्र होने का मजाक उड़ाने का मतलब भारत के भीषण संघर्ष, गरीबी और गुलामी से जूझते करोड़ों लोगों का मजाक उड़ाना है।
चंपारण में नील की खेती करने के लिए अंग्रेज किसानों पर अत्याचार करते थे। जब गांधी को बताया गया कि नील फैक्ट्रियों के मालिक कथित निचली जाति के औरतों और मर्दों को जूते नहीं पहनने देते तो उसी दिन से गांधी ने जूते पहनने बंद कर दिए।
8 नवंबर 1917 को सत्याग्रह का दूसरा चरण शुरू हुआ। यहां पर लड़कियों के लिए तीन स्कूल शुरू हुए। लोगों को बुनाई करने और साफ-सुथरा रहने का प्रशिक्षण दिया गया।
गांधी ने कस्तूरबा से कहा कि वे औरतों को हर रोज़़ नहाने और साफ-सुथरा रहने के बारे में समझाएं। कस्तूरबा जब औरतों को समझाने लगीं तो एक औरत ने कहा, “बा, आप मेरे घर की हालत देखिए। मेरे पास केवल एक साड़ी है जो मैंने पहन रखी है। आप ही बताओ, मैं कैसे इसे साफ करूं और इसे साफ करने के बाद मैं क्या पहनूंगी? आप महात्मा जी से कहो कि मुझे दूसरी साड़ी दिलवा दे ताकि मैं हर रोज इसे धो सकूं।”
यह बात सुनकर गांधी ने अपना चोगा बा को दिया कि उस औरत को दे आओ। इसके बाद से ही उन्होंने चोगा ओढ़ना बंद कर दिया।
1918 में गांधी अहमदाबाद में मज़दूरों की लड़ाई में शामिल हुए। वहां उन्होंने महसूस किया कि उनकी पगड़ी में जितने कपड़े लगते हैं, उसमें ‘कम से कम चार लोगों का तन ढंका जा सकता है।’ इसके बाद उन्होंने पगड़ी पहनना छोड़ दिया।
31 अगस्त, 1920 को खेड़ा सत्याग्रह के दौरान गांधी ने प्रण किया कि “आज के बाद से मैं ज़िंदगी भर हाथ से बनाए हुए खादी के कपड़ों का इस्तेमाल करूंगा।”
1921 में गांधी मद्रास से मदुरई जाती हुई ट्रेन में भीड़ से मुखातिब होते हुए। “उस भीड़ में हर कोई विदेशी कपड़ों में मौजूद था। मैंने उनसे खादी पहनने का आग्रह किया। उन्होंने कहा, हम इतने गरीब है कि खादी नहीं खरीद पाएंगे।”
गांधी ने लिखा है, “मैंने इस तर्क के पीछे की सच्चाई को महसूस किया। मेरे पास बनियान, टोपी और नीचे तक धोती थी। ये पहनावा अधूरी सच्चाई बयां करती थी जहां लाखों लोग निर्वस्त्र रहने के लिए मजबूर थे। चार इंच की लंगोट के लिए जद्दोजहद करने वाले लोगों की नंगी पिंडलियां कठोर सच्चाई बयां कर रही थीं। मैं उन्हें क्या जवाब दे सकता था जब तक कि मैं ख़ुद उनकी पंक्ति में आकर नहीं खड़ा हो सकता। मदुरई में हुई सभा के बाद अगली सुबह से कपड़े छोड़कर मैंने ख़ुद को उनके साथ खड़ा किया।”
चंपारण से अपने वस्त्रों पर खर्च कम करने का यह प्रयोग करीब चार साल तक चला और अंतत: गांधी उस भारतीय की तरह रहने लगे जिसके तन पर सिर्फ एक धोती रहती थी।
गांधी का निर्वस्त्र शरीर विदेशी कपड़ों के बहिष्कार के लिए हो रहे सत्याग्रह का प्रतीक बन गया, क्योंकि देश का शरीर भी निर्वस्त्र था। गांधी का मजाक उड़ाना आपका दिवालियापन तो है ही, यह उस मजबूर भारत का अपमान है जो निर्वस्त्र और भूखा रहने को अभिशप्त था।
दुखद है कि दो_रुपल्ली आपसे वह ट्वीट/पोस्ट करवा देती है जो आपको सोचना भी नहीं चाहिए।
दस लाख का सूट पहनने वाले फर्जी फकीर के नए भक्तों के आंख पर भी मांस उग आया है।