दूसरे की वस्तु पर उसकी अनुमति या जानकारी के बिना अपना स्वामित्व बना लेना चोरी है l चोरी में घटना अप्रकाश्य रहती है l यहाँ अप्रकाश्य का अर्थ है सामने घटित न होना l
चोरी दिन में,रात में कभी भी होती हैl व्यक्ति जब लोभ और तृष्णा के कारण किसी वस्तु को जो उसकी नहीं है उसे अपने स्वामित्व में लेने के लिए बेचैन हो जाता है तब वह चोरी करता है l चोर में नैतिक ताकत का अभाव होता है l यदि व्यक्ति नैतिक ताकत रखता है तो वह उस वस्तु की याचना कर सकता है l कोई उस वस्तु को दे या न दे उसकी वांछा l चोर में वस्तु छीनने की ताकत नहीं होती है l जिस दिन वस्तु छीन कर व्यक्ति लेने लगता है उस दिन से वह चोर न होकर दस्यु , डकैत या छीनैत हो जाता है l अतः चोर हमेशा बिना श्रम और सत्य के दूसरेकी वस्तु को अपना बना लेता है l
चोरी प्रायः अकेला व्यक्ति करता है l जब उसे चौर कर्म में सफलता मिलने लगती है तब वह सामूहिक योजना तैयार करता है l वहीं से चोरी संगठित अपराध बन जाती है l
चोरी देवधन, मनुष्य धन, पितृधन और अज्ञात धन की होती है l जिस धन का कोई स्पष्ट स्वामी न हो वह राजा या राष्ट्र का धन होता है l उस धन को चुराना विलम्ब से पर दैवीय दण्ड का कारण बनता है l सृष्टि में कोई ऐसी चोरी नहीं है जो देर सबेर खुल न जाये l* अतः चोर एक ऐसा मनोरोगी होता है जो समझता है उसे कोई देख नहीं रहा है और वह चोरी कर वस्तु उपभोग में सफल रहेगा l
चोरी रोकने की प्रथम शक्ति माता पिता में होती है l संतान जब कोई वस्तु घर में लाये और वह वस्तु संदेह के घेरे में हो तो माता पिता को उसे लौटाने के लिये कठोर आदेश देना चाहिए l अतः प्रत्येक चोर के निर्माण में माता पिता गुरु और बड़े संरक्षक का जाने अनजाने हाथ होता है l
चोरी न करने का संकल्प लेने वाला अपरिग्रही होता है l मुझे तो फूलों की चोरी भी करना निकृष्ट लगता है l जो समिधा, पुष्प और ज्ञान की चोरी नहीं करता वही व्यक्ति दूसरों के पुण्य और राज्य की भी चोरी नहीं कर सकता l
चोरी न करने का मूल मंत्र है — जो मेरा नहीं है उसे मैं उपयोग में नहीं लाउंगा l
श्री राम मंदिर में जो चोरी हुई है वह उन राक्षसों द्वारा की गई है जो माता का मंगल सूत्र और स्वर्ण सिन्दूरदान बेच कर
अपनी समृद्धि खड़ी करते हैं l जो लोग अपने पिता की दवाई का धन चुराकर अपना शौक पूरा करते हैं l
एकबार एक चाडाल
ने कहा था – देवधन, गोधन, यज्ञ धन, द्विजधन को चुराने वाला पतित और चाण्डाल से अधिक निकृष्ट होता है l
मनुष्य होने की शर्त है सत्य, अहिंसा, अचौर्य, अपरिग्रह, और ब्रह्मचर्य को अपनाना l यदि इनमें से हम एक का भी अतिक्रमण करते हैं तो हम मनुष्य होने में अभी कमजोर हैं l
देवधन की चोरी कुत्ता, गिद्ध और श्मशान वृक्ष बनाता है l देव धन की चोरी सिद्ध करता है कि चोर के मन में देवता का अस्तित्व नहीं है l वह देव दण्ड को नहीं मानता है l