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जबकि गुस्से में शिवजी गणेश जी को पहचान ही नहीं पाए कि श्री गणेश उनके पुत्र हैँ और उन्होंने गुस्से में गणेश जी का सिर धड़ से अलग कर दिया था!
अब जब पार्वती जी को पता चला कि उनके पुत्र का सिर धड़ से अलग कर दिया है,तो वो शिवजी पर आग बबूला हो गईं,रुदन करते हुए शिवजी से श्री गणेश को जिंदा करने की जिद्द कर दी!शिवजी क्या करते उन्होंने हाथी के बच्चे का सिर काटा और श्री गणेश जी के सिर पर रख दिया,जबकि श्री गणेश जी का खुद का मूल सिर लगाया जा सकता था,हाथी के बच्चे की बलि देने की क्या जरूरत थी!

हाथी का सिर हाथी के क्षेतिज(Horizontal)/लेटा हुआ लगा होता है,जबकि मानव के सिर ऊर्धव (Vertical)/खड़ा होता है,तो फिर शिवजी ने हाथी के (Horizontal) सिर को बाल गणेश के खड़े धड़ पर कैसे एडजस्ट किया होगा,सोच के सोचना

हालाँकि मेडिकल साइंस में ऐसी सर्जरी की कोई तकनीक अभी तक विश्व में नहीं है

जिज्ञासा 1

चलो जब श्री गणेश जी के धड़ पर सर्जरी के उपरान्त गर्दन जोडी जा सकती थी,तो अंगूठा जोड़ा जाना बहुत आसान काम था,वीर एकलव्य के कटे हुए अंगूठे को ही पुनः जोड़ा जाना था!क्यों नहीं जोड़ा गया

जिज्ञासा 2
अर्जुन के नाम पर भारत देश में पुरुष्कार वितरण होता है

गुरु द्रोणाचार्य के नाम पर भी पुरुष्कार दिया जाता है

किन्तु सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर वीर एकलव्य के नाम पर कोई पुरुष्कार नहीं दिया जाता

क्यों????

🙏 किसी की भावनाओं को चोट पहुंची हो तो:क्षमा याचना🙏

किन्तु विचार जरुर करना

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सिर्फ चुनाव नहीं हारा था, अहंकार भी पराजित हुआ था!जुलाई 2022 में संसद के गलियारों में एक स्वर बार-बार सुनाई दे रहा था— “जवाब दो सोनिया गांधी…” “सुनो सोनिया गांधी…” “माफ़ी मांगो सोनिया गांधी…”अधीर रंजन चौधरी के एक बयान को लेकर तत्कालीन केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी से तीखे अंदाज़ में सवाल किए। राजनीतिक बहस और आरोप-प्रत्यारोप लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन राजनीति में शब्दों और व्यवहार की मर्यादा भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।कहा जाता है कि उस घटना ने कांग्रेस नेतृत्व, विशेषकर राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को भीतर तक प्रभावित किया। इसके बाद अमेठी में राजनीतिक संघर्ष केवल चुनावी मुकाबला नहीं रहा, बल्कि प्रतिष्ठा और सम्मान का प्रश्न भी बन गया।2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने अमेठी से अपने समर्पित कार्यकर्ता किशोरी लाल शर्मा को उम्मीदवार बनाया। चुनाव प्रचार की कमान प्रियंका गांधी ने संभाली और परिणाम सबके सामने था। स्मृति ईरानी को भारी अंतर से पराजय का सामना करना पड़ा।राजनीति के जानकार इस परिणाम को केवल चुनावी हार नहीं, बल्कि सत्ता और पद के अहंकार पर जनता के निर्णय के रूप में भी देखते हैं।सत्ता स्थायी नहीं होती। पद, प्रतिष्ठा और अधिकार समय के साथ आते-जाते रहते हैं। जो स्थायी रहता है, वह है व्यक्ति का व्यवहार, उसकी विनम्रता और लोगों के प्रति उसका सम्मान।यही कारण है कि इतिहास बार-बार हमें सिखाता है—”ये सत्ता का दबदबा, ये हुकूमत, ये दौलत का नशा, किरायेदार हैं सब, घर बदलते रहते हैं।”पद का अहंकार कभी नहीं करना चाहिए। आज जो शिखर पर है, कल उसे भी जनता के बीच खड़ा होना पड़ सकता है। इसलिए शब्दों में संयम, व्यवहार में विनम्रता और विरोधियों के प्रति भी सम्मान बनाए रखना ही सच्चे नेतृत्व की पहचान है।

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