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कार्यक्रम में जिलाध्यक्ष भाजपा श्री के सी मिश्र जी, सांसद श्री अरुण सागर जी, ब्लॉक प्रमुख श्रीमती सपना कश्यप जी एवं श्री लल्ला गुप्ता जी, भाजपा नेता राजीव कश्यप जी, भाजपा नेता सर्वेश कश्यप जी, जिलाध्यक्ष कश्यप महासभा श्री जगदीश कश्यप जी, सुरेंद्र गुप्ता जी, सुरेंद्र कश्यप जी, हरीश कश्यप जी, नीरज कश्यप जी, जिलाध्यक्ष महिला मोर्चा मीनाक्षी कश्यप जी, जिलामंत्री ओबीसी आकाश कश्यप एवं मोहित शर्मा जी, राजपाल कश्यप जी सहित समस्त देवतुल्य कार्यकर्ता बंधु, मातृशक्ति उपस्थित रही !!

कार्यक्रम की अध्यक्ष एवं संयोजक श्री राजेश कश्यप जी रहे !!

मै कार्यक्रम में पधारे आप सभी पदाधिकारी, देवतुल्य कार्यकर्ता बंधु एवं मातृशक्ति को सादर धन्यवाद एवं अभिनंदन करता हूं !!

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सिर्फ चुनाव नहीं हारा था, अहंकार भी पराजित हुआ था!जुलाई 2022 में संसद के गलियारों में एक स्वर बार-बार सुनाई दे रहा था— “जवाब दो सोनिया गांधी…” “सुनो सोनिया गांधी…” “माफ़ी मांगो सोनिया गांधी…”अधीर रंजन चौधरी के एक बयान को लेकर तत्कालीन केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी से तीखे अंदाज़ में सवाल किए। राजनीतिक बहस और आरोप-प्रत्यारोप लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन राजनीति में शब्दों और व्यवहार की मर्यादा भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।कहा जाता है कि उस घटना ने कांग्रेस नेतृत्व, विशेषकर राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को भीतर तक प्रभावित किया। इसके बाद अमेठी में राजनीतिक संघर्ष केवल चुनावी मुकाबला नहीं रहा, बल्कि प्रतिष्ठा और सम्मान का प्रश्न भी बन गया।2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने अमेठी से अपने समर्पित कार्यकर्ता किशोरी लाल शर्मा को उम्मीदवार बनाया। चुनाव प्रचार की कमान प्रियंका गांधी ने संभाली और परिणाम सबके सामने था। स्मृति ईरानी को भारी अंतर से पराजय का सामना करना पड़ा।राजनीति के जानकार इस परिणाम को केवल चुनावी हार नहीं, बल्कि सत्ता और पद के अहंकार पर जनता के निर्णय के रूप में भी देखते हैं।सत्ता स्थायी नहीं होती। पद, प्रतिष्ठा और अधिकार समय के साथ आते-जाते रहते हैं। जो स्थायी रहता है, वह है व्यक्ति का व्यवहार, उसकी विनम्रता और लोगों के प्रति उसका सम्मान।यही कारण है कि इतिहास बार-बार हमें सिखाता है—”ये सत्ता का दबदबा, ये हुकूमत, ये दौलत का नशा, किरायेदार हैं सब, घर बदलते रहते हैं।”पद का अहंकार कभी नहीं करना चाहिए। आज जो शिखर पर है, कल उसे भी जनता के बीच खड़ा होना पड़ सकता है। इसलिए शब्दों में संयम, व्यवहार में विनम्रता और विरोधियों के प्रति भी सम्मान बनाए रखना ही सच्चे नेतृत्व की पहचान है।

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