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महिला आरक्षण विधेयक को औंधे मुँह गिरते देख सचमुच बड़ा ही दुख हुआ था। एक पल को लगा कि लोकतंत्र से कोई चूक हो गई।

लेकिन थोड़ी देर बाद समझ में आया कि शायद यह गिरना ही उसकी नियति थी क्योंकि कई बार विधेयक संसद में न्याय की नीयत से नहीं, बल्कि राजनीति की गणित से जन्म लेते हैं।

वैसे चाणक्य ने बड़े अरमान से विपक्ष के पाले मे पासा फेंका था की ना उगलते बने ना निगलते। ऐसे मे मन को तस्सली दिया कि जब नीयत ही ऐसी हो कि गिर जाए तो भी राजनीतिक सहानुभूति मिले और पास हो जाए तो भी श्रेय मिल जाए, तब उसे विधेयक कहना शायद थोड़ा अन्याय होगा।

मेरी समझ मे सच्चाई आ चुकी थी कि चुनाव के ऐसे अवसरों पर यह विधेयक कम और राजनीतिक बीमा पॉलिसी अधिक तैयार की गई थी कि जिसमें परिणाम चाहे जो हो, लाभ पहले से सुरक्षित रहना चाहिए।

हिंदुस्तानी राजनीति भी बड़े विचित्र प्रतीकों से भरी है।यहाँ मंचों पर स्त्री-सम्मान का अद्भुत महिमामंडन होता है। कल एक सांसद छाती ठोककर पत्नी के चरण स्पर्श कर संस्कृति का आदर्श प्रस्तुत कर रहे थे,तो वहीं एक अन्य सांसद ने आईना दिखाते हुए यह कह दिया कि महिला उत्पीड़न के मामलों में स्वयं सांसदों का स्थान भी कम अग्रणी नहीं है।

उधर कोई अपनी ही पत्नी का परित्याग कर त्याग और तपस्या की प्रतिमान गढ़ रहा था और चेता रहे थे कि यदि संशोधन उनके असहयोग से गिर गया विरोधियों को संसदीय क्षेत्र तो क्या नरक मे भी उनको स्थान ना मिलेगा।

ऐसे में मेरे मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जब इतने बड़े लोकतांत्रिक रंगमंच पर इतनी सुंदरता से नारी-पूजन, चरण-वंदना और सम्मान का अभिनय किया जाता है, तो मंच से उतरने के बाद ये माननीय अपने घर जाकर अपनी ही पत्नी की आँखों में किस मुँह से देखते होंगे।

नारी-अधिकारों पर इतने ओजस्वी भाषण सुनकर तो मैं क्षणभर को भ्रमित हो गया कि यह संसद है या कोई नैतिक रंगमंच जहाँ संवाद ऊँचे होते हैं, पर यथार्थ हमेशा पर्दे के पीछे ही छूट जाता है।

सच्चाई यह है कि हमारे लोकतंत्र में कई बार विधेयक न्याय के लिए कम और छवि-निर्माण के लिए अधिक लिखे जाते हैं। उनके शब्द बड़े आदर्शवादी होते हैं, घोषणाएँ उससे भी ऊँची, पर जैसे ही नीति और नीयत आमने-सामने आती हैं, आदर्श सबसे पहले औंधे मुँह गिरते दिखाई देते हैं।

मुझे समझ आया कि भारतीय लोकतंत्र की भी क्या अजीब खूबसूरती है। भाषणों में नारी-सम्मान सबसे ऊँचा है, और राजनीति में उसकी उपयोगिता ऐसी की चाणक्य की आत्मा रो दे ! वातवाकिता मे यह पूरा स्वांग वैसे ही रचा गया था जैसे ग्राहकों (वोटर) को आकर्षित करने के लिए साड़ी की दुकान (चुनाव ) के बाहर खड़ी डमी जिसे सजाकर सामने रखा जाता है, पर जिसकी अपनी कोई आवाज़ नहीं होती।

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घड़ियालों आँसू बहाने के बजाय भाजपा पहले अपने संगठन मे पचास प्रतिशत पद दे और चुनाव मे पचास प्रतिशत टिकट महिलाओं को दे ।पचास प्रतिशत महिला आबादी को तैतीस प्रतिशत आरक्षण का फ़ार्मूला पता नहीं कहाँ से आया वास्तव मे ये पचास प्रतिशत होना चाहिए ।।इसके लिए भाजपा को टींएमसी से सीख लेनी चाहिए ममता बनर्जी की पार्टी में लगभग चालीस प्रतिशत सांसद महिला है बिना किसी आरक्षण के ।इसे कहा जाता है सही और साफ नीयत ।महिलाओं की भागीदारी नीयत से बढ़ेगी आरक्षण लागू हो भी गया और नीयत साफ न हुई तो यह आरक्षण केवल झुनझुना रह जाएगा ठीक वैसे ही जैसे दलितों के लिए और पिछड़ों के लिए आरक्षण है लेकिन उनके लिए आरक्षित सीट कोई न कोई बहाना मिलाकर खाली रखा जाता है इसलिए नीयत ज़्यादा महत्वपूर्ण है ।

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