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अपने अंतिम दिनों में, शीला दीक्षित की बेटी के मुस्लिम पति मोहम्मद इमरान द्वारा अपनी बेटी लतिका के साथ किए गए धोखे और विश्वासघात से बहुत आहत और परेशान थीं, जिसने माँ और बेटी दोनों का पैसा और संपत्ति ले ली…लतीका को छोड़ दिया और उनकी भांजी के साथ भाग गया।

शीला दीक्षित की बेटी लतिका ने 1996 में इमरान से शादी की, शीलाजी 15 साल सन 2013 तक मुख्यमंत्री रहीं पर जैसे ही वो पद से हटी मुस्लिम दामाद ने परेशान करना शुरू कर दिया बेटी को जो शादी के 20 साल बाद 2016 में भाग गया, उसकी सारी चल अचल संपत्ति धोखे से ले ली। लतिका की एफआईआर पर साल 2016 में इमरान को गिरफ्तार भी किया गया था। लतिका ने आरोप लगाया कि इमरान के किसी दूसरी महिला से संबंध थे, इसलिए वह उसे मारता पीटता था और उसके साथ बुरा बर्ताव करता था।

दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में चल रही चर्चा के मुताबिक शीला दीक्षित की जिंदगी भर की कमाई का हिसाब उनके मुस्लिम दामाद रखते थे…. मामला पुलिस तक गया, लेकिन मुस्लिम दामाद द्वारा ब्लैकमेल करने की धमकी के चलते गैर कानूनी कमाई का राज खोलने के लिए शीला दीक्षित रहीं खामोश। इस घटना ने शीला दीक्षित के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर असर डाला और अंततः उनकी मृत्यु का कारण बनी

पहली मूर्खता ताकतवर मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की बेटी लतिका ने शादी में एक जिहादी पर आंख मूंदकर भरोसा करके की, दूसरी मूर्खता अनुभवी मुख्यमंत्री मां शीला ने अपनी कमाई और खाते को संभालने के लिए मुस्लिम दामाद पर आंख मूंदकर भरोसा करके की…तीसरी सबसे बड़ी मूर्खता की थी शीला की भांजी ने बेवफा और धोखेबाज इमरान के साथ भागकर….

इस घटना से बड़ी सीख लेनी चाहिए… एक साधारण आम मुसलमान किसी राज्य के शक्तिशाली मुख्यमंत्री, उसकी बेटी और भतीजी के साथ मिलकर उसकी व्यक्तिगत और राजनीतिक छवि को धूमिल करते हुए, उसके जीवन, परिवार को नष्ट करने के लिए इतना बड़ा षड्यंत्र रच सकता है लेकिन वह उसके खिलाफ कुछ नहीं कर सकती, फिर एक आम आदमी क्या करेगा और कर सकता है?!!

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घड़ियालों आँसू बहाने के बजाय भाजपा पहले अपने संगठन मे पचास प्रतिशत पद दे और चुनाव मे पचास प्रतिशत टिकट महिलाओं को दे ।पचास प्रतिशत महिला आबादी को तैतीस प्रतिशत आरक्षण का फ़ार्मूला पता नहीं कहाँ से आया वास्तव मे ये पचास प्रतिशत होना चाहिए ।।इसके लिए भाजपा को टींएमसी से सीख लेनी चाहिए ममता बनर्जी की पार्टी में लगभग चालीस प्रतिशत सांसद महिला है बिना किसी आरक्षण के ।इसे कहा जाता है सही और साफ नीयत ।महिलाओं की भागीदारी नीयत से बढ़ेगी आरक्षण लागू हो भी गया और नीयत साफ न हुई तो यह आरक्षण केवल झुनझुना रह जाएगा ठीक वैसे ही जैसे दलितों के लिए और पिछड़ों के लिए आरक्षण है लेकिन उनके लिए आरक्षित सीट कोई न कोई बहाना मिलाकर खाली रखा जाता है इसलिए नीयत ज़्यादा महत्वपूर्ण है ।

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