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ट्रम्प ने हमला रोक देने का ऐलान कर दिया है। यह ऐलान अपने उस डेडलाइन से ठीक डेढ़ घण्टे पहले ट्रम्प ने किया जिसमें उन्होंने ईरानी सभ्यता को बीती रात नक्शे से मिटा देने की कसम खाई थी, जैसा कि वह कई बार कसम खाते और तोड़ते रहे हैं।

उधर ईरानी सुप्रीम काउंसिल के साथ विदेश मंत्री अब्बास अघारची ने भी कहा कि 10 अप्रैल से इस्लामाबाद में वार्ता होगी। वार्ता के लिए 15 दिन तय हुए।

ट्रम्प ने भी कहा कि अब बातचीत जारी रहने तक सीज फायर लागू रहेगा।

ट्रम्प ने और ईरान ने एक स्वर में इसका क्रेडिट पाकिस्तान को दिया।

फिलवक्त बात यह तय हुई कि 15 दिनों तक दोनों तरफ से हमले बंद रहेंगे। स्ट्रेट ऑफ हिर्मुज को ईरान 15 दिनों तक फ्री फ़ॉर आल कर देगा।

वार्ता

ईरान ने कहा कि वार्ता इस बात पर होगी कि ईरान पर लगी पाबंदियां खत्म हो। तेल बेचने की आज़ादी मिले। युद्ध की क्षतिपूर्ती हो।यूरेनियम संवर्धन पर रोक हटे।

भयंकर तबाही की आशंका पर विराम लगाने के सफल प्रयास के लिए अमेरिका और ईरान ने शाहबाज शरीफ और फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को इसका क्रेडिट दिया।

“पाकिस्तान ने 15 दिनों के लिए युद्ध रुकवा दी पापा।”

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इतिहास गवाह है कि जो जड़ें अपनी मिट्टी को धोखा देती हैं, वे महलों के गमलों में ज्यादा दिन तक हरी नहीं रह सकतीं। आज राहुल गांधी का उदय हो रहा है और गद्दारों का भविष्य अंधकार की गहरी खाइयों की ओर बढ़ चुका है।”सत्ता का मोह बनाम वैचारिक अडिगता: राहुल गांधी का सशक्त नेतृत्व और दलबदलू नेताओं का पतनभारतीय राजनीति के वर्तमान दौर में निष्ठा और सिद्धांतों की परिभाषा बदली है, लेकिन इस बदलते दौर में भी एक नाम जो चट्टान की तरह अपनी विचारधारा पर खड़ा रहा, वह है राहुल गांधी। जहाँ एक तरफ राहुल गांधी ने सत्ता की चकाचौंध के बजाय संघर्ष और तपस्या का रास्ता चुना, वहीं दूसरी ओर हिमंत बिस्वा सरमा और ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे नेताओं ने व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और सत्ता के लालच में उस विचारधारा की पीठ में छुरा घोंपा जिसने उन्हें पहचान दी। आज का राजनीतिक परिदृश्य स्पष्ट रूप से संकेत दे रहा है कि राहुल गांधी एक सशक्त जननायक बनकर उभरे हैं, जबकि गद्दारी करने वाले नेताओं का भविष्य अंधकार की ओर बढ़ रहा है।अवसरवाद की मिसाल हिमंत बिस्वा सरमा और ज्योतिरादित्य सिंधियाहिमंत बिस्वा सरमा का कांग्रेस छोड़ना किसी नीतिगत विरोध का परिणाम नहीं, बल्कि सत्ता की असीमित भूख थी। जिस पार्टी ने उन्हें असम की राजनीति में स्थापित किया, उसी के नेतृत्व पर उन्होंने बेबुनियाद आरोप लगाए। राहुल गांधी पर निशाना साधकर उन्होंने भाजपा में अपनी जगह तो बना ली, लेकिन आज वे अपनी प्रासंगिकता बचाए रखने के लिए विभाजनकारी राजनीति का सहारा लेने को मजबूर हैं। भाजपा जैसी कैडर-आधारित पार्टी में हिमंत जैसे ‘बाहरी’ नेता का उपयोग केवल एक सीमित समय तक है। जैसे ही उनकी उपयोगिता समाप्त होगी, वे हाशिए पर धकेल दिए जाएंगे। उनका भविष्य एक ऐसी अंधी गली की ओर जा रहा है जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं है।यही हाल ‘महाराज’ कहे जाने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया का है। सिंधिया ने मध्य प्रदेश में जनमत का अपमान किया और अपनी ही पार्टी की सरकार गिरा दी। जिस राहुल गांधी ने उन्हें अपना भाई माना और राजनीति के शिखर पर बैठाया, सिंधिया ने उसी दोस्ती को सत्ता की कुर्सी के लिए बेच दिया। आज सिंधिया की हालत भाजपा में एक साधारण कार्यकर्ता से भी बदतर है। जिस स्वाभिमान की बात कर उन्होंने कांग्रेस छोड़ी थी, आज वही स्वाभिमान भाजपा के अनुशासन और बड़े नेताओं के आदेशों के नीचे दब चुका है। ग्वालियर-चंबल की जनता ने भी अब उन्हें वह सम्मान देना बंद कर दिया है जो कांग्रेस में रहते हुए उन्हें मिलता था। सिंधिया का राजनीतिक पतन शुरू हो चुका है और यह जल्द ही पूर्ण अंधकार में बदल जाएगा।इसके विपरीत, राहुल गांधी ने पिछले कुछ वर्षों में खुद को एक ऐसे नेता के रूप में स्थापित किया है जो न सत्ता से डरता है और न ही जांच एजेंसियों से। उन्होंने ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के माध्यम से देश की रग-रग को समझा और नफरत के बाजार में मोहब्बत की दुकान खोलने का साहस दिखाया। उनके हालिया भाषणों में जो आक्रामकता और स्पष्टता दिखती है, वह एक सच्चे नेता की पहचान है। राहुल गांधी ने साबित कर दिया कि वे किसी भी कीमत पर अपनी विचारधारा से समझौता नहीं करेंगे।आज राहुल गांधी के पास खोने के लिए कुछ नहीं है और पाने के लिए पूरा भारत है। उन्होंने कांग्रेस को उन ‘डरपोक’ और ‘लालची’ नेताओं से मुक्त कर दिया है जो केवल सत्ता की मलाई खाने के लिए पार्टी में थे। आज की कांग्रेस राहुल गांधी के नेतृत्व में पहले से कहीं अधिक एकजुट और वैचारिक रूप से मजबूत है।जो लोग आज यह कयास लगा रहे हैं कि शायद सिंधिया या सरमा की कभी कांग्रेस में वापसी हो सकती है, उन्हें राहुल गांधी के कड़े तेवरों को समझना चाहिए। राहुल गांधी के वर्तमान भाषण और उनकी कार्यशैली से यह स्पष्ट संदेश मिलता है कि “गद्दारों के लिए कांग्रेस में कोई स्थान नहीं है।” राहुल गांधी ने साफ कर दिया है कि जो लोग विचारधारा की लड़ाई बीच में छोड़कर भाग गए और जिन्होंने पार्टी के सबसे कठिन समय में पीठ दिखाई, वे अब कभी भी इस परिवार का हिस्सा नहीं बन सकते। पार्टी अब नए और निष्ठावान कार्यकर्ताओं की फौज खड़ी कर रही है जो राहुल गांधी के विजन को आगे बढ़ा सकें।

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