प्रत्येक स्कूल में मैनेजमेंट क्या नौटंकी खेलता है सरकार को सब पता है उसके बावजूद भी देश की सरकार किसी भी स्कूल कॉलेज मैनेजमेंट प्रबंध तंत्र को सजा नहीं देती जबकि सरकार को चाहिए कि देश के सभी सरकार से सहायता प्राप्त स्कूल कॉलेज आदि का राष्ट्रीयकरण के तहत अपने नियंत्रण में स्कूल कॉलेज आदि को ले ले नहीं तो स्कूल कॉलेज के मैनेजमेंट जिन्हें पर बंद तंत्र भी कहते हैं हिंदी में शिक्षा का शिक्षा नाश स्कूल का सत्यानाश अध्यापकों का सट्टा नाश करके ही छोड़ते हैं अस म कॉलेज चंदौसी में मेरे भाई के साथ भी एसएम कॉलेज चंदौसी प्रबंध तंत्र पिछले लगभग 23 सालों से दादागिरी तानाशाही कर रहा है और 99% कॉलेज के अन्य स्टाफ के साथ में भी शायद तानाशाही हो जो उजागर हो चुकी है
देश के लगभग 10% स्कूल कॉलेज के प्रबंध तंत्र मैनेजमेंट जिसे कहते हैं नालायक साजिश करता नहीं होते
Bysubhashchand4
Aug 18, 2025Related Post
सिर्फ चुनाव नहीं हारा था, अहंकार भी पराजित हुआ था!जुलाई 2022 में संसद के गलियारों में एक स्वर बार-बार सुनाई दे रहा था— “जवाब दो सोनिया गांधी…” “सुनो सोनिया गांधी…” “माफ़ी मांगो सोनिया गांधी…”अधीर रंजन चौधरी के एक बयान को लेकर तत्कालीन केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी से तीखे अंदाज़ में सवाल किए। राजनीतिक बहस और आरोप-प्रत्यारोप लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन राजनीति में शब्दों और व्यवहार की मर्यादा भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।कहा जाता है कि उस घटना ने कांग्रेस नेतृत्व, विशेषकर राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को भीतर तक प्रभावित किया। इसके बाद अमेठी में राजनीतिक संघर्ष केवल चुनावी मुकाबला नहीं रहा, बल्कि प्रतिष्ठा और सम्मान का प्रश्न भी बन गया।2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने अमेठी से अपने समर्पित कार्यकर्ता किशोरी लाल शर्मा को उम्मीदवार बनाया। चुनाव प्रचार की कमान प्रियंका गांधी ने संभाली और परिणाम सबके सामने था। स्मृति ईरानी को भारी अंतर से पराजय का सामना करना पड़ा।राजनीति के जानकार इस परिणाम को केवल चुनावी हार नहीं, बल्कि सत्ता और पद के अहंकार पर जनता के निर्णय के रूप में भी देखते हैं।सत्ता स्थायी नहीं होती। पद, प्रतिष्ठा और अधिकार समय के साथ आते-जाते रहते हैं। जो स्थायी रहता है, वह है व्यक्ति का व्यवहार, उसकी विनम्रता और लोगों के प्रति उसका सम्मान।यही कारण है कि इतिहास बार-बार हमें सिखाता है—”ये सत्ता का दबदबा, ये हुकूमत, ये दौलत का नशा, किरायेदार हैं सब, घर बदलते रहते हैं।”पद का अहंकार कभी नहीं करना चाहिए। आज जो शिखर पर है, कल उसे भी जनता के बीच खड़ा होना पड़ सकता है। इसलिए शब्दों में संयम, व्यवहार में विनम्रता और विरोधियों के प्रति भी सम्मान बनाए रखना ही सच्चे नेतृत्व की पहचान है।
Jun 21, 2026
subhashchand4
