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बागपत ::- बसौद गांव में मंगलवार को किसान मजदूर संगठन के कार्यकर्ताओं की बैठक हुई। राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अनु मलिक ने कहा कि किसानों की समस्या को लेकर 30 अक्तूबर को कलक्ट्रेट में पंचायत की जाएगी और फिर आंदोलन करने की रणनीति तैयार की जाएगी। उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार किसानों का उत्पीड़न कर रही और किसानों की समस्या को लेकर गंभीर नहीं है। किसानों का गन्ना बकाया भुगतान तक नहीं किया जा रहा है। यदि किसान धरना-प्रदर्शन करते हैं तो उनपर मुकदमा दर्ज कर दिया जाता है। ऊर्जा निगम भी छापामार कार्रवाई कर किसानों का उत्पीड़न कर रहा है और जबरन स्मार्ट मीटर लगाकर किसानों को परेशान करने का कार्य किया जा रहा। राष्ट्रीय विधिक सलाहकार अवध प्रताप सिसौदिया ने कहा कि वर्तमान सरकार उद्योपतियों की सरकार है। जिलाध्यक्ष कालूराम हिलवाड़ी ने कहा कि गन्ना मूल्य कम से कम 500 रुपये निर्धारित होना चाहिए। बताया कि 30 अक्तूबर को कलक्ट्रेट में होने वाले किसान बैठक में राष्ट्रीय अध्यक्ष ठा. पूरण सिंह शामिल होंगे।

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सिर्फ चुनाव नहीं हारा था, अहंकार भी पराजित हुआ था!जुलाई 2022 में संसद के गलियारों में एक स्वर बार-बार सुनाई दे रहा था— “जवाब दो सोनिया गांधी…” “सुनो सोनिया गांधी…” “माफ़ी मांगो सोनिया गांधी…”अधीर रंजन चौधरी के एक बयान को लेकर तत्कालीन केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी से तीखे अंदाज़ में सवाल किए। राजनीतिक बहस और आरोप-प्रत्यारोप लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन राजनीति में शब्दों और व्यवहार की मर्यादा भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।कहा जाता है कि उस घटना ने कांग्रेस नेतृत्व, विशेषकर राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को भीतर तक प्रभावित किया। इसके बाद अमेठी में राजनीतिक संघर्ष केवल चुनावी मुकाबला नहीं रहा, बल्कि प्रतिष्ठा और सम्मान का प्रश्न भी बन गया।2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने अमेठी से अपने समर्पित कार्यकर्ता किशोरी लाल शर्मा को उम्मीदवार बनाया। चुनाव प्रचार की कमान प्रियंका गांधी ने संभाली और परिणाम सबके सामने था। स्मृति ईरानी को भारी अंतर से पराजय का सामना करना पड़ा।राजनीति के जानकार इस परिणाम को केवल चुनावी हार नहीं, बल्कि सत्ता और पद के अहंकार पर जनता के निर्णय के रूप में भी देखते हैं।सत्ता स्थायी नहीं होती। पद, प्रतिष्ठा और अधिकार समय के साथ आते-जाते रहते हैं। जो स्थायी रहता है, वह है व्यक्ति का व्यवहार, उसकी विनम्रता और लोगों के प्रति उसका सम्मान।यही कारण है कि इतिहास बार-बार हमें सिखाता है—”ये सत्ता का दबदबा, ये हुकूमत, ये दौलत का नशा, किरायेदार हैं सब, घर बदलते रहते हैं।”पद का अहंकार कभी नहीं करना चाहिए। आज जो शिखर पर है, कल उसे भी जनता के बीच खड़ा होना पड़ सकता है। इसलिए शब्दों में संयम, व्यवहार में विनम्रता और विरोधियों के प्रति भी सम्मान बनाए रखना ही सच्चे नेतृत्व की पहचान है।

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