Spread the love

देहरादून ::- चारधाम यात्रा में गंगोत्री, केदारनाथ व यमुनोत्री धाम के कपाट बंद होने तक दर्शन करने वाले तीर्थयात्रियों का आंकड़ा 50 लाख पार हो जाएगा। 22 अक्तूबर को गंगोत्री धाम के कपाट विधि विधान से बंद होने के बाद मां गंगा की डोली शीतकालीन प्रवास स्थल मुखबा के लिए प्रस्थान करेगी। जबकि केदारनाथ व यमुनोत्री धाम के कपाट 23 अक्तूबर को बंद होंगे। 30 अप्रैल 2025 को गंगोत्री व यमुनोत्री धाम के कपाट खुलने से चारधाम यात्रा का आगाज हुआ। जबकि दो मई को केदारनाथ व चार मई को बदरीनाथ धाम के कपाट खुलने के बाद चारधाम यात्रा पूर्ण रूप से संचालित हुई। पर्यटन विभाग के आंकड़ों के अनुसार चारधाम यात्रा में 21 अप्रैल तक दर्शन करने वाले कुल श्रद्धालुओं की संख्या 49.30 लाख से अधिक हो चुकी है। तीनों धामों के कपाट बंद होने तक यह आंकड़ा 50 लाख पार हो जाएगा। यात्रा के अंतिम पड़ाव में धामों में प्रतिदिन 10 से 11 हजार श्रद्वालु दर्शन कर रहे हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You missed

सिर्फ चुनाव नहीं हारा था, अहंकार भी पराजित हुआ था!जुलाई 2022 में संसद के गलियारों में एक स्वर बार-बार सुनाई दे रहा था— “जवाब दो सोनिया गांधी…” “सुनो सोनिया गांधी…” “माफ़ी मांगो सोनिया गांधी…”अधीर रंजन चौधरी के एक बयान को लेकर तत्कालीन केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी से तीखे अंदाज़ में सवाल किए। राजनीतिक बहस और आरोप-प्रत्यारोप लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन राजनीति में शब्दों और व्यवहार की मर्यादा भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।कहा जाता है कि उस घटना ने कांग्रेस नेतृत्व, विशेषकर राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को भीतर तक प्रभावित किया। इसके बाद अमेठी में राजनीतिक संघर्ष केवल चुनावी मुकाबला नहीं रहा, बल्कि प्रतिष्ठा और सम्मान का प्रश्न भी बन गया।2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने अमेठी से अपने समर्पित कार्यकर्ता किशोरी लाल शर्मा को उम्मीदवार बनाया। चुनाव प्रचार की कमान प्रियंका गांधी ने संभाली और परिणाम सबके सामने था। स्मृति ईरानी को भारी अंतर से पराजय का सामना करना पड़ा।राजनीति के जानकार इस परिणाम को केवल चुनावी हार नहीं, बल्कि सत्ता और पद के अहंकार पर जनता के निर्णय के रूप में भी देखते हैं।सत्ता स्थायी नहीं होती। पद, प्रतिष्ठा और अधिकार समय के साथ आते-जाते रहते हैं। जो स्थायी रहता है, वह है व्यक्ति का व्यवहार, उसकी विनम्रता और लोगों के प्रति उसका सम्मान।यही कारण है कि इतिहास बार-बार हमें सिखाता है—”ये सत्ता का दबदबा, ये हुकूमत, ये दौलत का नशा, किरायेदार हैं सब, घर बदलते रहते हैं।”पद का अहंकार कभी नहीं करना चाहिए। आज जो शिखर पर है, कल उसे भी जनता के बीच खड़ा होना पड़ सकता है। इसलिए शब्दों में संयम, व्यवहार में विनम्रता और विरोधियों के प्रति भी सम्मान बनाए रखना ही सच्चे नेतृत्व की पहचान है।

sbobet88

×