बागपत ::- दीपावली पर्व पर पटाखे छोड़ने को लेकर शहर के देवी चौक मोहल्ले में कुछ युवकों ने महिला मोनी के परिवार पर लाठी-डंडों से हमला कर दिया। मोनी ने पथराव करने का भी आरोप लगाया। वहां आए पुलिसकर्मियों ने किसी तरह मामला शांत कराकर दोनों पक्षों के पांच युवकों को गिरफ्तार कर शांतिभंग में कार्रवाई कर दी। झंकार गली निवासी मोनी ने बताया कि उसकी जेठानी देवी चौक मोहल्ले में रहती है। सोमवार देर रात दीपावली पर्व पर उसका बेटा और जेठानी के बेटे अपने घर के बाहर पटाखे छोड़ रहे थे। तभी आसपास के युवक वहां आकर तीनों के साथ गाली-गलौज करने लगे और लाठी-डंडों से हमला कर दिया। परिवार के लोगों ने वहां जाकर बीच बचाव कराने का प्रयास किया तो हमलावरों के परिवार वालों ने भी लाठी-डंडों से हमला कर दिया और पथराव करते हुए जान से मारने की धमकी देकर भाग गए। घायल किशोरों का सीएचसी में उपचार कराया गया। उधर, झगड़े की सूचना पर वहां आए पुलिसकर्मियों ने किसी तरह मामला शांत कराया और आपस में झगड़ा करने पर पांच युवकों को पकड़ लिया। जांच अधिकारी दीक्षित कुमार त्यागी ने बताया कि महताब, उसके भाई सोनू, भीम और उसके बेटे समेत पांच के खिलाफ शांतिभंग की कार्रवाई की गई।
Related Post
सिर्फ चुनाव नहीं हारा था, अहंकार भी पराजित हुआ था!जुलाई 2022 में संसद के गलियारों में एक स्वर बार-बार सुनाई दे रहा था— “जवाब दो सोनिया गांधी…” “सुनो सोनिया गांधी…” “माफ़ी मांगो सोनिया गांधी…”अधीर रंजन चौधरी के एक बयान को लेकर तत्कालीन केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी से तीखे अंदाज़ में सवाल किए। राजनीतिक बहस और आरोप-प्रत्यारोप लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन राजनीति में शब्दों और व्यवहार की मर्यादा भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।कहा जाता है कि उस घटना ने कांग्रेस नेतृत्व, विशेषकर राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को भीतर तक प्रभावित किया। इसके बाद अमेठी में राजनीतिक संघर्ष केवल चुनावी मुकाबला नहीं रहा, बल्कि प्रतिष्ठा और सम्मान का प्रश्न भी बन गया।2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने अमेठी से अपने समर्पित कार्यकर्ता किशोरी लाल शर्मा को उम्मीदवार बनाया। चुनाव प्रचार की कमान प्रियंका गांधी ने संभाली और परिणाम सबके सामने था। स्मृति ईरानी को भारी अंतर से पराजय का सामना करना पड़ा।राजनीति के जानकार इस परिणाम को केवल चुनावी हार नहीं, बल्कि सत्ता और पद के अहंकार पर जनता के निर्णय के रूप में भी देखते हैं।सत्ता स्थायी नहीं होती। पद, प्रतिष्ठा और अधिकार समय के साथ आते-जाते रहते हैं। जो स्थायी रहता है, वह है व्यक्ति का व्यवहार, उसकी विनम्रता और लोगों के प्रति उसका सम्मान।यही कारण है कि इतिहास बार-बार हमें सिखाता है—”ये सत्ता का दबदबा, ये हुकूमत, ये दौलत का नशा, किरायेदार हैं सब, घर बदलते रहते हैं।”पद का अहंकार कभी नहीं करना चाहिए। आज जो शिखर पर है, कल उसे भी जनता के बीच खड़ा होना पड़ सकता है। इसलिए शब्दों में संयम, व्यवहार में विनम्रता और विरोधियों के प्रति भी सम्मान बनाए रखना ही सच्चे नेतृत्व की पहचान है।
Jun 21, 2026
subhashchand4
