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प्रेस नोट*
नगर विकास विभाग,उत्तर प्रदेश शासन से प्राप्त आदेश के क्रम में नगर पालिका परिषद बागपत के अधिशासी अधिकारी कृष्ण कुमार भड़ाना के पर्यवेक्षण में जिलाधिकारी अस्मिता लाल के निर्देश अनुसार स्वच्छता ही सेवा कार्यक्रम के अंतर्गत (17 सितंबर 2 अक्टूबर 2025) पालिका के वार्ड 10 के तिकोना पार्क में तथा वार्ड 16 ठाकुरद्वारा के मुख्य बाजार में “1 दिन, 1 घंटा, 1 साथ” श्रमदान कार्यक्रम माननीय जनप्रतिनिधियों, वार्डवासियों तथा पालिका की टीम के साथ स्वच्छता हेतु श्रमदान किया गया।
तत्पश्चात लोगों से अपील भी की गई कि अपने घरों से निकलने वाले कूड़े को गीला कूड़े एवं सूखा कूड़े में पृथक्करण (अलग-अलग) करके ही पालिका को उपलब्ध कराए।
प्रतिबंधित सिंगल यूज़ पॉलिथीन के उपयोग को न करने तथा उसके स्थान पर पर्यावरण हितैषी सामग्री जैसे – जूट बैग/कपड़े का बैग का उपयोग करने का भी संदेश दिया गया और लोगों को समझाया गया कि इस प्रकार के श्रमदान कार्यक्रम स्वच्छता के प्रति लोगों मे जागरूकता बढ़ाता है, सामुदायिक भागीदारी को प्रोत्साहित करते हैं, जिससे शहर को स्वच्छ और सुंदर बनाने में मदद मिलती है। इस कार्यक्रम में श्री भविचंद सभासद वार्ड 10, श्री मोहन चौहान सभासद वार्ड 16 तथा पालिका की टीम व आम जनमानस ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया।

सूचना विभाग बागपत

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सिर्फ चुनाव नहीं हारा था, अहंकार भी पराजित हुआ था!जुलाई 2022 में संसद के गलियारों में एक स्वर बार-बार सुनाई दे रहा था— “जवाब दो सोनिया गांधी…” “सुनो सोनिया गांधी…” “माफ़ी मांगो सोनिया गांधी…”अधीर रंजन चौधरी के एक बयान को लेकर तत्कालीन केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी से तीखे अंदाज़ में सवाल किए। राजनीतिक बहस और आरोप-प्रत्यारोप लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन राजनीति में शब्दों और व्यवहार की मर्यादा भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।कहा जाता है कि उस घटना ने कांग्रेस नेतृत्व, विशेषकर राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को भीतर तक प्रभावित किया। इसके बाद अमेठी में राजनीतिक संघर्ष केवल चुनावी मुकाबला नहीं रहा, बल्कि प्रतिष्ठा और सम्मान का प्रश्न भी बन गया।2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने अमेठी से अपने समर्पित कार्यकर्ता किशोरी लाल शर्मा को उम्मीदवार बनाया। चुनाव प्रचार की कमान प्रियंका गांधी ने संभाली और परिणाम सबके सामने था। स्मृति ईरानी को भारी अंतर से पराजय का सामना करना पड़ा।राजनीति के जानकार इस परिणाम को केवल चुनावी हार नहीं, बल्कि सत्ता और पद के अहंकार पर जनता के निर्णय के रूप में भी देखते हैं।सत्ता स्थायी नहीं होती। पद, प्रतिष्ठा और अधिकार समय के साथ आते-जाते रहते हैं। जो स्थायी रहता है, वह है व्यक्ति का व्यवहार, उसकी विनम्रता और लोगों के प्रति उसका सम्मान।यही कारण है कि इतिहास बार-बार हमें सिखाता है—”ये सत्ता का दबदबा, ये हुकूमत, ये दौलत का नशा, किरायेदार हैं सब, घर बदलते रहते हैं।”पद का अहंकार कभी नहीं करना चाहिए। आज जो शिखर पर है, कल उसे भी जनता के बीच खड़ा होना पड़ सकता है। इसलिए शब्दों में संयम, व्यवहार में विनम्रता और विरोधियों के प्रति भी सम्मान बनाए रखना ही सच्चे नेतृत्व की पहचान है।

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