जनता टैक्स दे रही थी अस्पताल के लिए, स्कूल के लिए, सिंचाई के लिए, रोजगार के लिए। बदले में उसे पोस्टर मिले। लोकतंत्र को सेल्फी स्टूडियो बना दिया गया।
चुनाव के समय मुफ्त योजनाओं की बरसात हुई। मुफ्त राशन, मुफ्त नकद, मुफ्त वादे। मुफ्त अगर शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और सामाजिक सुरक्षा के लिए हो तो समझ आता है। मगर जब मुफ्त चीजें वोट कैलेंडर देखकर बाँटी जाएँ और उत्पादन बढ़ाने पर ध्यान न हो, तब घाटा बढ़ता है।
घाटा बढ़े तो कर्ज बढ़ता है। कर्ज बढ़े तो भरोसा घटता है। भरोसा घटे तो रुपया गिरता है। फिर जनता से कहा जाता है विश्वगुरु बन रहे हैं। आदमी सिलेंडर भराने जाए या विश्वगुरु का पोस्टर चूमे।
डॉलर ₹95.40 का मतलब है पेट्रोल महंगा, डीजल महंगा, ट्रांसपोर्ट महंगा, दाल महंगी, गैस महंगी, मोबाइल महंगा, दवा महंगी। किसान की लागत बढ़ेगी। दुकानदार की ढुलाई बढ़ेगी। नौकरीपेशा आदमी की बचत घटेगी। गरीब आदमी की थाली छोटी होगी। मध्यम वर्ग EMI और महंगाई के बीच पिसेगा।
लेकिन टीवी पर बहस फिर भी विपक्ष के बयान पर होगी। असली मुद्दों को गायब करने की कला विश्वस्तरीय है।
भक्तों से सवाल है। जब कांग्रेस के समय डॉलर बढ़ता था तब राष्ट्र संकट में पड़ जाता था। अब ₹95.40 पर राष्ट्र मौन क्यों है। तब पेट्रोल बढ़े तो लूट, अब बढ़े तो वैश्विक कारण। तब रुपया गिरे तो निकम्मी सरकार, अब गिरे तो विश्व परिस्थिति। तब सवाल देशभक्ति था, अब सवाल देशद्रोह है। यह भक्ति नहीं, मानसिक किराएदारी है मानसिक ग़ुलामी है।
सरकार को क्या करना चाहिए प्रचार पर खर्च घटाओ। इवेंट मैनेजमेंट बंद करो। MSME को सस्ता कर्ज दो। निर्यात उद्योग बढ़ाओ। तेल आयात निर्भरता घटाओ। शिक्षा और स्किलिंग पर पैसा लगाओ। RBI को पेशेवर ढंग से काम करने दो।
30 अप्रैल 2026 सिर्फ तारीख नहीं है। यह वह दिन है जब दावों की ऊँचाई और रुपये की गिरावट एक साथ दिखी। जनता से अच्छे दिन मांगे गए थे, बदले में महंगा जीवन मिला।
अब भी जो ताली बजा रहा है, उससे जेब चेक कर लेना। शायद वह अपनी नहीं, तुम्हारी कटवा रहा है।
