यह ऐसी सरकार है जो श्मशान की कतारों को भी ‘मास्टरस्ट्रोक’ बता सकती है, बशर्ते पीछे से देशभक्ति का बैकग्राउंड म्यूजिक बज रहा हो।
इनके लिए इंसान सिर्फ एक ‘वोट’ है, और उसकी मौत हेडलाइन बदलने का एक और मौका।”
देश की आधी आबादी 5 किलो मुफ्त अनाज के लिए लाइन में लगी है, उस देश का राजा अपने लिए हजारों करोड़ का महल (सेंट्रल विस्टा) बनवा रहा है। इसे ‘फकीरी’ नहीं, ‘बेशर्मी’ कहते हैं। जनता को ‘त्याग’ की सलाह देते हैं और खुद ‘मयूर पंख’ वाली स्टाइल में फोटो खिंचवाते हैं।
यह ऐसा लोकतंत्र है जहाँ जनता का खून निचोड़कर राजा के सिंहासन पर पॉलिश की जा रही है। साहेब का झोला अब इतना भारी हो गया है कि उसमें पूरे देश की उम्मीदें दबकर मर गई हैं।”
नरेंद्र भाई ने रोजगार तो नहीं दिया, लेकिन हर घर में एक ‘छोटा गोएबल्स’ जरूर पैदा कर दिया है। आईटी सेल के नाम पर बेरोजगार युवाओं को ‘नफरत के दिहाड़ी मजदूर’ बना दिया गया है। इनका काम सुबह उठकर किसी को गद्दार घोषित करना और शाम को किसी को भगवान बनाना है।
समाज को उस मोड़ पर खड़ा कर दिया है जहाँ भाई, भाई का गला सिर्फ इसलिए रेतने को तैयार है क्योंकि व्हाट्सएप पर ‘धर्म खतरे में’ होने का मैसेज आया है। यह ‘स्किल इंडिया’ नहीं, ‘किल इंडिया’ की ट्रेनिंग है।”
लोकतंत्र के हर खंभे को अपनी ‘छड़ी’ बना लिया है। सुप्रीम कोर्ट में अब इंसाफ नहीं, ‘सेटिंग’ की बू आती है। चुनाव आयोग अब ‘रिंपायर’ नहीं, बल्कि साहेब की टीम का 12वां खिलाड़ी है। इन्होंने संविधान की किताब को सिर्फ शपथ लेने के लिए रखा है, बाकी काम तो ‘नागपुर की पर्ची’ से होता है।
यह राजतंत्र है, जिसे लोकतंत्र का मुखौटा पहनाकर बेचा जा रहा है। कानून अंधा नहीं है, बल्कि उसने साहेब की वफादारी की पट्टी बांध ली है।”
देश की जनता को लगता है कि वो ‘सरकार’ चुन रही है, जबकि वो अडानी के लिए एक सेल्समैन’ चुन रही है। रेल, तेल, कोयला और आसमान सब कुछ एक ही झोले में जा रहा है। विदेशों में जाकर देश की मार्केटिंग नहीं, बल्कि अपने ‘मित्र’ की डील पक्की करते हैं।
सरकार एक ऐसी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बन गई है जहाँ बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में सिर्फ दो लोग हैं, और 140 करोड़ जनता सिर्फ ‘मजदूर’ है जिन्हें दिवाली पर ‘राष्ट्रवाद का बोनस’ देकर चुप करा दिया जाता है।”
नरेंद्र यूग का इतिहास जब लिखा जाएगा, तो वह कागज के पन्नों पर नहीं, बल्कि उन ‘आंसुओं’ और ‘चीखों’ से लिखा जाएगा
जिन्हें साहेब के ढोल-नगाड़ों ने दबा दिया था। यह दौर विकास का नहीं, बल्कि ‘सामूहिक चेतना के पतन’ का दौर है।”
जय हिन्द।।
