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सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में टोल प्लाजा विवाद के बाद वकीलों द्वारा की गई हिंसा और गुंडागर्दी पर कड़ी नाराजगी जताई। अदालत ने कहा कि ऐसे कृत्यों से वकालत जैसा प्रतिष्ठित पेशा कलंकित और बदनाम हो गया।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने टोल प्लाजा कर्मचारियों को जमानत देते हुए यह टिप्पणी की। अदालत ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) से दोषी वकीलों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने को कहा।

बता दें, यह मामला 14 जनवरी, 2026 को बाराबंकी के एक टोल प्लाजा पर हुए विवाद से जुड़ा है, जहां टोल देने को लेकर झगड़ा हुआ था। इसके बाद टोल कर्मचारियों के खिलाफ मामला दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

स्थिति तब और गंभीर हो गई, जब जिला बार एसोसिएशन के कुछ वकीलों ने आरोपियों का पक्ष न लेने का प्रस्ताव पारित कर दिया। इसके बावजूद एक वकील ने आरोपियों की ओर से जमानत याचिका दायर की, जिसके बाद उनके कार्यालय में तोड़फोड़ की गई और आग लगा दी गई।

सुप्रीम कोर्ट ने इस घटना को बेहद दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि न्याय व्यवस्था से जुड़े लोग ही हिंसा पर उतर आए, जो अस्वीकार्य है।

अदालत ने कहा,

“सहकर्मी भावना समझी जा सकती है लेकिन यह किसी भी तरह से हिंसा और कानून हाथ में लेने को सही नहीं ठहरा सकती।”

अदालत ने यह भी कहा कि आरोपियों को कानूनी सहायता से वंचित किया गया, जिसके कारण उन्हें सीधे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा। यह स्थिति न्याय प्रणाली के मूल सिद्धांतों पर आघात है।

कोर्ट ने पाया कि टोल कर्मचारी अपने कर्तव्य का पालन कर रहे थे और विवाद टोल वसूली को लेकर हुआ था।

अदालत ने कहा कि दो महीने से अधिक समय तक उन्हें हिरासत में रखना पूरी तरह अनुचित है और यह उनके व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार (अनुच्छेद 21) का उल्लंघन है।

इसी आधार पर अदालत ने टोल कर्मचारियों को तत्काल जमानत देने का आदेश दिया।

निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की पूरी कार्यवाही को बाराबंकी से दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट में स्थानांतरित कर दिया। साथ ही उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिया कि आरोपियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।

अदालत ने अपने आदेश की प्रति BCI को भेजने का निर्देश देते हुए स्पष्ट किया कि इस तरह की घटनाओं पर सख्त कार्रवाई जरूरी है, ताकि न्याय व्यवस्था की गरिमा बनी रहे।

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