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मनुष्यों को जानने, मानने और करने की तीन शक्तियाँ मिली हुई है। मानने की शक्ति भगवान् को मानने में, जानने की शक्ति स्वयं को और संसार को जानने में और करने की शक्ति संसार की सेवा में करने में लगानी है। जिसके बारे में कुछ नहीं जानते, वह मानने का विषय होता है, तो ईश्वर मानने का विषय है, भगवान् को जान नहीं सकते, मानना ही पड़ता है। संसार के बारे में जानते तो हैं, लेकिन ठीक नहीं जानते हैं, शरीर-संसार है अलग तरह का और मानते अलग तरह का है, तो संसार जानने का विषय है। ऐसे ही स्वयं के बारे में भी पूरा नहीं जानते हैं, तो स्वयं (स्वरूप) भी जानने का विषय है। मैं शरीर हूँ, मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ हूँ, बदलने वाला हूँ अथवा नहीं बदलने वाला हूँ, शरीर के साथ मेरी एकता है, या स्वयं प्रकृति से अतीत हूँ— ऐसे गहरे उतरकर स्वयं को जानना चाहिए।
छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम सरीरा॥

पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश— इन पाँच तत्त्वों से बना हुआ संसार है और अपना कहलाने वाला शरीर भी पंच भौतिक है, तो शरीर की एकता संसार के साथ है और स्वयं की एकता परमात्मा के साथ है। मैं जो बालकपन में था, वही मैं आज हूँ, लेकिन शरीर पहले वाला नहीं रहा, शरीर तो पूरा ही बदल गया, तो बदलने वाले शरीर की एकता बदलने वाले संसार के साथ है और नहीं बदलने वाले स्वयं की एकता, कभी नहीं बदलने वाले परमात्मा के साथ है, शरीर के साथ मेरी एकता कैसे हो सकती है— यह जानने का विषय है। मेरा है तो पूरा संसार ही मेरा है और मेरा नहीं है तो शरीर भी मेरा नहीं है— यह खास जानने की बात है।

शरीर को हम जैसा चाहें, वैसा रख नहीं सकते हैं, जितने दिन रखना चाहें, उतने दिन नहीं रख सकते, तो शरीर पर अपना अधिपत्य नहीं करें। दूसरी भूल यह होती है कि संसार मेरे काम आ जाय, मेरा आदर हो, मेरी प्रशंसा हो, मेरे को आराम मिले, वस्तुएं भी मुझे मिले, मेरा लाभ हो जाय— ऐसे संसार से लेने-ही-लेने का भाव रहेगा, तो बन्धन कभी मिटेगा ही नहीं और शरीर को संसार की सेवा में लगा दिया, तो बन्धन रह सकेगा नहीं। संसार शरीर के लिए नहीं है, शरीर संसार के लिए है। भारत वर्ष की संस्कृति तो स्पष्टत: ऐसा मानती है कि शरीर के मरने पर भी शरीर वाला रहता है, इसीलिए हम अपने पितरों को पिण्ड-पानी इत्यादि देते हैं।
हमारे पास जो भी रुपये-पैसे, बल-बुद्धि, योग्यता आदि हैं, ये सब संसार से मिले हैं और संसार के ही काम आते हैं। एक मार्मिक बात है कि शरीर हमारे कुछ भी काम नहीं आता है, शरीर में अहंता-ममता का त्याग ही हमारे काम आता है; शरीर के आश्रय के त्याग के लिए यह बात बहुत श्रेष्ठ है। संसार सागर है, यहाँ लेने की इच्छा रही, तो डूब जाएंगे और देते-ही-देते रहे तो तर जाएंगे। भगवान् की चीज भगवान् को दे दी और संसार की चीज संसार को दे दी, तो आनन्द हो जाएगा; सत्संग में स्वभाव ही बदलना है। किसी को बुरा नहीं समझना, बुरा नहीं सोचना और बुरा नहीं करना— तो मनुष्य जन्म सफल हो जाएगा।

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