कितने कद्दावर नेता इस गलतफहमी में थे, रहे और खाली हाथ रह गए। आज वे अपने राजनैतिक अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे है।
अब याद करिये उत्तर प्रदेश के 2017 विधान सभा चुनाव के पहले का वह राजनैतिक घटनाक्रम। आपको याद होगा, तमाम बड़े शहरों में वरुण गाँधी का पोस्टर लग चुका था। उन पोस्टरों में वरुण गाँधी को उत्तर प्रदेश के भावी मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट किया जाने लगा था।
भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को इस तरह से दबाव बनाना खटक गया। आज वरुण गाँधी कहाँ है, किसी को पता भी नहीं। उनका सांसदी का टिकट तक कट गया। भाजपा की केंद्रीय कार्यकारिणी से भी निकाल दिया गया।
ऐसे ही झारखण्ड में किसी जमाने में यशवंत सिंहा पद यात्रा करके अपने को मुख्यमंत्री के रूप में प्रमोट कर रहे थे। उनका सेल्फ प्रोमोशन इतना आत्मघाती सिद्ध हुआ कि वे न घर के रहे न घाट के। और तो और अपने बेटे के पॉलिटिकल कैरियर पर भी ग्रहण लगवा बैठे।
इन लोगों को छोड़िये। मनोज सिन्हा जो कि बहुत ही अनुशासित और योग्य नेता हैं। 2017 में उनको उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाने का भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने मन बना लिया था। जैसे ही खबर लाइम लाइट में आई, मनोज सिन्हा अपने को मुख्यमंत्री मानकर घोषित होने के पहले ही मंदिरों में दर्शन करने लगे।
उनकी इस जरा सी चूक ने उन्हें उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद से वंचित करवा दिया।
अब नया नाम नरोत्तम मिश्र का जुड़ गया। छः बार विधायक रहे हैं। तीन-चार बार मंत्री भी रहे हैं। शिवराज सिंह की सरकार में नम्बर टू की हैसियत पर रहे हैं।
लेकिन समस्या यह हो गयी कि वे पिछली बार विधायकी का चुनाव तब हार गए जब मध्य प्रदेश में भाजपा को सर्वकालिक प्रचंडतम बहुमत प्राप्त हुआ था। उसके पहले का चुनाव भी बमुश्किल दो- ढाई हजार वोट से ही जीत पाए थे।
इतने कद्दावर नेता को तभी संभल जाना चाहिए था, लेकिन नहीं संभले और अगला चुनाव हार गए।
इस बार भाजपा के आंतरिक सर्वे में भी उनकी दशा ठीक नहीं मिली।
ऊपर से वहाँ के निवर्तमान विधायक के अयोग्य घोषित होने के बाद उनकी सक्रियता ऐसी हुई जैसे उन्होंने मान लिया हो कि भाजपा उनके अलावा किसी और को टिकट देने का साहस भी नहीं करेगी। वे भाजपा नेतृत्व को बिना विश्वास में लिए क्षेत्र में चुनावी रैलियां करने लगे।
यह भी एक तरह का सेल्फ प्रोमोशन ही था।
उनका टिकट वैसे भी कटता। लेकिन इतना तय था कि उनको दरकिनार नहीं किया जाता। संगठन में ही सही, उन्हें जगह जरूर मिलती।
लेकिन उनका टिकट कटने के बाद उनके समर्थकों ने जो हंगामा किया, संभवतः इस घटना ने उनके कैरियर पर अब पूर्ण विराम लगा दिया है।
वे दिल्ली आये लेकिन उनसे न नितिन नबीन मिले और न ही अमित शाह।
थक- हार वे यह कहते हुए वापस लौट गए कि वे पार्टी के समर्पित कार्यकर्ता हैं और पार्टीलाइन पर ही चलेंगे।
लेकिन अब शायद उनके लिए कुछ भी अच्छा नहीं होने वाला।
भाजपा हार जाना पसंद करेगी लेकिन व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के चलते अपनी ताकत दिखाकर अपनी बात मनवाने की कोशिश करने वालों को भाव नहीं देगी।
यही हाल बागपत विधानसभा के एक आयातीत कद्दावर नेता ने भी दिल्ली पहुंचकर अपना जन शक्ति प्रदर्शन करने का प्रयास किया था, शायद वे भाजपा की कार्यशैली से अनजान थे। हालांकि भाजपा का उच्च नेतृत्व उनको उचित सम्मान देने के मूड में था लेकिन उनकी एक छोटी गलती ने उनको हाशिये पर धकेल दिया था और उनकी गलती का लाभ बड़ौत के एक नेता को मिल गया।
दरअसल, कांग्रेस के निरंतर पतन में ऐसे ही महत्वाकांक्षी नेताओं का योगदान रहा है, जो बदस्तूर जारी है। भाजपा में यह सब नहीं चलता और संभवतः न ही आगे चल पायेगा। क्योंकि भाजपा में पद को नहीं, दायित्व को प्रधानता दी जाती है और दायित्व संगठन व समाज सेवा के लिए दिया जाता है।
विश्व बंधु शास्त्री