यह कॉल उनके पति, भारतीय सेना के वीर जवान लांस नायक चन्द्रशेखर हर्बोला से जुड़ा हुआ था। सेना के अधिकारियों ने शांति देवी को बताया कि सियाचिन ग्लेशियर के एक बंकर में उनके पति का पार्थिव शरीर मिला है और दो दिन बाद उसे पूरे सम्मान के साथ हल्द्वानी लाया जाएगा।

यह सुनते ही शांति देवी की आँखों से आँसू बहने लगे। उन्होंने तुरंत यह खबर अपनी दोनों बेटियों को दी। बेटियों को पहले तो विश्वास ही नहीं हुआ। जब उन्होंने सेना के अधिकारियों से दोबारा संपर्क कर पुष्टि की, तब पूरा परिवार भावुक हो उठा। जिस इंसान के लौटने की उम्मीद उन्होंने लगभग छोड़ दी थी, उसका पार्थिव शरीर 38 साल बाद सही सलामत मिलने जा रहा था।
38 साल पहले जब लांस नायक चन्द्रशेखर हर्बोला घर से निकले थे, तब उनकी बड़ी बेटी केवल 4 साल की थी और छोटी बेटी की उम्र सिर्फ डेढ़ साल थी। दोनों बेटियाँ अपने पिता के प्यार को ठीक से समझ भी नहीं पाई थीं कि वे देश की रक्षा करते हुए हमेशा के लिए उनसे दूर हो गए।
लांस नायक चन्द्रशेखर हर्बोला 19 कुमाऊं रेजिमेंट के बहादुर सैनिक थे। साल 1984 में भारतीय सेना ने सियाचिन ग्लेशियर पर कब्ज़ा मजबूत करने के लिए ‘ऑपरेशन मेघदूत’ शुरू किया था। यह मिशन बेहद कठिन और खतरनाक माना जाता था। दुश्मनों से ज्यादा चुनौती वहां की बर्फीली हवाएँ और माइनस तापमान था।
इसी ऑपरेशन के लिए 19 कुमाऊं रेजिमेंट को चुना गया था। यह वही रेजिमेंट है जिसने भारतीय सेना को पहला ‘परम वीर चक्र’ दिलाया था। मेजर सोमनाथ शर्मा इसी रेजिमेंट से थे और वे भारत के पहले परम वीर चक्र विजेता बने थे।
ऑपरेशन मेघदूत के दौरान चन्द्रशेखर हर्बोला सियाचिन में तैनात थे। कठिन मौसम और बर्फीले तूफ़ानों के बीच एक दिन वे लापता हो गए। काफी खोजबीन हुई, लेकिन उनका कोई पता नहीं चल पाया। परिवार को सिर्फ इतना बताया गया कि वे देश की सेवा करते हुए शहीद हो गए हैं।
समय गुजरता गया। साल दर साल बीतते गए, लेकिन शांति देवी ने अपने पति की यादों को कभी दिल से दूर नहीं होने दिया। उनकी बेटियाँ भी अपने पिता की बहादुरी की कहानियाँ सुनते हुए बड़ी हुईं। उन्हें हमेशा इस बात का दुख रहा कि वे अपने पिता को ठीक से देख भी नहीं पाईं।
फिर 38 साल बाद, सियाचिन के एक बंकर में भारतीय सेना को चन्द्रशेखर हर्बोला का पार्थिव शरीर मिला। सियाचिन की अत्यधिक ठंड और बर्फीले वातावरण के कारण उनका शरीर सुरक्षित अवस्था में था। यह खबर पूरे देश के लिए भावुक कर देने वाली थी।
जब उनका पार्थिव शरीर पूरे सैन्य सम्मान के साथ हल्द्वानी लाया गया, तब हजारों लोगों की आँखें नम हो गईं। हर कोई उस वीर जवान को अंतिम सलाम देने पहुँचा, जिसने देश की रक्षा के लिए अपनी जान न्योछावर कर दी थी।
लांस नायक चन्द्रशेखर हर्बोला की कहानी केवल एक सैनिक की कहानी नहीं है, बल्कि यह भारतीय सेना के उस साहस, त्याग और समर्पण की मिसाल है, जो हर जवान के दिल में बसता है। ऐसे वीर सपूत कभी मरते नहीं, वे हमेशा देशवासियों के दिलों में अमर रहते हैं।