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पेड़ गांव में ही
रह जाते है

फल शहर
चले जाते है

इस एक तस्वीर में हर प्रवासी बेटे-बेटी की कहानी और हर माँ-बाप का मौन दर्द छुपा है।

1. पेड़ कौन है?
पेड़ हैं हमारे माँ-बाप। जिन्होंने धूप में जलकर, बारिश में भीगकर हमें सींचा।
अपनी जड़ें उसी मिट्टी में जमाए रखीं – उसी गाँव में, उसी घर में।
ताकि हम फल बनकर पक सकें। उन्होंने खुद तपस्या की, ताकि हमारी ज़िंदगी आसान हो।

2. फल कौन है?
फल हैं हम। पढ़-लिखकर, सपने लेकर शहर चले गए। नौकरी, करियर, तरक्की।
पेड़ से टूटकर हम बाजार में बिकने चले गए। ऊँची कीमत मिली, बड़ा नाम मिला।
पर पेड़ वहीं रह गया – अकेला, इंतज़ार करता हुआ।

3. सबसे कड़वा सच:
शहर में बैठकर हम फल की मिठास की तारीफ सुनते हैं।
पर ये भूल जाते हैं कि वो मिठास पेड़ के खून-पसीने से आई है।
पेड़ को न धूप पूछती है, न कोई पानी देता है। वो बस खड़ा रहता है, इस उम्मीद में कि कभी उसका फल लौटकर छाँव में बैठेगा।

ये बुजुर्ग दंपत्ति सिर्फ एक तस्वीर नहीं हैं।
ये हर उस घर की कहानी हैं जहाँ दरवाज़े पर टँगी आँखें आज भी बाट जोहती हैं।
जहाँ फोन की घंटी बजते ही दिल की धड़कन तेज हो जाती है।

तो आज क्या करें?
फल बनकर इतने भी दूर न हो जाएँ कि जड़ को ही भूल जाएँ।
एक फोन कर लें। एक बार हाल पूछ लें। हो सके तो छुट्टी लेकर मिल आएँ।
क्योंकि पेड़ हमेशा नहीं रहते। और जब वो नहीं रहेंगे, तो उनकी छाँव की कीमत समझ आएगी।

उन सब माँ-बाप को नमन जिन्होंने हमें फल बनाया, और खुद पेड़ बनकर गाँव में रह गए।
उनकी जड़ों को सलाम। उनकी ममता को प्रणाम। 🙏

कभी वक्त निकालकर लौट जाना, पेड़ आज भी वहीं खड़ा है… इंतज़ार में।

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