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1945 का साल था। देश जल रहा था, अंग्रेज सत्ता बचाने की आखिरी कोशिशों में थे, लाखों भारतीय जेल में थे, आंदोलन चल रहे थे, आर्थिक तंगी और राजनीतिक अनिश्चितता झेल रहे थे।

दूसरी तरफ कुछ लोग आज झूठ फैलाते हैं कि आनंद भवन में सिर्फ “शाही जिंदगी” चल रही थी। इतिहास इतना सस्ता नहीं होता, जितना व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी ने बना दिया है।

फिरोज गांधी का असली नाम फीरोज जहांगीर घांडी था, वे पारसी परिवार से थे, महात्मा गांधी के रिश्तेदार नहीं थे। बाद में उनके नाम की वर्तनी Gandhi प्रचलित हुई। वे कोई “बाहर से चिपके हुए दामाद” नहीं थे, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय कार्यकर्ता थे।

इलाहाबाद में कमला नेहरू के आंदोलनों से जुड़े, जेल गए, कांग्रेस कार्यकर्ता रहे, और अंग्रेजी सत्ता विरोधी अभियानों में भाग लिया।

1945 में Rajiv Gandhi सिर्फ लगभग 1 साल के थे। वे अगस्त 1944 में जन्मे थे, इसलिए 1945 में कोई राजनीति नहीं कर रहे थे, क्योंकि शिशु लोग आमतौर पर कैबिनेट मीटिंग नहीं चलाते।

आनंद भवन कोई निजी हवेली नहीं था, वह राष्ट्रीय आंदोलन का केंद्र बन चुका था। नेहरू परिवार ने उसका बड़ा हिस्सा सार्वजनिक राजनीतिक गतिविधियों, बैठकों और बाद में ट्रस्ट कार्यों हेतु समर्पित किया। वहां देश के बड़े नेता आते थे, रणनीतियाँ बनती थीं। इसे सिर्फ “ऐशगाह” बताना इतिहास पर थूकना है।

फिरोज गांधी ने आजादी के बाद जो किया, वही उन्हें बड़ा बनाता है। संसद में पहुंचकर उन्होंने सत्ता से सवाल किए। LIC-मुंद्रा घोटाला उजागर किया, जिसके बाद वित्त मंत्री टी. टी. कृष्णमाचारी को इस्तीफा देना पड़ा। सोचो, अपनी ही ससुराल वाली सरकार पर सवाल उठाने वाला आदमी कितना स्वतंत्र चरित्र रखता होगा।

उन्होंने नेशनल हेराल्ड और नवजीवन जैसे प्रकाशनों से भी जुड़कर जनमत निर्माण किया। सांसद रहे, रायबरेली से चुने गए, और 8 सितंबर 1960 को हृदयाघात से उनका निधन हुआ।

अब जो लोग राहुल गांधी को “फिरोज गांधी का पोता” कहकर ताना मारते हैं, वे उसी फिरोज गांधी के पोते हैं जिसने आजादी के आंदोलन में भाग लिया, जेल देखी, सत्ता से सवाल किए, घोटाले उजागर किए, संसद को ताकत दी, और लोकतंत्र में परिवार से ऊपर संस्थाओं को रखा।

हर पोता अपने दादा जैसा निकले, यह जरूरी नहीं। पर दादा का रिकॉर्ड पढ़ लो, फिर मीम बनाना।

और जो लोग हर ऐतिहासिक व्यक्तित्व को गाली देकर खुद को राष्ट्रवादी मानते हैं, उन्हें याद रखना चाहिए कि देश आजादी ट्वीट से नहीं, त्याग, जेल, संघर्ष और राजनीतिक जोखिम से मिला था।

कुछ लोग विरासत बनाते हैं, कुछ लोग सिर्फ आईटी सेल के पोस्टर चिपकाते हैं। #प्रदीपकुमारमिश्रा

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