लोकसभा में महिला आरक्षण में भगवती देवी जी जैसी आवाज़ सुनाई देनी चाहिए, अन्यथा इसका अर्थ समान भागीदारी नहीं, बल्कि वर्चस्व को स्थापित करना होगा।मामला महिलाओं के आरक्षण का नहीं है, अनुसूचित जातियों जनजातियों, अत्यंत अन्य पिछड़े वर्गो के आरक्षण की काट महिलाओं की आड में एक-तिहाई सीटों पर सीधे सवर्णों का आरक्षण है विश्वास न हो तो सामान्य सीटों पर इन जातियों की हैसियत और गिनती देख लो क्या महिला सीट पर कोई अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति, अत्यंत अन्य पिछड़ो की महिला को मान्यता प्राप्त राजनैतिक दल टिकट देगी या आज अनारक्षित सीटों पर इन वर्गों को टिकट मिल रहा है एक दो अपवादों को छोड़ दिया जाए तो क्या इन वर्गों के सांसद और विधायक सामान्य/अनारक्षित सीटो से चुनाव जीत कर सदन में पहुंच पाए हैं? अतीत से सबक लीजिए, जाति जनगणना करवाइए फिर जिस तरह स्थानीय निकायों में अनुसूचित जातियों अनुसूचित जनजातियों और पिछड़े वर्गों वर्गों की महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित की गई है उसी तरह संसद और विधानसभाओं में भी आरक्षण की व्यवस्था का व्यापक बिल सदन में हर्ष ध्वनि से पारित करिए,आपकी मंशा विपक्ष और देश का आम जनमानस समझ चुका है महिला आरक्षण के नाम पर एक तिहाई सामान्य सीटों पर आपका आरक्षण,यह नहीं चलेगा।अगर महिलाओं को 33% आरक्षण देना ही है तो लोकसभा में मौजूदा 543 सीटों में से ही 33 प्रतिशत दे दीजिए क्या दिक्कत है

subhashchand4

Bysubhashchand4

Apr 18, 2026
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543 सांसद कम पड़ रहे है देश की जनता के टैक्स का पैसा लूटने में , जो अब इनकी संख्या 850 की जा रही है महिलाओं के 33% आरक्षण के समर्थन में हूँ, लेकिन उनको ये 33% , 543 सीटो में से दे दीजिए।

850 लोकसभा सीट करके कौन देश की आर्थिक स्थिति पर बोझ डाला जा रहा है सारी सैलरी भत्ते फंड यात्राएं, दैनिक भत्ते, फोन, मेडिकल सुविधा मिलाकर 5 लाख रुपया हर सांसद प्रति महीने देश के खजाने से लूट रहा है।

काम जीरो, रिस्पॉनबल्टी जीरो, ऊपर से इनको Y+ सिक्योरिटी और विकास कार्यों में से कमीशन भी मिलता है चारों और से देश को लुटा जा रहा है।

एक सांसद का नाम बताओ जिसने पिछले 5 सालों में
लोकसभा में खड़ा होकर कोई स्कूल कॉलेज यूनिवर्सिटी, स्टेडियम, हॉस्पिटल ,पी.जी.आई., एम्स की बात की हो तो

अब सांसद 543 से 850 होंगे, उसके बाद विधायकों की संख्या तो सीधे सीधे 2 से 3 हजार बढ़ेगी, कितना ज्यादा रुपया इनकी सैलरी और सिक्योरिटी में जाएगा देश का विचार कीजिए।

और इस 33% में कोई भी गरीब मजदूर किसान या मध्यम वर्ग की महिलाएं सांसद नहीं चुनी जाएगी।
चुनी जाएगी कंगना जैसी, जया बच्चन, स्मृति ईरानी, हेमा मालिनी जैसी।

आपको महिलाओं की इतनी चिंता है तो कृपा करके यूपीएससी, CGL, CHCL, MTS, CPO, MBBS, IIT, NIT,
IIM की सीट में भी महिलाओं को 33 नहीं सीधे 50% दे दीजिए लेकिन नहीं कर पाओगे आप लोग ये।

20 राज्यों में कमोबेश भाजपा की सरकार है और महिला मुख्यमंत्री मात्र 1 है कौन-से मान सम्मान की बात की जा रही है समझ में नहीं आ रहा है।

ये सीटे बढ़ाकर तो आप अपना राजनीतिक स्वार्थ साध रहे हो और देश की जनता पर बोझ डाल रहे हो।

महिलाओं का 33% आरक्षण इन 543 सीटों में भी दिया जा सकता है।

लेकिन नहीं हमें तो अनंतकाल तक सत्ता हथियाना है।

✍️AKS

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रामायण व महाभारत के रचयिता क्रमशः वाल्मीकि और व्यास ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि वे जो कहानियां लिख रहे हैं भविष्य में उनके वंशज उन्हें वास्तविक इतिहास के रूप में स्थापित कर देंगे और शूद्र शिक्षित होकर भी हमारे द्वारा कल्पित पात्रों की पूजा अर्चना करेंगे ।मजे की बात यह है कि वाल्मीकि और व्यास ने कभी खुद को इतिहास कार होने का दावा भी नहीं किया ।मनगढ़ंत कहानियों और इतिहास में फर्क करना शूद्र समाज कब सीखेगा ?परशुराम जैसा पात्र जो सतयुग में अपने फरसे से गणेश का एक दाँत तोड़कर एकदंत बना देता है त्रेता की कहानी रामायण में भी जनक के यहाँ रखी उसके गुरु शंकर की धनुष टूटने पर जनक सहित राम लक्ष्मण और अन्य राजाओं को धमकाता है एवं पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रिय विहीन करने की डींग हाँकता है और उस समय भी वही अपना प्रिय हथियार फरसा लहराता है।कथित द्वापर युग की कहानी महाभारत में भी वही पात्र उसी परशुराम नाम से कौरवों पांडवों के दादा भीष्म और सूर्य पुत्र कर्ण को भी धनुवर्विद्या सिखाता है ।उसी परशुराम को ब्राह्मण भगवान का अवतार बताकर भगवान परशुराम कहते हैं और जयंती भी मनाते हैं ।विचारणीय प्रश्न यह है कि जब भगवान का एक अवतार सतयुग से ही मौजूद था तो त्रेता और द्वापर में क्रमशः राम और कृष्ण के रूप में राक्षसों का वध करने के लिए अवतार लेने की आवश्यकता ही क्या थी ?कहानियों में राम, कृष्ण आदि कथित अवतारों को पैदा होना और इंसान की तरह ही मरना बताया गया है किन्तु परशुराम तीनों युगों में एक योद्धा के रूप में ही जीवित रहता है जबकि एक एक युग को हजारों लाखों साल का बताया गया है ।लोहे का आविष्कार अभी चार हजार साल पहले हुआ तो परशुराम को सतयुग, त्रेता, द्वापर में लोहा कहाँ से मिला फरसा बनवाने को ?इससे यही सिद्ध होता है किरामायण महाभारत सभी ब्राह्मणों द्वारा लिखीकाल्पनिक कहानियां हैं वास्तविक इतिहास नहीं इस अकाट्य सत्य को शूद्र समाज जितनी जल्दी समझ ले और इन गप्प ग्रंथों के मकड़जाल से खुद को मुक्त कर ले उतना ही देश ,समाज और भावी पीढ़ियों के हित में होगा ।शूद्र समाज यानी एससी एसटी ओबीसी वर्ग की संख्या 85% होते हुए भी भारत का शासक नहीं 15% सवर्णों द्वारा शासित वर्ग है उसका मुख्य कारण ही यही है कि शूद्र समाज ब्राह्मणों के विराट प्रचार तंत्र का शिकार होकर ब्राह्मणों द्वारा लिखे झूठे व काल्पनिक इतिहास को धर्म मानकर सीने से चिपकाये हुए है ,और शूद्रों के मान सम्मान और मानवीय अधिकारों के लिए आजीवन संघर्ष करनेवाले अपने समता वादी, मानवतावादी वैज्ञानिक विचारधारा वाले महापुरुषों के त्यागमयी और संघर्ष पूर्ण सच्चे इतिहास से अनभिज्ञ है या यों कहें कि शिक्षा व्यवस्था और अन्य सभी प्रचार माध्यमों पर ब्राह्मणों का कब्जा होने के कारण मानवता वादी महापुरुषों के बारे में शूद्रों को जानने ही नहीं दिया।

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