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​बागपत और आसपास के क्षेत्रों को राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से बेहतर परिवहन सुविधाओं से जोड़ने की मांग केवल एक राजनीतिक घोषणा नहीं, बल्कि इस पूरे इलाके के आर्थिक विकास से जुड़ा बेहद संवेदनशील मुद्दा है। वर्षों से स्थानीय जनता लोनी, खेकड़ा, बागपत, बड़ौत और शामली जैसे प्रमुख केंद्रों के लिए आधुनिक परिवहन प्रणाली की राह देख रही है। लेकिन संसदीय रिकॉर्ड, सरकारी पत्राचार और जमीनी हकीकत का निष्पक्ष विश्लेषण करने पर पता चलता है कि विकास की यह पूरी चर्चा अक्सर बयानों और पत्राचार के इर्द-गिर्द घूमती रही है, जबकि प्रशासनिक धरातल पर ठोस प्रगति की दरकार आज भी बनी हुई है।
​मेट्रो और रैपिड रेल विस्तार की बात करें तो पूर्व सांसद डॉ. सत्यपाल सिंह से लेकर वर्तमान सांसद डॉ. राजकुमार सांगवान तक, विभिन्न जनप्रतिनिधियों ने संसद और केंद्रीय मंत्रालयों के समक्ष शाहदरा, लोनी, खेकड़ा, कासिमपुर खेड़ी और बड़ौत तक मेट्रो व RRTS नेटवर्क की मांग उठाई है। अगस्त 2026 तक के संसदीय रिकॉर्ड में भी इस विषय को प्रमुखता से दर्ज किया गया है। हालांकि मई 2026 में केंद्रीय शहरी कार्य राज्य मंत्री तोखन साहू द्वारा सांसद को भेजे गए आधिकारिक पत्र ने पूरी स्थिति का रुख साफ कर दिया। इस पत्र के माध्यम से स्पष्ट हुआ कि केंद्र सरकार के पास इस विशिष्ट मार्ग के लिए उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से कोई औपचारिक प्रस्ताव, विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) या आधिकारिक बजट आवंटन की मांग प्राप्त नहीं हुई थी, जिसके कारण मामले को राज्य सरकार के पास समीक्षा के लिए भेजा गया। नियमानुसार किसी भी मेट्रो परियोजना की शुरुआत राज्य सरकार द्वारा सर्वे कराने, डीपीआर तैयार करने और वित्तीय हिस्सेदारी तय करने के बाद ही संभव होती है, जो दर्शाता है कि मेट्रो का मुद्दा फिलहाल केवल शुरुआती पत्राचार के चरण में ही अटका हुआ है।
​इसी बीच इस क्षेत्र की सबसे पुरानी और बुनियादी समस्या शाहदरा-बागपत-बड़ौत-शामली रेलवे लाइन के दोहरीकरण (Double Track) की है, जिसकी मांग पिछले चार दशकों यानी लगभग चालीस वर्षों से लंबित पड़ी हुई है। यह रेल मार्ग दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बीच दैनिक यात्रियों, किसानों, व्यापारियों और छात्रों के लिए जीवनरेखा की तरह है। चार दशकों से लगातार उठ रही इस मांग के बावजूद ट्रैक के पूर्ण दोहरीकरण और सुदृढ़ीकरण की प्रक्रिया बेहद धीमी गति से आगे बढ़ी है, जिससे प्रतिदिन हजारों यात्रियों को लेट-लतीफी और असीमित असुविधा का सामना करना पड़ता है। मेट्रो की आधुनिक मांग और चार दशक पुरानी रेलवे दोहरीकरण की अधूरी फाइल मिलकर इस पूरे क्षेत्र की उपेक्षा को दर्शाती हैं। जनता को अब केवल आश्वासन, पत्राचार के हवाले या राजनीतिक श्रेय की नहीं, बल्कि दोनों परियोजनाओं की स्वीकृत रिपोर्ट, स्पष्ट पत्र संख्या, आवंटित बजट और समयबद्ध कार्ययोजना वाले पारदर्शी दस्तावेजों की आवश्यकता है।

✍️मोहित चौहान (सामाजिक कार्यकर्ता )

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संपादकीय: पर्यावरण की आड़ में प्रशासनिक दोहारापन और पिसता आम आदमी​हाल ही में बागपत जिले में RTO प्रशासन द्वारा 10-15 साल पुराने वाहनों को उठाने की कार्रवाई और उसके विरोध में स्थानीय लोगों की प्रशासनिक अधिकारियों से मुलाकात ने एक कड़वे सच पर से पर्दा हटा दिया है। यह मुद्दा अब महज पुरानी गाड़ियों की जब्ती तक सीमित नहीं है, बल्कि उस प्रशासनिक मानसिकता को उजागर करता है जो पर्यावरण और अदालत के नियमों की आड़ लेकर गरीब की लाचारी पर चाबुक चलाती है, लेकिन असली प्रदूषकों के सामने भीगी बिल्ली बन जाती है।​आज जब देश का गरीब किसान, मजदूर, छात्र और मध्यम वर्ग अभूतपूर्व महंगाई के दौर से गुजर रहा है, तब रातों-रात उनसे उनकी रोजी-रोटी का साधन छीन लेना न्यायसंगत कैसे हो सकता है? किसान के लिए उसका पुराना वाहन खेत से मंडी तक उपज पहुँचाने की सांस है, मजदूर के लिए काम पर जाने का एकमात्र जरिया, और छात्र के लिए शिक्षा का सेतु। वैश्विक आंकड़ों की हकीकत भी इस कड़वे सच को बयान करती है—मानव विकास सूचकांक (193 देशों में 134वाँ), वैश्विक भुखमरी सूचकांक (123 देशों में 102वाँ), प्रसन्नता रिपोर्ट (116वाँ) और प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक (159वाँ)। ये आंकड़े साफ गवाही देते हैं कि देश की एक बड़ी आबादी आज भी बुनियादी जरूरतों और गिरती क्रय शक्ति के कड़े संघर्ष में जी रही है। ऐसे में यह सवाल प्रशासनिक संवेदनहीनता पर करारा प्रहार है कि जो व्यक्ति दो वक्त की रोटी का इंतजाम मुश्किल से कर पा रहा हो, वह नया वाहन खरीदने का भारी आर्थिक बोझ कहाँ से उठाए?​लेकिन इससे भी ज्यादा दुखद और शर्मनाक पहलू व्यवस्था का दोहरा रवैया है। सुप्रीम कोर्ट और नेशनल Green Tribunal (NGT) के आदेश पर्यावरण की सुरक्षा के लिए हैं, जो केवल वाहनों पर ही नहीं, बल्कि बिना ETP (Effluent Treatment Plant) और STP लगाए चलने वाले उद्योगों पर भी समान रूप से लागू होते हैं। NGT के स्पष्ट निर्देश हैं कि नदियों में रासायनिक कचरा बहाने वाली फैक्ट्रियों पर ताला लगे और उनके मालिकों पर आपराधिक मुकदमे दर्ज हों। इसके बावजूद बागपत, शामली और मेरठ की हिंडन, काली व कृष्ण नदी पट्टी के दर्जनों गाँव (जैसे गांगनौली) आज ‘कैंसर विलेज़’ में तब्दील हो चुके हैं। फैक्ट्रियों का जहरीला केमिकल भूजल में घुलकर घर-घर में कैंसर, लिवर और किडनी फेलियर जैसी जानलेवा बीमारियाँ बाँट रहा है।​यहाँ आकर प्रशासनिक नीयत पूरी तरह नंगी हो जाती है। आम नागरिक और गरीब किसान ‘सस्ता निशाना’ (Soft Target) हैं; सड़क पर खड़े किसी बेबस का ट्रैक्टर या बाइक जब्त करना आसान है क्योंकि इसमें न कोई कानूनी अड़चन है और न ही राजनीतिक दबाव। वहीं दूसरी तरफ, जहरीला केमिकल बहाने वाले उद्योगों के पास भारी वित्तीय ताकत, राजनीतिक रसूख और चंदे का प्रभाव होता है। कागजी रिपोर्टों के खेल और भ्रष्टाचार की आड़ में इन रसूखदारों को अभयदान दे दिया जाता है, जबकि जहरीले पानी से मरते ग्रामीणों की चीखें किसी प्रशासनिक कान तक नहीं पहुँचतीं।​पर्यावरण सुधार का रास्ता गरीब का चूल्हा बुझाकर या उसकी गाड़ी छीनकर नहीं निकल सकता। यदि सरकार वास्तव में पर्यावरण के प्रति गंभीर है, तो उसे वाहनों के मामले में जब्ती के बजाय आसान किश्तों पर वित्तीय सहायता, पर्याप्त समय (Grace Period) और आसान NOC प्रक्रिया जैसी नीतियाँ लागू करनी होंगी। साथ ही, नदियों को जहरीला बनाने वाली फैक्ट्रियों के खिलाफ वही कड़ाई दिखानी होगी जो सड़क पर खड़े आम आदमी पर दिखाई जाती है। जब तक प्रशासन ‘फायदे और रसूख’ की सोच छोड़कर असली प्रदूषकों पर दंडात्मक कार्रवाई नहीं करता, तब तक ‘पर्यावरण सुरक्षा’ के नाम पर चलाए जाने वाले ऐसे अभियान केवल प्रशासनिक दोहरेपन और गरीब विरोधी रवैये का ही प्रतीक बने रहेंगे।

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