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आधुनिक सभ्यता की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हमने अपनी क्षणिक सुविधा के लिए प्रकृति की सांसों को संकट में डाल दिया है। शहरों के बाहर खड़े कचरे के विशाल पहाड़, प्लास्टिक से पटी नदियां और सड़ती रसोइयों का ढेर केवल अस्वच्छता का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि यह हमारी उस गैर-जिम्मेदाराना जीवनशैली का सबूत हैं जहाँ ‘उपयोग करो और फेंक दो’ की संस्कृति हावी हो चुकी है। ऐसे समय में प्लास्टिक-मुक्त राज्य, कचरा प्रथककरण और कंपोस्टिंग का त्रिसूत्रीय ढांचा कोई विकल्प नहीं, बल्कि हमारी भावी नस्लों की उत्तरजीविता की अनिवार्य शर्त बन चुका है।
​नीतियों और कागजी प्रतिबंधों के बावजूद, आज भी हमारे समाज में मिश्रित कचरा फेंकने की ढर्रे वाली आदत बनी हुई है। जब सूखा प्लास्टिक और रसोई का गीला कचरा एक साथ कचरे के ढेरों तक पहुंचता है, तो यह केवल स्वच्छता की समस्या नहीं रहता बल्कि एक भयानक पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संबंधी आपदा का रूप ले लेता है।
​प्लास्टिक को नष्ट होने में सदियों लगते हैं। यह मिट्टी में दबकर उसकी जल-धारण क्षमता और वायु संचार को समाप्त कर देता है, जिससे उपजाऊ जमीन धीरे-धीरे बंजर होने लगती है। इतना ही नहीं, लैंडफिल साइट्स पर गीला और सूखा कचरा मिलकर लीचेट नाम का एक जहरीला काला तरल पदार्थ बनाता है जो रिसकर जमीन के नीचे पहुँचता है और हमारे भूजल को विषैला बना देता है। रसोई के जैविक कचरे की कंपोस्टिंग न होने पर वह खुले में बिना ऑक्सीजन के सड़ता है, जिससे मीथेन जैसी घातक ग्रीनहाउस गैस निकलती है। वहीं कचरा जलाने पर निकलने वाला डाइऑक्सिन धुआं हवा को जहरीला बना रहा है। नदियों और समुद्रों में तैरता प्लास्टिक टूटकर सूक्ष्म कणों में बदल जाता है जो जलजीवों के रास्ते हमारी भोजन की थाली तक पहुँच रहा है, जबकि शहरों में आवारा मवेशी प्लास्टिक खाकर अकाल मृत्यु का शिकार हो रहे हैं।
​यदि हमारी जीवनशैली और प्रशासनिक नीतियों में त्वरित बदलाव नहीं आया, तो आने वाले कुछ ही दशकों में परिस्थितियां नियंत्रण से बाहर हो जाएंगे। शहरों की बहुमूल्य भूमि केवल कचरे के ढेरों में तब्दील हो जाएगी, जल और वायु के शुद्ध स्रोत समाप्तप्राय हो जाएंगे और स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को चरमरा देगा।
​समस्या जितनी विकराल है, इसका समाधान उतना ही व्यावहारिक और हमारे हाथों में है। इसके लिए स्रोत स्तर पर ही गीले जैविक कचरे और सूखे प्लास्टिक कचरे को अलग-अलग रखना होगा। रसोई के कचरे को सड़ाकर फेंकने के बजाय उससे घर या सोसायटी के स्तर पर ही जैविक खाद बनाई जानी चाहिए, जिससे कचरे के परिवहन का खर्च और मीथेन का उत्सर्जन काफी हद तक घट जाता है।
​इस परिवर्तन को केवल व्यक्तिगत प्रयासों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता, इसके लिए सरकार और प्रशासन को कड़े कानूनी ढाँचे और ठोस प्रशासनिक कदमों का सहारा लेना होगा। प्लास्टिक उत्पादक और FMCG कंपनियों पर विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) के नियमों को सख्ती से लागू किया जाना चाहिए ताकि वे अपने प्लास्टिक का पुनर्चक्रण खुद सुनिश्चित करें और उल्लंघन पर उन पर भारी पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति शुल्क लगाया जाए। इसके साथ ही, स्रोत पर कचरा प्रथककरण न करने वाले सोसायटियों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों पर दंडात्मक कार्रवाई और चालान का स्पष्ट कानूनी प्रावधान होना चाहिए।
​प्रशासन को बड़े आवासीय परिसरों, होटलों और थोक मंडियों के लिए ऑन-साइट कंपोस्टिंग को अनिवार्य करना होगा, और ऐसा न करने पर उनके लाइसेंस रद्द करने जैसी कानूनी पहल करनी होगी। दूसरी ओर, प्लास्टिक के पर्यावरण-अनुकूल विकल्पों (जैसे जूट, कपड़े और बायोडिग्रेडेबल सामग्री) के निर्माताओं को GST में छूट और रियायती दरों पर प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए ताकि ये विकल्प आम जनता के लिए सस्ते और सुलभ हो सकें।
​जमीनी स्तर पर निगरानी के लिए स्थानीय निकायों में विशेष ‘पर्यावरण वार्डन’ या स्वच्छता पुलिस का गठन जरूरी है जो खुले में कूड़ा और प्लास्टिक फेंकने वालों पर तुरंत कार्रवाई कर सके। साथ ही, कचरा बीनने वाले असंगठित सफाई कर्मचारियों का पंजीकरण करके उन्हें सुरक्षा उपकरणों व न्यूनतम वेतन के साथ इस प्रशासनिक तंत्र का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। नागरिकों और सोसायटियों को प्रोत्साहित करने के लिए यह व्यवस्था बनाई जाए कि जो सोसायटियां या वार्ड 100% ‘जीरो वेस्ट’ (शून्य कचरा) मॉडल अपनाते हैं, उन्हें नगर निगम के संपत्ति कर व बैनामा पर 5% से 10% तक की छूट दी जाए।
​पर्यावरण संरक्षण कोई बाहरी अभियान नहीं, बल्कि हमारी अपनी सुरक्षा का संकल्प है। जब तक प्रशासनिक इच्छाशक्ति और नागरिक जिम्मेदारी एक साथ नहीं मिलतीं, तब तक कोई भी राज्य प्लास्टिक-मुक्त नहीं हो सकता। कचरे को समस्या नहीं बल्कि एक संसाधन समझकर और कड़े नियमों का पालन करके ही हम एक प्लास्टिक-मुक्त, स्वच्छ और समृद्ध भविष्य की नींव रख सकते हैं।

✍️मोहित चौहान (सामाजिक कार्यकर्त्ता)

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संपादकीय: पर्यावरण की आड़ में प्रशासनिक दोहारापन और पिसता आम आदमी​हाल ही में बागपत जिले में RTO प्रशासन द्वारा 10-15 साल पुराने वाहनों को उठाने की कार्रवाई और उसके विरोध में स्थानीय लोगों की प्रशासनिक अधिकारियों से मुलाकात ने एक कड़वे सच पर से पर्दा हटा दिया है। यह मुद्दा अब महज पुरानी गाड़ियों की जब्ती तक सीमित नहीं है, बल्कि उस प्रशासनिक मानसिकता को उजागर करता है जो पर्यावरण और अदालत के नियमों की आड़ लेकर गरीब की लाचारी पर चाबुक चलाती है, लेकिन असली प्रदूषकों के सामने भीगी बिल्ली बन जाती है।​आज जब देश का गरीब किसान, मजदूर, छात्र और मध्यम वर्ग अभूतपूर्व महंगाई के दौर से गुजर रहा है, तब रातों-रात उनसे उनकी रोजी-रोटी का साधन छीन लेना न्यायसंगत कैसे हो सकता है? किसान के लिए उसका पुराना वाहन खेत से मंडी तक उपज पहुँचाने की सांस है, मजदूर के लिए काम पर जाने का एकमात्र जरिया, और छात्र के लिए शिक्षा का सेतु। वैश्विक आंकड़ों की हकीकत भी इस कड़वे सच को बयान करती है—मानव विकास सूचकांक (193 देशों में 134वाँ), वैश्विक भुखमरी सूचकांक (123 देशों में 102वाँ), प्रसन्नता रिपोर्ट (116वाँ) और प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक (159वाँ)। ये आंकड़े साफ गवाही देते हैं कि देश की एक बड़ी आबादी आज भी बुनियादी जरूरतों और गिरती क्रय शक्ति के कड़े संघर्ष में जी रही है। ऐसे में यह सवाल प्रशासनिक संवेदनहीनता पर करारा प्रहार है कि जो व्यक्ति दो वक्त की रोटी का इंतजाम मुश्किल से कर पा रहा हो, वह नया वाहन खरीदने का भारी आर्थिक बोझ कहाँ से उठाए?​लेकिन इससे भी ज्यादा दुखद और शर्मनाक पहलू व्यवस्था का दोहरा रवैया है। सुप्रीम कोर्ट और नेशनल Green Tribunal (NGT) के आदेश पर्यावरण की सुरक्षा के लिए हैं, जो केवल वाहनों पर ही नहीं, बल्कि बिना ETP (Effluent Treatment Plant) और STP लगाए चलने वाले उद्योगों पर भी समान रूप से लागू होते हैं। NGT के स्पष्ट निर्देश हैं कि नदियों में रासायनिक कचरा बहाने वाली फैक्ट्रियों पर ताला लगे और उनके मालिकों पर आपराधिक मुकदमे दर्ज हों। इसके बावजूद बागपत, शामली और मेरठ की हिंडन, काली व कृष्ण नदी पट्टी के दर्जनों गाँव (जैसे गांगनौली) आज ‘कैंसर विलेज़’ में तब्दील हो चुके हैं। फैक्ट्रियों का जहरीला केमिकल भूजल में घुलकर घर-घर में कैंसर, लिवर और किडनी फेलियर जैसी जानलेवा बीमारियाँ बाँट रहा है।​यहाँ आकर प्रशासनिक नीयत पूरी तरह नंगी हो जाती है। आम नागरिक और गरीब किसान ‘सस्ता निशाना’ (Soft Target) हैं; सड़क पर खड़े किसी बेबस का ट्रैक्टर या बाइक जब्त करना आसान है क्योंकि इसमें न कोई कानूनी अड़चन है और न ही राजनीतिक दबाव। वहीं दूसरी तरफ, जहरीला केमिकल बहाने वाले उद्योगों के पास भारी वित्तीय ताकत, राजनीतिक रसूख और चंदे का प्रभाव होता है। कागजी रिपोर्टों के खेल और भ्रष्टाचार की आड़ में इन रसूखदारों को अभयदान दे दिया जाता है, जबकि जहरीले पानी से मरते ग्रामीणों की चीखें किसी प्रशासनिक कान तक नहीं पहुँचतीं।​पर्यावरण सुधार का रास्ता गरीब का चूल्हा बुझाकर या उसकी गाड़ी छीनकर नहीं निकल सकता। यदि सरकार वास्तव में पर्यावरण के प्रति गंभीर है, तो उसे वाहनों के मामले में जब्ती के बजाय आसान किश्तों पर वित्तीय सहायता, पर्याप्त समय (Grace Period) और आसान NOC प्रक्रिया जैसी नीतियाँ लागू करनी होंगी। साथ ही, नदियों को जहरीला बनाने वाली फैक्ट्रियों के खिलाफ वही कड़ाई दिखानी होगी जो सड़क पर खड़े आम आदमी पर दिखाई जाती है। जब तक प्रशासन ‘फायदे और रसूख’ की सोच छोड़कर असली प्रदूषकों पर दंडात्मक कार्रवाई नहीं करता, तब तक ‘पर्यावरण सुरक्षा’ के नाम पर चलाए जाने वाले ऐसे अभियान केवल प्रशासनिक दोहरेपन और गरीब विरोधी रवैये का ही प्रतीक बने रहेंगे।

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