संपादकीय: पर्यावरण की आड़ में प्रशासनिक दोहारापन और पिसता आम आदमी​हाल ही में बागपत जिले में RTO प्रशासन द्वारा 10-15 साल पुराने वाहनों को उठाने की कार्रवाई और उसके विरोध में स्थानीय लोगों की प्रशासनिक अधिकारियों से मुलाकात ने एक कड़वे सच पर से पर्दा हटा दिया है। यह मुद्दा अब महज पुरानी गाड़ियों की जब्ती तक सीमित नहीं है, बल्कि उस प्रशासनिक मानसिकता को उजागर करता है जो पर्यावरण और अदालत के नियमों की आड़ लेकर गरीब की लाचारी पर चाबुक चलाती है, लेकिन असली प्रदूषकों के सामने भीगी बिल्ली बन जाती है।​आज जब देश का गरीब किसान, मजदूर, छात्र और मध्यम वर्ग अभूतपूर्व महंगाई के दौर से गुजर रहा है, तब रातों-रात उनसे उनकी रोजी-रोटी का साधन छीन लेना न्यायसंगत कैसे हो सकता है? किसान के लिए उसका पुराना वाहन खेत से मंडी तक उपज पहुँचाने की सांस है, मजदूर के लिए काम पर जाने का एकमात्र जरिया, और छात्र के लिए शिक्षा का सेतु। वैश्विक आंकड़ों की हकीकत भी इस कड़वे सच को बयान करती है—मानव विकास सूचकांक (193 देशों में 134वाँ), वैश्विक भुखमरी सूचकांक (123 देशों में 102वाँ), प्रसन्नता रिपोर्ट (116वाँ) और प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक (159वाँ)। ये आंकड़े साफ गवाही देते हैं कि देश की एक बड़ी आबादी आज भी बुनियादी जरूरतों और गिरती क्रय शक्ति के कड़े संघर्ष में जी रही है। ऐसे में यह सवाल प्रशासनिक संवेदनहीनता पर करारा प्रहार है कि जो व्यक्ति दो वक्त की रोटी का इंतजाम मुश्किल से कर पा रहा हो, वह नया वाहन खरीदने का भारी आर्थिक बोझ कहाँ से उठाए?​लेकिन इससे भी ज्यादा दुखद और शर्मनाक पहलू व्यवस्था का दोहरा रवैया है। सुप्रीम कोर्ट और नेशनल Green Tribunal (NGT) के आदेश पर्यावरण की सुरक्षा के लिए हैं, जो केवल वाहनों पर ही नहीं, बल्कि बिना ETP (Effluent Treatment Plant) और STP लगाए चलने वाले उद्योगों पर भी समान रूप से लागू होते हैं। NGT के स्पष्ट निर्देश हैं कि नदियों में रासायनिक कचरा बहाने वाली फैक्ट्रियों पर ताला लगे और उनके मालिकों पर आपराधिक मुकदमे दर्ज हों। इसके बावजूद बागपत, शामली और मेरठ की हिंडन, काली व कृष्ण नदी पट्टी के दर्जनों गाँव (जैसे गांगनौली) आज ‘कैंसर विलेज़’ में तब्दील हो चुके हैं। फैक्ट्रियों का जहरीला केमिकल भूजल में घुलकर घर-घर में कैंसर, लिवर और किडनी फेलियर जैसी जानलेवा बीमारियाँ बाँट रहा है।​यहाँ आकर प्रशासनिक नीयत पूरी तरह नंगी हो जाती है। आम नागरिक और गरीब किसान ‘सस्ता निशाना’ (Soft Target) हैं; सड़क पर खड़े किसी बेबस का ट्रैक्टर या बाइक जब्त करना आसान है क्योंकि इसमें न कोई कानूनी अड़चन है और न ही राजनीतिक दबाव। वहीं दूसरी तरफ, जहरीला केमिकल बहाने वाले उद्योगों के पास भारी वित्तीय ताकत, राजनीतिक रसूख और चंदे का प्रभाव होता है। कागजी रिपोर्टों के खेल और भ्रष्टाचार की आड़ में इन रसूखदारों को अभयदान दे दिया जाता है, जबकि जहरीले पानी से मरते ग्रामीणों की चीखें किसी प्रशासनिक कान तक नहीं पहुँचतीं।​पर्यावरण सुधार का रास्ता गरीब का चूल्हा बुझाकर या उसकी गाड़ी छीनकर नहीं निकल सकता। यदि सरकार वास्तव में पर्यावरण के प्रति गंभीर है, तो उसे वाहनों के मामले में जब्ती के बजाय आसान किश्तों पर वित्तीय सहायता, पर्याप्त समय (Grace Period) और आसान NOC प्रक्रिया जैसी नीतियाँ लागू करनी होंगी। साथ ही, नदियों को जहरीला बनाने वाली फैक्ट्रियों के खिलाफ वही कड़ाई दिखानी होगी जो सड़क पर खड़े आम आदमी पर दिखाई जाती है। जब तक प्रशासन ‘फायदे और रसूख’ की सोच छोड़कर असली प्रदूषकों पर दंडात्मक कार्रवाई नहीं करता, तब तक ‘पर्यावरण सुरक्षा’ के नाम पर चलाए जाने वाले ऐसे अभियान केवल प्रशासनिक दोहरेपन और गरीब विरोधी रवैये का ही प्रतीक बने रहेंगे।

subhashchand4

Bysubhashchand4

Sep 22, 2026
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✍️मोहित चौहान (सोशल एक्टिविस्ट )

संपादकीय: पर्यावरण की आड़ में प्रशासनिक दोहारापन और पिसता आम आदमी
​हाल ही में बागपत जिले में RTO प्रशासन द्वारा 10-15 साल पुराने वाहनों को उठाने की कार्रवाई और उसके विरोध में स्थानीय लोगों की प्रशासनिक अधिकारियों से मुलाकात ने एक कड़वे सच पर से पर्दा हटा दिया है। यह मुद्दा अब महज पुरानी गाड़ियों की जब्ती तक सीमित नहीं है, बल्कि उस प्रशासनिक मानसिकता को उजागर करता है जो पर्यावरण और अदालत के नियमों की आड़ लेकर गरीब की लाचारी पर चाबुक चलाती है, लेकिन असली प्रदूषकों के सामने भीगी बिल्ली बन जाती है।
​आज जब देश का गरीब किसान, मजदूर, छात्र और मध्यम वर्ग अभूतपूर्व महंगाई के दौर से गुजर रहा है, तब रातों-रात उनसे उनकी रोजी-रोटी का साधन छीन लेना न्यायसंगत कैसे हो सकता है? किसान के लिए उसका पुराना वाहन खेत से मंडी तक उपज पहुँचाने की सांस है, मजदूर के लिए काम पर जाने का एकमात्र जरिया, और छात्र के लिए शिक्षा का सेतु। वैश्विक आंकड़ों की हकीकत भी इस कड़वे सच को बयान करती है—मानव विकास सूचकांक (193 देशों में 134वाँ), वैश्विक भुखमरी सूचकांक (123 देशों में 102वाँ), प्रसन्नता रिपोर्ट (116वाँ) और प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक (159वाँ)। ये आंकड़े साफ गवाही देते हैं कि देश की एक बड़ी आबादी आज भी बुनियादी जरूरतों और गिरती क्रय शक्ति के कड़े संघर्ष में जी रही है। ऐसे में यह सवाल प्रशासनिक संवेदनहीनता पर करारा प्रहार है कि जो व्यक्ति दो वक्त की रोटी का इंतजाम मुश्किल से कर पा रहा हो, वह नया वाहन खरीदने का भारी आर्थिक बोझ कहाँ से उठाए?
​लेकिन इससे भी ज्यादा दुखद और शर्मनाक पहलू व्यवस्था का दोहरा रवैया है। सुप्रीम कोर्ट और नेशनल Green Tribunal (NGT) के आदेश पर्यावरण की सुरक्षा के लिए हैं, जो केवल वाहनों पर ही नहीं, बल्कि बिना ETP (Effluent Treatment Plant) और STP लगाए चलने वाले उद्योगों पर भी समान रूप से लागू होते हैं। NGT के स्पष्ट निर्देश हैं कि नदियों में रासायनिक कचरा बहाने वाली फैक्ट्रियों पर ताला लगे और उनके मालिकों पर आपराधिक मुकदमे दर्ज हों। इसके बावजूद बागपत, शामली और मेरठ की हिंडन, काली व कृष्ण नदी पट्टी के दर्जनों गाँव (जैसे गांगनौली) आज ‘कैंसर विलेज़’ में तब्दील हो चुके हैं। फैक्ट्रियों का जहरीला केमिकल भूजल में घुलकर घर-घर में कैंसर, लिवर और किडनी फेलियर जैसी जानलेवा बीमारियाँ बाँट रहा है।
​यहाँ आकर प्रशासनिक नीयत पूरी तरह नंगी हो जाती है। आम नागरिक और गरीब किसान ‘सस्ता निशाना’ (Soft Target) हैं; सड़क पर खड़े किसी बेबस का ट्रैक्टर या बाइक जब्त करना आसान है क्योंकि इसमें न कोई कानूनी अड़चन है और न ही राजनीतिक दबाव। वहीं दूसरी तरफ, जहरीला केमिकल बहाने वाले उद्योगों के पास भारी वित्तीय ताकत, राजनीतिक रसूख और चंदे का प्रभाव होता है। कागजी रिपोर्टों के खेल और भ्रष्टाचार की आड़ में इन रसूखदारों को अभयदान दे दिया जाता है, जबकि जहरीले पानी से मरते ग्रामीणों की चीखें किसी प्रशासनिक कान तक नहीं पहुँचतीं।
​पर्यावरण सुधार का रास्ता गरीब का चूल्हा बुझाकर या उसकी गाड़ी छीनकर नहीं निकल सकता। यदि सरकार वास्तव में पर्यावरण के प्रति गंभीर है, तो उसे वाहनों के मामले में जब्ती के बजाय आसान किश्तों पर वित्तीय सहायता, पर्याप्त समय (Grace Period) और आसान NOC प्रक्रिया जैसी नीतियाँ लागू करनी होंगी। साथ ही, नदियों को जहरीला बनाने वाली फैक्ट्रियों के खिलाफ वही कड़ाई दिखानी होगी जो सड़क पर खड़े आम आदमी पर दिखाई जाती है। जब तक प्रशासन ‘फायदे और रसूख’ की सोच छोड़कर असली प्रदूषकों पर दंडात्मक कार्रवाई नहीं करता, तब तक ‘पर्यावरण सुरक्षा’ के नाम पर चलाए जाने वाले ऐसे अभियान केवल प्रशासनिक दोहरेपन और गरीब विरोधी रवैये का ही प्रतीक बने रहेंगे।

✍️मोहित चौहान (सोशल एक्टिविस्ट )

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संपादकीय: पर्यावरण की आड़ में प्रशासनिक दोहारापन और पिसता आम आदमी​हाल ही में बागपत जिले में RTO प्रशासन द्वारा 10-15 साल पुराने वाहनों को उठाने की कार्रवाई और उसके विरोध में स्थानीय लोगों की प्रशासनिक अधिकारियों से मुलाकात ने एक कड़वे सच पर से पर्दा हटा दिया है। यह मुद्दा अब महज पुरानी गाड़ियों की जब्ती तक सीमित नहीं है, बल्कि उस प्रशासनिक मानसिकता को उजागर करता है जो पर्यावरण और अदालत के नियमों की आड़ लेकर गरीब की लाचारी पर चाबुक चलाती है, लेकिन असली प्रदूषकों के सामने भीगी बिल्ली बन जाती है।​आज जब देश का गरीब किसान, मजदूर, छात्र और मध्यम वर्ग अभूतपूर्व महंगाई के दौर से गुजर रहा है, तब रातों-रात उनसे उनकी रोजी-रोटी का साधन छीन लेना न्यायसंगत कैसे हो सकता है? किसान के लिए उसका पुराना वाहन खेत से मंडी तक उपज पहुँचाने की सांस है, मजदूर के लिए काम पर जाने का एकमात्र जरिया, और छात्र के लिए शिक्षा का सेतु। वैश्विक आंकड़ों की हकीकत भी इस कड़वे सच को बयान करती है—मानव विकास सूचकांक (193 देशों में 134वाँ), वैश्विक भुखमरी सूचकांक (123 देशों में 102वाँ), प्रसन्नता रिपोर्ट (116वाँ) और प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक (159वाँ)। ये आंकड़े साफ गवाही देते हैं कि देश की एक बड़ी आबादी आज भी बुनियादी जरूरतों और गिरती क्रय शक्ति के कड़े संघर्ष में जी रही है। ऐसे में यह सवाल प्रशासनिक संवेदनहीनता पर करारा प्रहार है कि जो व्यक्ति दो वक्त की रोटी का इंतजाम मुश्किल से कर पा रहा हो, वह नया वाहन खरीदने का भारी आर्थिक बोझ कहाँ से उठाए?​लेकिन इससे भी ज्यादा दुखद और शर्मनाक पहलू व्यवस्था का दोहरा रवैया है। सुप्रीम कोर्ट और नेशनल Green Tribunal (NGT) के आदेश पर्यावरण की सुरक्षा के लिए हैं, जो केवल वाहनों पर ही नहीं, बल्कि बिना ETP (Effluent Treatment Plant) और STP लगाए चलने वाले उद्योगों पर भी समान रूप से लागू होते हैं। NGT के स्पष्ट निर्देश हैं कि नदियों में रासायनिक कचरा बहाने वाली फैक्ट्रियों पर ताला लगे और उनके मालिकों पर आपराधिक मुकदमे दर्ज हों। इसके बावजूद बागपत, शामली और मेरठ की हिंडन, काली व कृष्ण नदी पट्टी के दर्जनों गाँव (जैसे गांगनौली) आज ‘कैंसर विलेज़’ में तब्दील हो चुके हैं। फैक्ट्रियों का जहरीला केमिकल भूजल में घुलकर घर-घर में कैंसर, लिवर और किडनी फेलियर जैसी जानलेवा बीमारियाँ बाँट रहा है।​यहाँ आकर प्रशासनिक नीयत पूरी तरह नंगी हो जाती है। आम नागरिक और गरीब किसान ‘सस्ता निशाना’ (Soft Target) हैं; सड़क पर खड़े किसी बेबस का ट्रैक्टर या बाइक जब्त करना आसान है क्योंकि इसमें न कोई कानूनी अड़चन है और न ही राजनीतिक दबाव। वहीं दूसरी तरफ, जहरीला केमिकल बहाने वाले उद्योगों के पास भारी वित्तीय ताकत, राजनीतिक रसूख और चंदे का प्रभाव होता है। कागजी रिपोर्टों के खेल और भ्रष्टाचार की आड़ में इन रसूखदारों को अभयदान दे दिया जाता है, जबकि जहरीले पानी से मरते ग्रामीणों की चीखें किसी प्रशासनिक कान तक नहीं पहुँचतीं।​पर्यावरण सुधार का रास्ता गरीब का चूल्हा बुझाकर या उसकी गाड़ी छीनकर नहीं निकल सकता। यदि सरकार वास्तव में पर्यावरण के प्रति गंभीर है, तो उसे वाहनों के मामले में जब्ती के बजाय आसान किश्तों पर वित्तीय सहायता, पर्याप्त समय (Grace Period) और आसान NOC प्रक्रिया जैसी नीतियाँ लागू करनी होंगी। साथ ही, नदियों को जहरीला बनाने वाली फैक्ट्रियों के खिलाफ वही कड़ाई दिखानी होगी जो सड़क पर खड़े आम आदमी पर दिखाई जाती है। जब तक प्रशासन ‘फायदे और रसूख’ की सोच छोड़कर असली प्रदूषकों पर दंडात्मक कार्रवाई नहीं करता, तब तक ‘पर्यावरण सुरक्षा’ के नाम पर चलाए जाने वाले ऐसे अभियान केवल प्रशासनिक दोहरेपन और गरीब विरोधी रवैये का ही प्रतीक बने रहेंगे।

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