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बड़ौत ::- दहेज व कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ आवाज उठाकर समाज में एक नया बदलाव लाने के लिए खापों के चौधरी आवाज उठाएंगे। बेटियों को आगे बढ़ाकर परिवार का कुलदीपक भी बनाया जाएगा। मिशन शक्ति अभियान के तहत बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ के लिए खाप चौधरियों को साथ लेकर प्रशासन ने यह मुहिम शुरू की। इसके लिए बड़ौत की पट्टी चौधरान में देशखाप के चौधरी सुरेंद्र सिंह के आवास पर खाप चौधरियों के साथ डीएम अस्मिता लाल ने संवाद किया। डीएम अस्मिता लाल ने कहा कि दहेज ऐसी प्रथा है जो बेटियों की आत्महत्या व हत्या को जन्म देती है। ऐसी प्रथा को बंद करना चाहिए। कन्या भ्रूण हत्या सबसे बड़ा पाप है और इस पाप से सभी को बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि अब समय बदलाव का आ गया है कि बेटियों के जन्म को उत्सव के रूप में मनाएं। खाप चौधरियों ने इस मुहिम में भागीदारी निभाते हुए आगे बढ़ाने का वादा किया। वहीं समाज में फैली कुरीतियों को दूर करने का फैसला भी लिया गया। डीएम ने खाप चौधरियों को एक-एक घड़ी व दीपक देकर सम्मानित किया। इसके बाद सभी ने बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ लिखे बैनर पर अपने हस्ताक्षर कर मुहिम को सफल बनाने का संकल्प लिया।

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सिर्फ चुनाव नहीं हारा था, अहंकार भी पराजित हुआ था!जुलाई 2022 में संसद के गलियारों में एक स्वर बार-बार सुनाई दे रहा था— “जवाब दो सोनिया गांधी…” “सुनो सोनिया गांधी…” “माफ़ी मांगो सोनिया गांधी…”अधीर रंजन चौधरी के एक बयान को लेकर तत्कालीन केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी से तीखे अंदाज़ में सवाल किए। राजनीतिक बहस और आरोप-प्रत्यारोप लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन राजनीति में शब्दों और व्यवहार की मर्यादा भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।कहा जाता है कि उस घटना ने कांग्रेस नेतृत्व, विशेषकर राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को भीतर तक प्रभावित किया। इसके बाद अमेठी में राजनीतिक संघर्ष केवल चुनावी मुकाबला नहीं रहा, बल्कि प्रतिष्ठा और सम्मान का प्रश्न भी बन गया।2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने अमेठी से अपने समर्पित कार्यकर्ता किशोरी लाल शर्मा को उम्मीदवार बनाया। चुनाव प्रचार की कमान प्रियंका गांधी ने संभाली और परिणाम सबके सामने था। स्मृति ईरानी को भारी अंतर से पराजय का सामना करना पड़ा।राजनीति के जानकार इस परिणाम को केवल चुनावी हार नहीं, बल्कि सत्ता और पद के अहंकार पर जनता के निर्णय के रूप में भी देखते हैं।सत्ता स्थायी नहीं होती। पद, प्रतिष्ठा और अधिकार समय के साथ आते-जाते रहते हैं। जो स्थायी रहता है, वह है व्यक्ति का व्यवहार, उसकी विनम्रता और लोगों के प्रति उसका सम्मान।यही कारण है कि इतिहास बार-बार हमें सिखाता है—”ये सत्ता का दबदबा, ये हुकूमत, ये दौलत का नशा, किरायेदार हैं सब, घर बदलते रहते हैं।”पद का अहंकार कभी नहीं करना चाहिए। आज जो शिखर पर है, कल उसे भी जनता के बीच खड़ा होना पड़ सकता है। इसलिए शब्दों में संयम, व्यवहार में विनम्रता और विरोधियों के प्रति भी सम्मान बनाए रखना ही सच्चे नेतृत्व की पहचान है।

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