हमें अपनी वास्तविक क्षमता के अनुसार ही मित्रता, सामाजिक दायरा और दिखावा बढ़ाना चाहिए।

कड़वी सच्चाई यह है कि कई लोग सैकड़ों-हजारों लोगों से मेलजोल रखते हैं, लेकिन जब किसी शादी, गृह प्रवेश, जन्मदिन या अन्य सामाजिक अवसर पर सहयोग देने की बारी आती है, तो ₹100 का योगदान देना भी भारी पड़ जाता है। कई बार यात्रा भी अपनी नहीं, दूसरों के सहारे करनी पड़ती है।
सम्मान दिखावे से नहीं, जिम्मेदारी निभाने से मिलता है।
कम मित्र हों, लेकिन ऐसे हों जो सुख-दुख में साथ खड़े हों।
सामाजिक प्रतिष्ठा का आधार भीड़ नहीं, बल्कि चरित्र, सहयोग और उत्तरदायित्व है।
पहले अपनी औकात क्षमता बनाइए, फिर अपना सामाजिक दायरा बढ़ाइए।
हमें अपनी औकात में रहकर फ्रेंड फॉलोइंग बढ़ानी चाहिए नहीं तो शादी में कन्यादान, बहु को मुंह दिखाई, जन्मदिन, गृह प्रवेश, साल ग्रह खाने के लिए हमारी ₹100 की भी औकात नहीं है एक आदमी की खर्च की डाइट ₹100 की है और कम से कम रुपए 500 देने के लिए चाहिए ही चाहिए तथा हम कार में भी दूसरे की ही बैठ कर जाते हैं। यह हाल है हमारे समाज के लोगों का।
आज सबसे बड़ी विडंबना यह है कि कुछ लोग मित्रों और परिचितों की संख्या बढ़ाने में तो आगे रहते हैं, लेकिन सामाजिक उत्तरदायित्व निभाने के समय पीछे हट जाते हैं।
शादी हो, कन्यादान हो, बहू की मुंह दिखाई, गृह प्रवेश, जन्मदिन या अन्य पारिवारिक अवसर—सम्मान केवल उपस्थित होने से नहीं, बल्कि अपनी सामर्थ्य के अनुसार सहयोग करने से भी मिलता है।
यदि अपनी आर्थिक स्थिति ऐसी है कि ₹100–₹500 का सामाजिक दायित्व निभाना भी कठिन हो, तो पहले अपनी आर्थिक और सामाजिक क्षमता को मजबूत बनाना अधिक बुद्धिमानी है। क्योंकि समाज में सबके अपने-अपने बहुत खर्च बढ़ गए हैं और समाज आर्थिक संकट से जूझ रहा है इसलिए जिसके यहां प्रोग्राम होते हैं उसको भी सोच समझकर खर्चा करना चाहिए।
याद रखिए— भीड़ में पहचान बनाना आसान है,
लेकिन समाज में सम्मान वही पाता है जो दिखावे से नहीं, जिम्मेदारी से रिश्ते निभाता है।
सामाजिक प्रतिष्ठा मित्रों की संख्या से नहीं, बल्कि निभाए गए दायित्वों से बनती है।
AKS