✍️AKS
आदिवासियों, मूल जातियां, अत्यंत पिछड़ी जातियों के पूर्वज प्राचीन हुंनरबाज थे, जिन्होंने कपड़े की सिलाई, सफाई, जूते का आविष्कार, नाव का आविष्कार, केश कला, कपड़ों की सफाई सजावट , अन्न उपजाने, विभिन्न प्रकार की सब्जियों के उत्पादन, महिलाओं की चूड़ियां श्रंगार के सामान और सज्जा, न्यूट्रीशियन, लकड़ी के फर्नीचर, लोहे, तांबे,पीतल, फूलकांसा आदि के बर्तन, सोने-चांदी के आभूषण बनाकर मानव सभ्यता को सजाया संवारा और आज भी जारी है। जहां यूरोप अमेरिका में dignity of labour है और इनकी सर्वोपरि इज़्ज़त है। ठीक इसके उलट भारत में कुछ भी काम न जानने वालों, बैठकर दूसरे की कमाई खाने वालों को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है वहीं वैज्ञानिक कमेरा समाज को शूद्र, अति शूद्र, दलित, अति दलित, पिछड़ा, अति पिछड़ा कहते हुए समाज की निम्नतम श्रेणी में रखकर उपेक्षित वंचित और अपमानित किए जाने को अपनी परम्परा मानकर शैक्षणिक, आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक रूप से संसाधनों में भागीदार न बनाते हुए एक विशाल वर्ग को कमजोर मजलूम, वंचित बनाकर रखा जाता रहा है और इनके सख्यानुपातिक भागीदारी की मांगों को कुचल दिया जाता है।
यह सिलसिला तत्काल रुकना चाहिए। देश की हुनरमंद दो-तिहाई से अधिक आबादी को बिना सक्षम बनाए या ये कहा जाए कि बिना देशवासियों को विकसित किए भला देश कैसे विकसित किया जा सकता है।
इनको समता समानता दिखाई नहीं देती 5 एकड़ से कम जमीन, 8 लाख वार्षिक आय है तो वो जनरल कैटेगरी (EWS) के लोग गरीब हैं…
और अत्यंत पिछड़े वर्ग कश्यप निषादों के पास 1 गट्टा या 1 डिसमिल भी जमीन न हो, 50 हजार से भी कम वार्षिक आय हो तो वो अमीर हैं।
इसी को भेदभाव अन्याय कहते हैं?
सोचिए और उचित मानें तो विचार को प्रवाह दीजियेगा।
✍️AKS
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धर्म के औचित्य को लेकर उसके समर्थक अलग-अलग दावे करते हैं. कुछ कहते हैं कि धर्म मनुष्यता का संरक्षक है. धर्म न हो तो सबकुछ गड़बड़ा जाये. धर्म सभ्यता को उस रूप में मर्यादित रखने का काम करता है, जैसा उसका तथाकथित रचियता चाहता है. धर्म के औचित्य को लेकर दूसरा तर्क है डर का. ऐसा मानने वाले कहते हैं कि धार्मिक शक्तियों(पारलौकिक) का डर ही समाज को अनुशासित रखता है. उसके भय से मानवीय मूल्य भी सुरक्षित बने रहते हैं. लेकिन जब डर की ही अपनी कोई नैतिकता(या नैतिक आधार) नहीं होता—तो वह मानवीय मूल्यों का संरक्षण कैसे कर सकता है. अध्यात्मबोध की बात अलग है. हर व्यक्ति का अध्यात्मबोध अलग होता है. समस्या तब पैदा होती है, जब अध्यात्मबोध का बलात् सामान्यीकरण करते हुए, धार्मिक शक्तियां धर्म का प्रतीकीकरण कर चाहती हैं. तब धर्म उस लक्ष्य से बहुत दूर निकल जाता है, जिसे ध्यान में रखकर उस धर्म का प्रवर्त्तन किया गया था.
इसका सबसे बड़ा शिकार ब्राह्मण-धर्म अथवा तथाकथित हिंदू धर्म के साथ है. इसकी सबसे बड़ी त्रासदी कथित हिंदू धर्म का कोई एकल ग्रन्थ या देवता नहीं है. शायद खुद को इसका संरक्षक कहने वाले ही नहीं चाहते कि इसका कोई एकल ग्रंथ अथवा देवता हो, क्योंकि जैसे ही वे ऐसा करने की कोशिश करेंगे, तुरन्त उनके अन्तर्विरोध सामने आने लगेंगे. एकल देवता या मान्य धर्म-संहिता न होने का सबसे बड़ा नुकसान है कि इसमें वर्चस्वकारी ताकतों को, धर्म और धर्मशास्त्रों के नाम पर मनमानी करने की छूट मिल जाती है. इसके दुष्परिणाम की एक झलक जोतिबा फुले के तृतीय रत्न नाटक में देखी जा सकती है, जिसमें चालबाज जोशी अशिक्षित किसान दंपति को तरह-तरह का डर दिखाकर अपना उल्लू सीधा करता है. यह नाटक 1855 में लिखा गया था और 1929 तक अप्रकाशित रहा.

