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खास रिपोर्ट – कृषि के मोर्चे पर अमेरिका के साथ प्रस्तावित डील ने मोदी सरकार को ऐसे दोराहे पर ला खड़ा किया है, जहां हर रास्ता जोखिम भरा दिखता है। एक ओर वैश्विक दबाव और रणनीतिक साझेदारी की मजबूरी है, तो दूसरी ओर देश के किसानों की आशंकाएं, जो पहले से ही नीतिगत प्रयोगों से आहत महसूस कर रहे हैं। भारत सहित अन्य राज्यों से उठती किसान आंदोलन की आहट सिर्फ़ एक चेतावनी नहीं, बल्कि उस अधूरे संवाद का परिणाम है जो सरकार और किसानों के बीच लंबे समय से टूटा हुआ है। “इस बार संसद में घुसेंगे” जैसे शब्द लोकतंत्र के लिए गंभीर संकेत हैं ये गुस्सा भी है और हताशा भी, किसान कोई अराजक समूह नहीं, बल्कि वही वर्ग है जिसकी मेहनत पर देश की खाद्य सुरक्षा टिकी है। अगर आज वही किसान संसद तक पहुंचने की बात कर रहा है, तो सवाल किसानों से ज़्यादा सत्ता के गलियारों से पूछा जाना चाहिए आख़िर संवाद कहां और क्यों टूटा? सरकार की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ क़ानून बनाना नहीं, बल्कि असहमति को सुनना और समाधान निकालना भी है। बार-बार आंदोलनों का रास्ता अपनाना किसी भी लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं होता। दूसरी ओर, आंदोलन की भाषा और दिशा भी संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर रहनी चाहिए, ताकि असली मुद्दा शोर में न दब जाए। आज ज़रूरत टकराव की नहीं, भरोसे की है। किसान संसद तक नहीं, समाधान तक पहुंचना चाहता है। अगर सरकार समय रहते गंभीर बातचीत का रास्ता खोलती है, तो सड़कों पर उबाल और लोकतंत्र पर दबाव दोनों से बचा जा सकता है। क्योंकि कृषि समझौते केवल काग़ज़ी दस्तावेज़ नहीं होते, वे देश की रीढ़ से जुड़े होते हैं। आज ज़रूरत है पारदर्शिता, संसद में खुली बहस और किसानों को विश्वास में लेने की। वरना अमेरिका डील सरकार के लिए कूटनीतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि घरेलू संकट की वजह बन सकती है। क्योंकि खेती में लिया गया हर फैसला, अंततः लोकतंत्र की ज़मीन पर ही परखा जाता है। वहीं ऐसी चेतावनियां इतिहास बनती हैं, और समाधान भविष्य तय करते हैं।

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जिस नौकरी को पाने के लिए छात्र दिन रात मेहनत करते हैं मैडम ने हंसते हुए त्याग पत्र दे दिया। अंदर का पता नहीं लेकिन पाती को पढ़ना चाहिए। धन्य है वो परिवार जिसके साये में संस्कार मिले। पढ़िए ये त्यागपत्र…IAS दिव्या मित्तल मैडम ने x पर लिखा है कि आज मैंने 13 वर्षों की अविस्मरणीय यात्रा को अपनी इच्छा से विराम देते हुए IAS से त्यागपत्र दे दिया है।साधारण परिवेश में पलते हुए मैंने एक अच्छे, सफल जीवन का सपना देखा था। दिन-रात एक कर IIT दिल्ली और IIM बैंगलोर से पढ़ने के बाद, लंदन में नौकरी लग गयी। पर ‘सब कुछ’ पा लेने पर भी कुछ अधूरा था। अपने देश में न होना खलता था। मेरी पढ़ाई, आत्मविश्वास, दुनिया में कहीं भी सिर उठाकर चलने की ताक़त, सब इस मिट्टी का कर्ज़ था मुझ पर। वो कर्ज़ चुकाना था। चाहती थी जिस भारत का सपना देखा था, उसे बनाने वाली ईंटों पर मेरे भी हाथों के निशान हों। सो लौट आई, और IAS अधिकारी बनने का सौभाग्य मिला।बहुत कुछ करने का मौका मिला और बहुत सीखा। देवरिया ने सिखाया कि सही के साथ खड़ा होना विकल्प नहीं, कर्तव्य है। मीरजापुर ने सिखाया कि ‘असंभव’ कोई तथ्य नहीं, बस एक राय है। और माँ विंध्यवासिनी के चरणों में बैठकर सीखा कि शक्ति किसी पद से नहीं, उनकी कृपा और लोगों के विश्वास से आती है। सबसे बड़ी सीख यह थी कि अपने लिए देखे सपने तो पूरे हो चुके थे, अब अपने लोगों के लिए देखे सपनों को जीना था। इस जीवन का असली सुकून उन आँखों में दिखा, जिस परिवार को पहली बार ज़मीन का हक़ मिला, जिस दिव्यांग को सम्मान से जीने का अवसर मिला, और जिस किसान के खेत को पानी मिला। उनके संघर्षों में साथ चलते हुए मैंने सीखा कि हर सरकारी फ़ाइल के पीछे एक व्यक्ति है, और उसकी गरिमा बनाये रखना ही न्याय है। #ias #divyamittal #Resignation

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