हाल ही में देश के सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीश प्रसन्ना बी. वराले ने प्राथमिक शिक्षा की बदहाली पर जो गहरी चिंता व्यक्त की, वह केवल महाराष्ट्र की तस्वीर नहीं है, बल्कि देश के विशालतम राज्य उत्तर प्रदेश सहित संपूर्ण भारत के सरकारी शिक्षा तंत्र की एक कड़वी और टीस देती हकीकत है। एक तरफ जहां धार्मिक आयोजनों, कॉरिडोरों और महाकुंभ जैसे आयोजनों के नाम पर हजारों करोड़ रुपये का बजट पलक झपकते मंजूर हो जाता है, वहीं देश का भविष्य गढ़ने वाले प्राथमिक विद्यालयों के हिस्से केवल उपेक्षा, संसाधनों का अभाव और बजटीय तंगी आती है। जरा सोचिए, यदि इन भारी-भरकम खर्चों का महज 0.01 प्रतिशत हिस्सा भी प्राथमिक शिक्षा की मजबूती पर खर्च हुआ होता, तो न जाने कितने सरकारी स्कूल बंद होने से बच जाते और कितनी अबोध बच्चियों को जमीन पर सोने के कारण विषधरों का शिकार न होना पड़ता।
सवाल बजट की अनुपलब्धता का नहीं, बल्कि सरकारी प्राथमिकताओं का है। उत्तर प्रदेश के बागपत जिले का ही उदाहरण लें, जहां 650 से अधिक परिषदीय विद्यालयों में बुनियादी सुधार के लिए ‘समग्र शिक्षा’, ‘ऑपरेशन कायाकल्प’ और ‘पीएम श्री’ जैसी योजनाओं के तहत करोड़ों रुपये का बजट आता है। लेकिन जब धरातल पर नजर डालते हैं, तो यह सरकारी पैसा एक ऐसी व्यवस्था में गंतव्य से पहले ही भाप बनकर उड़ जाता है, जिसे भ्रष्टाचार और प्रशासनिक सांठगांठ का घुन लग चुका है।
इस पूरी बदहाली के केंद्र में ठेकेदारी प्रथा, फर्जीवाड़ा और जांच के नाम पर होने वाली संगठित वसूली है। ‘पीएम श्री’ जैसी महत्वाकांक्षी योजनाओं में कागजों पर तो स्मार्ट क्लासरूम और आधुनिक उपकरणों के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, परंतु सामान की आपूर्ति विभागीय सांठगांठ से तय ठेकेदारों की मर्जी से होती है। घटिया निर्माण, बेनूर टाइल्स और कामचलाऊ सामान के एवज में सरकारी खजाने से लाखों रुपये का भुगतान तो हो जाता है, लेकिन कुछ ही महीनों में ये ‘आधुनिक’ सुविधाएं खंडहर में तब्दील हो जाती हैं।
इस दीमक लगे सिस्टम का सबसे घिनौना चेहरा तब सामने आता है, जब मिड-डे मील और बुनियादी सुविधाओं की जांच के लिए संविदा पर रखे गए कर्मचारियों को असीमित शक्तियां थमा दी जाती हैं। ये संविदा कर्मी किसी बड़े सुधार के लिए नहीं, बल्कि विभागीय बड़े अधिकारियों के लिए कमिशन वसूली के मोहरे के रूप में काम करते हैं। स्कूलों में मौके पर बच्चों की संख्या कम मिलना या खाने की गुणवत्ता खराब होना सुधार का कारण बनने के बजाय सौदेबाजी का जरिया बन जाता है। नीचे से ऊपर तक बंटे कमीशन के इस खेल में अंततः कटौती गरीब बच्चों की थाली के निवाले से होती है और गाज गिरती है देश के उस नौनिहाल पर जो वहां अफसर, वैज्ञानिक या न्यायाधीश बनने का सपना लेकर आता है।
यदि इस गिरती स्थिति को सचमुच संभालना है, तो कड़े और कड़वे प्रशासनिक फैसलों का समय आ चुका है। केवल बजट आवंटित कर देने से व्यवस्थाएं नहीं सुधरतीं, इसके लिए सबसे पहले शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों जैसे चुनाव, सर्वे और बीएलओ ड्यूटी के अंतहीन बोझ से पूरी तरह मुक्त करना होगा ताकि उनका शत-प्रतिशत समय केवल शिक्षण पर लगे। इसके साथ ही स्कूलों में खरीदी और निर्माण का अंतिम भुगतान केवल विभागीय फाइलों पर न होकर ग्राम पंचायत, प्रधानाध्यापक और अभिभावक-शिक्षक समिति के संतुष्टि प्रमाण-पत्र पर ही आधारित होना चाहिए। पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए संविदा कर्मचारियों के अकेले निरीक्षण पर तुरंत रोक लगे और जांच रिपोर्ट को जियो-टैग्ड फोटो के साथ सीधे सार्वजनिक पोर्टल पर अपलोड किया जाए।
न्यायमूर्ति वराले का स्वयं एक जिला परिषद के प्राथमिक स्कूल से निकलकर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के पद तक पहुंचना इस बात का साक्षात प्रमाण है कि सरकारी स्कूलों की माटी में प्रतिभाओं की कमी नहीं है। कमी है तो बस उस राजनीतिक व प्रशासनिक इच्छाशक्ति की, जो धार्मिक मेलों और भव्य इमारतों से परे जाकर देश की नींव, अर्थात उसके प्राथमिक विद्यालयों को सुरक्षित, आधुनिक और समृद्ध बना सके। वक्त आ गया है कि सरकारें ईंट-पत्थर के कॉरिडोरों के साथ-साथ ज्ञान और भविष्य के इन गलियारों को बचाने को अपनी पहली प्राथमिकता बनाएं।
✍️मोहित चौहान (सामाजिक कार्यकर्ता )