आर.जी. कर केस की दूसरी वर्षगांठ पर, अभया की माँ, रत्ना देवनाथ ने कथित तौर पर दावा किया कि उनकी बेटी की हत्या की गई थी, बलात्कार नहीं किया गया था। उनके बयान ने जांच, न्याय की खोज और यह सुनिश्चित किया कि क्या राजनीतिक हितों ने मामले को इस हद तक प्रभावित किया है?

आरोप अभी भी कानूनी कार्रवाई, साक्ष्य और सक्षम अधिकारियों के निष्कर्षों के अधीन हैं। मामला जवाबदेही, पारदर्शिता और न्याय के बारे में भी है।
लॉर्ड एक्टन ने बिल्कुल सच कहा था— “ताकत इंसान को भ्रष्ट बनाती है, और बेहिसाब ताकत पूरी तरह से अंधा और भ्रष्ट कर देती है!”
आखिर सच को छुपाने के लिए और कितना नीचे गिरेगी हुकूमत? किसे बचाने के लिए जांच की दिशा मोड़ी गई? क्या अब देश में बेटियों की चीखों से ज्यादा कीमत राजनीतिक कुर्सियों की है?
घिन्न आती है ऐसी व्यवस्था और सोच पर जब जब बलात्कार को भी इन्होंने राजनीति का खेल बना दिया है।
ऐसा लगता है कि बलात्कारियों का समर्थन और विरोध सब इनके राजनीतिक लाभ हानि का हिस्सा है।
क्या राजनीति से उपर भी इनके लिए कुछ है या नहीं है?
इस औरत ने पहले क्या कहा और अब क्या कह रही है?
मीडिया और लोग चीख चीख कर बलात्कार के खिलाफ बोल रहे थे और अब ये उसी बलात्कार को खारिज कर हत्या बता रही है क्यों?
क्या लड़की के कपड़े, खून, जांच सब झूठे हो गए? क्यों झूठे हो गए? क्या असली गुनहगारों को बचाने के लिए जांच की दिशा मोड़ी जा रही है, या सरकार बदल गई तो अब मामले की लीपापोती करनी है ताकि सच सामने न आने पाए।
क्या यह पूरा खेल ममता बनर्जी सरकार को बदनाम करने के लिए खेला गया था? कहीं ऐसा तो नहीं कि इस बलात्कार के साथ अस्पताल में अन्य गंदे और गैर कानूनी काम हो रहें हो जिनपे पर्दा डालने के लिए इनसे राजनीतिक बयान दिलवाया गया हो।
यह बयान इस महिला का बयान है या इसकी स्क्रिप्ट 56 इंच के बंदर ने लिखी है? सरकार किसे बचाना चाहती है?