
मोहित चौहान (सामाजिक कार्यकर्ता )
आज का समाज एक अजीब विरोधाभास के दौर से गुजर रहा है, जहाँ एक तरफ तकनीक और आधुनिकता का परचम लहरा रहा है, वहीं दूसरी तरफ हमारी धार्मिक और आध्यात्मिक समझ दिनों-दिन सतही, बाह्य और विकृत होती जा रही है। इसका सबसे करुण और चिंताजनक दृश्य हमें भक्ति के नाम पर सड़कों पर दिखाई देता है। कानफोड़ू डीजे पर बजते फूहड़ गीत, नशे में धुत होकर झूमते नवयुवक, और शिव-पार्वती का स्वांग रचकर सड़कों पर किया जाने वाला अमर्यादित प्रदर्शन—क्या वाकई यही वह ‘शिवत्व’ है जिसकी नींव हमारे ऋषियों ने रखी थी? या फिर हमने अपनी सामाजिक उच्छृंखलता और व्यसनों को धर्म का पवित्र चोला पहनाने का एक आत्मघाती प्रयास शुरू कर दिया है? समय आ गया है कि हम अपनी आँखें खोलें और भक्ति के इस तमाशे से परे जाकर उस परम सत्य को पहचानें जो वेदों, उपनिषदों और महान दार्शनिकों ने हमें सिखाया है।
वेदों के पन्नों को पलटें तो वहाँ शिव किसी विकारग्रस्त नशा करने वाले व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड की परम चेतना के रूप में प्रकट होते हैं। ऋग्वेद में जिन्हें ‘रुद्र’ कहा गया, वे दुखों का हरण करने वाले और समस्त रोगों का निवारण करने वाले वैद्यों के भी वैद्य हैं। यजुर्वेद का ‘श्री रुद्रम्’ चीख-चीखकर पुकारता है कि शिव तो सृष्टि के कण-कण में, बहती नदियों में, हरे-भरे वृक्षों में और हर जीव के भीतर स्पंदित होने वाली शांति हैं। ऋग्वेद का महामृत्युंजय मंत्र हमें अज्ञान और मृत्यु के भय से मुक्त करने की प्रार्थना सिखाता है, न कि नशे की बेहोशी में डूबने का उपदेश देता है। जिस सोमरस की आड़ लेकर आज नशे को ‘प्रसाद’ कहा जाता है, वह वेदों में वर्णित एक आरोग्यदायिनी ओषधि थी, कोई मदिरा या भांग नहीं। शिवलिंग पर धतूरा और आंकड़ा चढ़ाने का वास्तविक अर्थ ही यही था कि मनुष्य अपने भीतर की उग्रता, कड़वाहट, क्रोध और वासना रूपी विष को ईश्वर के चरणों में समर्पित कर स्वयं निर्मल और शुद्ध हो जाए; परंतु त्रासदी देखिए कि हमने उन विषैले पदार्थों को अपने भीतर उतारना शुरू कर दिया।
इसी पावन परंपरा में कांवड़ यात्रा और हरिद्वार से पैदल गंगाजल लाने का संदर्भ आता है, जिसकी महिमा अत्यंत पवित्र और आध्यात्मिक है। समुद्र मंथन के समय जब संपूर्ण सृष्टि को भस्म कर देने वाला भीषण हलाहल विष निकला, तब संपूर्ण जगत की रक्षा के लिए भगवान शिव ने उसे स्वयं अपने कंठ में धारण कर लिया। विष के भयानक ताप से शिवजी के शरीर में जो दाह पैदा हुई, उसे शांत करने के लिए देवगणों और परम भक्तों ने पवित्र नदियों के जल से उनका अभिषेक किया था। तभी से हरिद्वार, गंगोत्री या नीलकंठ जैसे तीर्थों से नंगे पैर पैदल कांवड़ में पवित्र गंगाजल लाकर जलाभिषेक करने की पावन परंपरा चली आ रही है। कांवड़ यात्रा केवल जल लाने का साधन नहीं, बल्कि भक्त की कठिन साधना, संकल्प और अहंकार के विसर्जन की महिमा है। सैकड़ों किलोमीटर तपती धूप, बारिश और छाले भरे पैरों से चलने का उद्देश्य शरीर के मोह को त्यागना और मन को केवल ‘शिव’ में लीन करना है। रास्ते में ऊँच-नीच, अमीर-गरीब का भेद भूलकर एक-दूसरे को ‘भोले’ कहकर पुकारना और कांवड़ को कभी जमीन पर न रखकर उसकी पवित्रता बनाए रखना अद्भुत अनुशासन सिखाता है। कांवड़ यात्रा तो त्याग, कृतज्ञता और आत्म-शुद्धि का वह अलौकिक यज्ञ है जहाँ भक्त अपने कष्ट सहकर भी जगतपति का आभार व्यक्त करता है।
दुनिया के महानतम विचारकों और वैज्ञानिकों ने भी शिव को जिस रूप में देखा, वह मन को विस्मित कर देने वाला है। स्वामी विवेकानंद के लिए शिव कोई शरीर धारण किए व्यक्ति नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर की वह निष्पाप, अलौकिक आत्मा और शुद्ध चेतना हैं, जो अहंकार के मिटते ही प्रकट होती है। ओशो के शब्दों में शिव ‘परम शून्य’ और ध्यान की पराकाष्ठा हैं, जिन्होंने पार्वती के संग संवाद में ध्यान की 112 ऐसी विधियाँ दीं जो संपूर्ण मानव चेतना के रूपांतरण का विज्ञान हैं। सद्गुरु उन्हें ‘आदियोगी’ कहते हैं—वह पहला योगी जिसने इंसान को सीमाओं से परे जाकर असीम होने का मार्ग दिखाया। यहाँ तक कि आधुनिक भौतिकी के पुरोधा फ्रीजोफ काप्रा और खगोलशास्त्री कार्ल सागन ने स्वीकार किया कि शिव का ‘नटराज’ रूप उप-परमाणुक कणों के बनने और नष्ट होने के ब्रह्मांडीय नृत्य का सबसे सटीक वैज्ञानिक निरूपण है।
फिर प्रश्न उठता है कि जिस शिवत्व और कांवड़ यात्रा का स्वरूप इतना भव्य, अनुशासित, वैज्ञानिक और सार्वभौमिक है, उसे हमने सड़कों के हुड़दंग में कैसे बदल दिया? शिव ‘योगेश्वर’ हैं, और योग का अर्थ है चित्त की वृत्तियों का शांत होना, मन का जाग्रत और होश में आना। जो मनुष्य नशे में धुत होकर अपनी सुध-बुध खो दे, अपने आचरण से दूसरों के लिए असुविधा पैदा करे, बीमारों और वृद्धों की शांति भंग करे, वह शिव का भक्त या सच्चा कांवड़िया कैसे हो सकता है? जगदंबा पार्वती और जगतपिता शिव का स्वांग रचकर सड़कों पर नाचना आस्था नहीं, बल्कि ईश्वर का मनोरंजन के साधन के रूप में किया जाने वाला अनादर है। जैसे शिव ने समुद्र मंथन का हलाहल विष अपने कंठ में उतारकर पूरी दुनिया को बचाया था, वैसे ही सच्चे भक्त का कर्तव्य समाज में फैली नफरत और कड़वाहट के विष को पी जाना और बदले में केवल प्रेम और शांति बांटना है।
सच्ची शिवभक्ति सड़कों पर शोर मचाने या नशे की धुंध में खो जाने में नहीं है। वह तो मन को शांत करने, इंद्रियों पर विजय पाने, व्यसनों से मुक्त होने और हर जीव में उस परमेश्वर की झलक देखने में है। कांवड़ का पवित्र जल शिव पर चढ़ाने से पहले अपने भीतर की बुराइयों और कलुषता का जलाभिषेक करना अनिवार्य है। शिव कोई ऐसा माध्यम नहीं हैं जिनकी आड़ लेकर हम अपनी असभ्यता को सही ठहराएं; शिव तो वह ठहराव हैं जहाँ पहुँचकर मन का सारा शोर थम जाता है। धर्म का मूल ‘होश’ में है, ‘बेहोशी’ में नहीं। आइए, शिव और कांवड़ की महिमा को रील, गानों और नशे के इस सतही आवरण से बाहर निकालकर वेदों के ज्ञान, संकल्प की साधना और ध्यान की गहराई में खोजें। जब हम अपने भीतर छिपे अहंकार को जलाकर भस्म करेंगे और मन को करुणा व अनुशासन से भरेंगे, तभी सही अर्थों में हमारे भीतर ‘शिवत्व’ का वास्तविक प्रकटीकरण होगा।
✍️मोहित चौहान (सामाजिक कार्यकर्ता )