
एडवोकेट पुष्पेंद्र कुमार
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 39-ए में यह स्पष्ट और निश्छल संकल्प निहित है कि राज्य प्रत्येक नागरिक को ‘सुलभ, सस्ता और त्वरित न्याय’ सुनिश्चित करेगा। परंतु जब किसी नागरिक को अपने एक बुनियादी कानूनी हक या छोटे से विवाद की सुनवाई के लिए 700 किलोमीटर का सफर तय करना पड़े, तो संविधान का यह पावन संकल्प महज़ एक कागज़ी दस्तावेज़ प्रतीत होने लगता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की लगभग 9 करोड़ की विशाल आबादी दशकों से इसी विडंबना को जीने के लिए मजबूर है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) की एक स्थायी पीठ (Bench) की माँग कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस जायज और तार्किक माँग को जिस तरह सियासत और प्रशासनिक पेचीदगियों के भंवर में फँसाकर रखा गया है, वह लोकतांत्रिक व्यवस्था की संवेदनहीनता को उजागर करता है।
भौगोलिक और सामाजिक-आर्थिक आंकड़ों पर नज़र डालें तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश का दर्जा देश के कई बड़े राज्यों से भी बड़ा है। मेरठ, आगरा, सहारनपुर, गाजियाबाद, मुरादाबाद और अलीगढ़ जैसे मंडलों को मिलाकर बनने वाले इस क्षेत्र की आबादी राजस्थान, तमिलनाडु या कर्नाटक जैसे राज्यों से भी अधिक है। इलाहाबाद हाईकोर्ट में लंबित मुकदमों में से आधा हिस्सा अकेले इसी क्षेत्र का है। इसके बावजूद, उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ (जो केवल 12 जिलों का कार्यक्षेत्र संभालती है) के पास तो अपनी एक अलग बेंच है, लेकिन 30 जिलों और असीमित राजस्व देने वाले पश्चिमी क्षेत्र को न्याय पाने के लिए प्रयागराज का रुख करना पड़ता है। एक आम किसान या मध्यमवर्गीय नागरिक के लिए प्रयागराज आने-जाने का खर्च, वकील की फीस से कहीं ज्यादा भारी पड़ जाता है। नतीजा यह है कि कई लोग आर्थिक तंगी और समय की बर्बादी के डर से न्याय पाने की उम्मीद ही छोड़ बैठते हैं।
विडंबना यह है कि यह समस्या अनजानी नहीं है। 1980 के दशक में गठित न्यायमूर्ति जसवंत सिंह आयोग ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट की बेंच स्थापित करने की स्पष्ट सिफारिश की थी। इस रिपोर्ट के आधार पर देश के अन्य राज्यों—जैसे महाराष्ट्र (औरंगाबाद बेंच) और तमिलनाडु (मदुरै बेंच)—में तो नई पीठें गठित कर दी गईं, लेकिन उत्तर प्रदेश में इस सिफारिश को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। आखिर क्यों?
प्रयागराज के अधिवक्ताओं का तर्क रहा है कि पीठ विभाजित होने से हाईकोर्ट का प्रभाव कम हो जाएगा, जबकि सच्चाई यह है कि यह विरोध काफी हद तक आर्थिक और क्षेत्रीय वर्चस्व से जुड़ा है। वहीं दूसरी ओर, केंद्र और राज्य सरकारें चुनावी नफा-नुकसान की गणित में उलझी रहती हैं। पूर्वी यूपी के वोट बैंक के खिसकने के डर और शहरों के आंतरिक मतभेदों (मेरठ बनाम आगरा) का बहाना बनाकर इस फैसले को लगातार टाला जा रहा है।
लेकिन सवाल यह है कि प्रशासनिक और राजनीतिक असहमति की कीमत आम नागरिक कब तक चुकाता रहेगा?
डिजिटल क्रांति के इस दौर में, जहाँ हम ‘ई-कोर्ट्स’ और ‘वर्चुअल सुनवाई’ की बात करते हैं, वहाँ करोड़ों लोगों को बुनियादी न्यायिक पहुँच से वंचित रखना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। यदि राजनीतिक कारणों से स्थायी बेंच के गठन में देरी हो रही है, तो कम से कम पश्चिमी यूपी के प्रमुख केंद्रों पर हाईकोर्ट की हाइब्रिड या वर्चुअल बेंच की शुरुआत तुरंत की जानी चाहिए।
न्याय का मकसद केवल फैसला सुनाना नहीं, बल्कि न्याय पाने की प्रक्रिया को भी मानवीय और सुलभ बनाना है। जब तक पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोगों के लिए न्याय की चौखट उनके करीब नहीं लाई जाएगी, तब तक “सबको न्याय” का दावा अधूरा ही रहेगा। अब समय आ गया है कि सरकारें और न्यायपालिका आपसी गतिरोध को समाप्त करें और जसवंत सिंह आयोग की सिफारिशों को लागू कर इस दशकों पुरानी उपेक्षा का अंत करें।
✍️एडवोकेट पुष्पेंद्र कुमार