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​सहारनपुर से लेकर गाजियाबाद-नोएडा तक बहने वाली नदियां आज सिर्फ मृत जलस्रोत नहीं हैं, बल्कि वे एक पूरी सभ्यता और जनमानस के लिए साइलेंट किलर (धीमा ज़हर) बन चुकी हैं। यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश की वह कड़वी हकीकत है, जो चुनावी वादों की चकाचौंध में हर बार दफन कर दी जाती है।

​कृष्णा और हिंडन—ये महज दो नदियों के नाम नहीं हैं, बल्कि यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश की समृद्ध कृषि व्यवस्था और ग्रामीण जीवन की धमनियां थीं। लेकिन आज इन धमनियों में पानी नहीं, बल्कि फैक्ट्रियों का गाढ़ा, काला और तेजाबी रसायन बह रहा है। सहारनपुर से शुरू होकर बागपत, मेरठ, गाजियाबाद और नोएडा तक का यह पूरा बेल्ट आज एक भयानक मानवीय त्रासदी से गुजर रहा है। केंद्रीय और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की तमाम कागजी रिपोर्टों से इतर, ज़मीनी हकीकत यह है कि इन नदियों का पानी अब ‘मृत’ घोषित हो चुका है। खतरनाक हेवी मेटल्स (भारी धातुओं) और रसायनों ने न सिर्फ नदी को मारा, बल्कि रिस-रिसकर ज़मीन के अंदरूनी पानी को भी ज़हरीला बना दिया है। नतीजा आज हमारे सामने है—इस क्षेत्र के सैकड़ों गाँवों में कैंसर, अस्थमा, त्वचा रोग और पेट की जानलेवा बीमारियां महामारी की तरह पैर पसार चुकी हैं। कई गाँव तो ऐसे हैं जिन्हें अब ‘कैंसर विलेज’ के खौफनाक नाम से पुकारा जाने लगा है।

​विचित्र विडंबना देखिए कि एक तरफ देश में स्वास्थ्य सुविधाओं के वैश्विक स्तर पर पहुँचने के दावे किए जाते हैं, तो दूसरी तरफ इस त्रस्त और बीमार आबादी के पास इलाज का कोई ठोस साधन तक नहीं है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, जो देश को सबसे ज्यादा राजस्व और अनाज देता है, आज स्वास्थ्य के मोर्चे पर पूरी तरह लाचार है। यहाँ के गरीब मरीजों को कैंसर जैसी घातक बीमारियों के इलाज के लिए या तो दिल्ली के एम्स (AIIMS) की लंबी कतारों में दम तोड़ना पड़ता है या फिर कर्ज के दलदल में डूबकर निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ता है। इस पूरे क्षेत्र में एक भी ‘एम्स’ जैसा विश्वस्तरीय चिकित्सा संस्थान न होना, यहाँ के करोड़ों नागरिकों के जीवन के साथ एक क्रूर मज़ाक है।
​यह स्थिति किसी प्राकृतिक आपदा का परिणाम नहीं है, बल्कि यह विशुद्ध रूप से एक ‘प्रशासनिक और राजनीतिक विफलता’ है। चुनाव आते हैं, तो राजनेताओं के भाषणों में नदियों की सफाई, पर्यावरण और अस्पतालों के बड़े-बड़े वादे तैरने लगते हैं। जनभावनाओं को सहलाकर वोट बटोर लिए जाते हैं। लेकिन जैसे ही चुनाव की स्याही उंगली से मिटती है, हुक्मरान अपने वादे भी भूल जाते हैं। मिल-मालिकों और भ्रष्ट अधिकारियों का वह गठजोड़ फिर से सक्रिय हो जाता है, जो रात के अंधेरे में इन नदियों में बेखौफ ज़हर उड़ेलता है। पाँच साल तक जनता घुट-घुटकर मरती रहती है, और अगली बार फिर एक नया चुनावी घोषणापत्र थमा दिया जाता है।
​अब पानी सिर से ऊपर निकल चुका है। नदियों का यह संकट केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं रहा, यह सीधे-सीधे मानवाधिकारों और जीने के अधिकार का उल्लंघन है। सरकार को यह समझना होगा कि एक्सप्रेस-वे और चमचमाते शहरों का विकास तब तक बेमानी है, जब तक उनके बगल में बसने वाले गाँवों के बच्चे दूषित पानी पीकर कैंसर की गिरफ्त में आ रहे हों।
​समय आ गया है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की इस पुकार को सुना जाए। यहाँ तत्काल प्रभाव से हिंडन-कृष्णा बेसिन के लिए एक ‘विशेष टास्क फोर्स’ गठित कर प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों पर सख्त आपराधिक कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही, इस क्षेत्र की स्वास्थ्य आपातकाल जैसी स्थिति को देखते हुए एक समर्पित AIIMS संस्थान की स्थापना को युद्धस्तर पर मंजूरी दी जानी चाहिए। सरकारें अपनी जवाबदेही से अब और नहीं भाग सकतीं। जनता को वोट बैंक समझने वाले नीति-नियंताओं को यह याद रखना होगा कि बीमार और लाचार जनता के कंधों पर कभी सशक्त राष्ट्र का निर्माण नहीं हो सकता।

✍️मोहित चौहान (सामाजिक कार्यकर्ता)

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