दिल्ली-शामली-सहारनपुर रेल मार्ग के दोहरीकरण का यक्ष प्रश्न
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की उपजाऊ माटी, गन्ने के खेतों की महक और कर्मठ जनमानस के बीच से होकर गुजरती एक रेल पटरी बीते पाँच दशकों से अपनी नियति बदलने की राह देख रही है। 1973 में जब दिल्ली-शाहदरा-बागपत-बड़ौत-शामली-सहारनपुर मार्ग पर नैरोगेज की छुक-छुक बंद कर ब्रॉडगेज की शुरुआत हुई थी, तब इस पूरे क्षेत्र ने एक सुनहरे और समृद्ध भविष्य का सपना देखा था। लेकिन पाँच दशक से अधिक का समय बीत जाने, दर्जनों सरकारों के आने-जाने और न जाने कितने शिलान्यासों व आश्वासनों के बावजूद, यह रेल मार्ग आज भी ‘सिंगल ट्रैक’ के जाल में उलझा हुआ है। सवाल केवल लोहे की एक पटरी का नहीं है, बल्कि बागपत से लेकर सहारनपुर तक बसने वाली 80 लाख की आबादी और रोज़ाना दिल्ली-एनसीआर की ओर रुख करने वाले एक लाख से अधिक उन यात्रियों के आत्मसम्मान का है, जिनका आधा जीवन स्टेशनों पर खड़ी ट्रेनों के डिब्बों में लाल सिग्नल देखते हुए बीत जाता है।
हाल के वर्षों में रेलवे ने इस रूट का विद्युतीकरण करके वाहवाही तो बटोरी, लेकिन ज़मीनी हकीकत में आम आदमी के लिए कुछ खास नहीं बदला। ट्रेन का इंजन भले ही बिजली का हो गया हो, लेकिन जब तक पटरी एक ही रहेगी, तब तक भौतिक विज्ञान और सुरक्षा का नियम नहीं बदल सकता। क्रॉसिंग के नाम पर पैसेंजर और मेमू ट्रेनों को छोटे-छोटे स्टेशनों पर घंटों खड़ा रख दिया जाता है। जो सफर महज़ डेढ़ से दो घंटे में पूरा होना चाहिए, उसमें चार घंटे से अधिक लग जाते हैं। दैनिक यात्रियों का समय, ऊर्जा और मानसिक शांति इस लाल सिग्नल की बलि चढ़ रही है।
निःसंदेह, बीते वर्षों में इस क्षेत्र में एक्सप्रेसवे और हाईवे का एक बेहतरीन जाल बिछा है, जिसने गाड़ियों की रफ्तार तो बढ़ा दी, लेकिन इसने एक आम और गरीब आदमी की जेब पर दोहरी मार दी है। सड़क मार्ग से समय तो बच जाता है, लेकिन ईंधन के भारी खर्च के साथ-साथ जगह-जगह बने टोल प्लाज़ा की वसूली अक्सर पेट्रोल-डीज़ल से भी भारी पड़ती है। एक दिहाड़ी मज़दूर, छोटा व्यापारी, विद्यार्थी या साधारण नौकरीपेशा इंसान जो महीने में ₹300-₹500 के रेलवे पास (MST) से यात्रा कर सकता था, उसे अब मजबूरी में रोज़ाना सैकड़ों रुपये टोल और निजी साधनों पर फूंकने पड़ रहे हैं। हाईवे समृद्ध वर्ग को तो राहत दे सकते हैं, लेकिन वे एक सस्ती, सुरक्षित और समावेशी रेल सेवा का विकल्प कभी नहीं बन सकते।
आखिर इतनी बड़ी आबादी और भारी जन-दबाव के बावजूद यह परियोजना 50 साल तक फाइलों में ही क्यों घूमती रही? इसका सबसे बड़ा कारण रेलवे का केवल व्यावसायिक और ‘मालभाड़ा केंद्रित’ दृष्टिकोण रहा है। रेलवे का अधिकांश राजस्व मालगाड़ियों से आता है, और चूंकि इस मार्ग को केवल ‘स्थानीय पैसेंजर रूट’ माना गया, इसलिए इसे हमेशा प्राथमिकताओं की सूची में सबसे नीचे रखा गया। राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी का आलम यह रहा कि 2016 में शिलान्यास होने और पिंक बुक में बजट दिखने के बावजूद, ज़मीनी स्तर पर फंड जारी न होने से पुरानी डीपीआर भी ठंडे बस्ते में चली गई।
इस मार्ग का दोहरीकरण केवल पटरियाँ बिछाना भर नहीं है, बल्कि यह पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के आर्थिक पुनरुद्धार का सबसे बड़ा इंजन साबित होगा। जब यह ट्रैक डबल होगा, तभी इस क्षेत्र को लंबी दूरी की एक्सप्रेस, एसी ट्रेनों और नमो भारत जैसे आधुनिक साधनों से जोड़ा जा सकेगा। शामली और बड़ौत का कृषि, गुड़, हथकरघा और एमएसएमई उद्योग सीधे देश की बड़ी मंडियों से जुड़ सकेगा, जिससे युवाओं को अपने घर के पास ही रोजगार और विकास के नए अवसर मिलेंगे।
अब समय आ गया है कि कागज़ी सर्वे, नए आश्वासनों और चुनावी घोषणाओं के फेर से बाहर निकलकर इस ज़मीनी समस्या का स्थायी समाधान निकाला जाए। क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों और रेल मंत्रालय को यह समझना होगा कि इस क्षेत्र की जनता अब और इंतज़ार करने के मूड में नहीं है। फाइलों की धूल झाड़कर पटरियों को धरातल पर बिछाना ही इस क्षेत्र के लाखों लोगों के प्रति सच्ची न्यायप्रियता होगी।
✍️मोहित चौहान (सामाजिक कार्यकर्ता )