
चिकित्सा का क्षेत्र, जिसे समाज में हमेशा से सर्वोच्च और पवित्र पेशा माना गया है, आज मानवीय संवेदनाओं से कटकर एक अमानवीय व्यापार का रूप लेता दिख रहा है। अस्पताल के चौखट पर कदम रखते ही एक आम नागरिक खुद को केवल लाचार ही नहीं, बल्कि पूरी तरह ठगा हुआ पाता है। आज स्थिति यह हो चुकी है कि बीमारी से लड़ने के बजाय मरीज और उसका परिवार व्यवस्था की इस लूट से लड़ने में पस्त हो जाता है। अस्पतालों में कदम रखते ही बिना किसी जरूरत के महँगे और अनगिनत टेस्ट लिख देना एक स्थापित परिपाटी बन चुका है। जिन जाँचों का मरीज की मूल बीमारी से कोई लेना-देना नहीं होता, वे भी महज पैथोलॉजी लैब और अस्पतालों के बीच चलने वाले कमीशन के खेल को भुनाने के लिए थोप दी जाती हैं। मरीज को यह तक जानने का हक नहीं बचता कि उसकी देह पर कौन सी जाँच क्यों की जा रही है और उसका हासिल क्या है।
बात सिर्फ अनावश्यक जाँचों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि दवाइयों की बेलगाम कीमतें और होटल जैसी दरों पर बेचे जाने वाले कमरों का किराया आम नागरिक की रीढ़ तोड़ने के लिए काफी है। जिस दवा या इंजेक्शन की वास्तविक लागत चंद रुपये या पैसे में होती है, उसे ब्रांडेड नाम का मुलम्मा चढ़ाकर हजारों रुपये में मरीज को थमा दिया जाता है। वही दूसरी ओर, पाँच सितारा होटलों को भी मात देते अस्पतालों के कमरों का किराया हर बीतते दिन के साथ मरीज की बची-खुची जमापूँजी निचोड़ लेता है। मेडिक्लेम और ‘आयुष्मान भारत’ जैसी सरकारी योजनाओं के आने के बाद तो अस्पतालों के हौसले और बुलंद हो गए हैं। भले ही पैसा सीधे मरीज की जेब से न जा रहा हो, लेकिन क्लेम भुनाने की होड़ में मरीज को जबरन भर्ती कर लिया जाता है और अनावश्यक चीर-फाड़ तथा ऑपरेशनों के चक्रव्यूह में धकेल दिया जाता है। इस पूरे खेल में भले ही भुगतान बीमा एजेंसियाँ कर रही हों, पर गैर-जरूरी दवाओं का जहर और सर्जिकल प्रक्रियाओं का शारीरिक नुकसान तो मरीज के अपने ही शरीर को झेलना पड़ता है।
इस पूरे अमानवीय ढर्रे का सबसे खौफनाक और शर्मनाक रूप आईसीयू और वेंटिलेटर के व्यवसाय में देखने को मिलता है। कई बार अस्पतालों को भली-भांति पता होता है कि मरीज की स्थिति में सुधार की कोई गुंजाइश नहीं है या उनके पास उस बीमारी का कोई विशेषज्ञ मौजूद ही नहीं है, फिर भी महज बिल भारी करने की नीयत से मरीज को दो-चार दिन रोककर रखा जाता है। जब तक मरीज की अंतिम साँस तक का पैसा न निचोड़ लिया जाए, उसे किसी अन्य केंद्र के लिए रेफर नहीं किया जाता। नया मरीज मिलते ही पुराने को हटा देना या मृत घोषित कर देना नैतिक पतन की अंतिम पराकाष्ठा है।
इस अराजक और संवेदनाहीन व्यवस्था पर तुरंत लगाम कसना समय की सबसे बड़ी माँग है। सरकार को महज मूकदर्शक बने रहने के बजाय इस पूरे तंत्र में सीधे हस्तक्षेप करना होगा। सबसे पहले निजी अस्पतालों, पैथोलॉजी लैब, आईसीयू और कमरों के किराए की एक अधिकतम सीमा तय करनी होगी ताकि कोई भी संस्थान मनमाने दाम न वसूल सके। इसके साथ ही, अस्पतालों में किए जाने वाले इलाजों और ऑपरेशनों की पारदर्शिता तय करने के लिए एक सख्त और स्वतंत्र ‘मेडिकल ऑडिट’ व्यवस्था का निर्माण अनिवार्य है, जो संदिग्ध बिलों और अकारण लिखे गए टेस्टों की निष्पक्ष जाँच कर सके। जिन अस्पतालों के पास विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध न हों, उनके द्वारा मरीजों को बेवजह रोककर रखने पर भारी जुर्माना लगाने और लाइसेंस निरस्त करने जैसे कड़े कानून समय की आवश्यकता हैं। चिकित्सा कोई मुनाफा कमाने वाला उद्योग नहीं, बल्कि मानव जीवन की रक्षा का अंतिम संबल है; यदि सरकार ने इस संस्थागत लूट पर जल्द ही कड़ा प्रशासनिक और कानूनी अंकुश नहीं लगाया, तो आम आदमी के लिए इलाज का यह मर्ज़ उसकी जान से भी ज्यादा महँगा साबित होता रहेगा।
✍️मोहित चौहान (सामाजिक कार्यकर्ता )