जिनकी पहली पहचान लावारिस थी, आज वे हैं ‘नव्या’ और ‘समायरा’, जिलाधिकारी ने गोद में उठाकर हाल जाना
बेटी बचाओ का संदेश बना संवेदना: दो नवजात बेटियों को मिला नया जीवन-संकल्प
बागपत 05 अगस्त 2026 — कभी-कभी कुछ घटनाएं केवल समाचार नहीं होतीं, बल्कि पूरे समाज के लिए आत्ममंथन का विषय बन जाती हैं। पिछले कुछ दिनों में बागपत में ऐसी ही दो घटनाएं सामने आईं, जिन्होंने हर संवेदनशील व्यक्ति का मन झकझोर दिया। एक मासूम ने जन्म लेते ही नाली का अंधेरा देखा, दूसरी ने रेलवे ट्रैक किनारे झाड़ियों के बीच अपनी पहली सांसें लीं। दोनों की पहली पहचान असहायता थी, लेकिन आज उनकी पहचान बदल चुकी है। वे अब केवल “लावारिस नवजात” नहीं, बल्कि ‘नव्या’ और ‘समायरा’ हैं—दो ऐसे नाम, जिनमें भविष्य की उम्मीद, संरक्षण और जीवन का संदेश समाहित है।
आज जिला अस्पताल में इन दोनों बच्चियों के बीच पहुंचीं जिलाधिकारी अस्मिता लाल ने उनका हालचाल जानने के साथ-साथ एसएनसीयू (स्पेशल न्यूबॉर्न केयर यूनिट) का विस्तृत निरीक्षण किया। उन्होंने प्रत्येक बच्ची की स्वास्थ्य स्थिति, चिकित्सकीय प्रगति, पोषण, संक्रमण से सुरक्षा, वजन, उपचार की प्रक्रिया और आगे की देखभाल की योजना की जानकारी चिकित्सकों से विस्तार से ली। उन्होंने अस्पताल प्रशासन को निर्देश दिए कि दोनों नवजातों को सर्वोत्तम चिकित्सकीय सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं तथा उनकी देखभाल में किसी भी प्रकार की कमी न रहे।
निरीक्षण के दौरान जिलाधिकारी ने नवजात गहन चिकित्सा इकाई की व्यवस्थाओं का भी अवलोकन किया। उन्होंने उपलब्ध उपकरणों, नवजातों के लिए उपलब्ध बेड, संक्रमण नियंत्रण व्यवस्था, औषधियों की उपलब्धता, चिकित्सकीय निगरानी तथा चिकित्सा प्रोटोकॉल की जानकारी प्राप्त की। साथ ही चिकित्सकों और नर्सिंग स्टाफ से संवाद कर नवजात शिशुओं की देखभाल में अपनाई जा रही व्यवस्थाओं की समीक्षा की तथा आवश्यक दिशा-निर्देश दिए कि प्रत्येक नवजात को समयबद्ध, गुणवत्तापूर्ण और संवेदनशील उपचार सुनिश्चित किया जाए।
दर्द की दो कहानियां, लेकिन उम्मीद का एक संदेश
पहली घटना में एक अविवाहित युवती ने प्रसव के बाद नवजात बच्ची को नाली में छोड़ दिया था। अत्यधिक रक्तस्राव के कारण युवती की बाद में मृत्यु हो गई। दूसरी ओर, बड़ौत रेलवे ट्रैक के किनारे झाड़ियों में एक नवजात बच्ची रोती हुई मिली। स्थानीय महिला ने उसकी आवाज सुनकर उसे सुरक्षित बाहर निकाला, प्राथमिक उपचार कराया और उसके जीवन की रक्षा की। बाद में एक परिवार ने उसे अपनाने की इच्छा भी जताई।
दोनों घटनाओं की परिस्थितियां अलग-अलग थीं, लेकिन दोनों ने समाज के सामने एक ही प्रश्न रखा—क्या हर बेटी को जन्म लेने के साथ ही सुरक्षा, सम्मान और अपनापन नहीं मिलना चाहिए?
जिला अस्पताल में संवेदनाओं से भरा दृश्य
जिला अस्पताल के एसएनसीयू वार्ड में बुधवार का माहौल सामान्य निरीक्षण से अलग था। जिलाधिकारी ने दोनों बच्चियों को अपनी गोद में लेकर उनके स्वास्थ्य की जानकारी ली। उन्होंने डॉक्टरों से उपचार की प्रगति, वजन, पोषण, संक्रमण से सुरक्षा तथा आगे की चिकित्सकीय योजना पर विस्तार से चर्चा की। निरीक्षण के दौरान उन्होंने अस्पताल प्रशासन को निर्देश दिए कि दोनों नवजातों को सर्वोत्तम चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जाए तथा किसी भी प्रकार की लापरवाही की कोई गुंजाइश न रहे। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में चिकित्सा के साथ-साथ मानवीय संवेदनशीलता भी उतनी ही आवश्यक है।
डॉक्टरों और अस्पताल कर्मियों ने दोनों बच्चियों की स्वास्थ्य स्थिति की जानकारी देते हुए बताया कि चिकित्सकीय निगरानी में उनका उपचार लगातार जारी है और आवश्यक देखभाल सुनिश्चित की जा रही है।
जब मिला नया नाम, मिली नई पहचान
निरीक्षण के दौरान सबसे भावुक क्षण तब आया, जब जिलाधिकारी ने दोनों बच्चियों को नया नाम देने का निर्णय लिया।
नाली में मिली बच्ची का नाम रखा गया “नव्या”। ‘नव्या’ का अर्थ है—नई शुरुआत, नया जीवन, नवीन संभावना और नई आशा। यह नाम उस बच्ची की कहानी को एक नई दिशा देता है। जिस जीवन की शुरुआत अत्यंत कठिन परिस्थितियों में हुई, वही अब नए अवसर, नए भविष्य और नई उम्मीद का प्रतीक बन गया। रेलवे ट्रैक के किनारे झाड़ियों में मिली बच्ची का नाम रखा गया “समायरा”। ‘समायरा’ का अर्थ है—ईश्वर की सुरक्षा में रहने वाली। जिस बच्ची को झाड़ियों में असहाय छोड़ दिया गया था, उसका सुरक्षित बच जाना मानो यह संदेश देता है कि हर जीवन की रक्षा के लिए कहीं न कहीं ईश्वर किसी न किसी माध्यम को भेज देता है। उसका यह नाम सुरक्षा, संरक्षण और विश्वास का प्रतीक बन गया।
दोनों नाम अपने भीतर एक गहरा सामाजिक संदेश समेटे हुए हैं। ‘नव्या’ बताती है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन हों, हर जीवन को नई शुरुआत का अवसर मिलना चाहिए। ‘समायरा’ यह विश्वास जगाती है कि कोई भी बच्चा समाज में अकेला नहीं है। यदि समाज संवेदनशील बने, तो हर असहाय जीवन को सुरक्षा और अपनापन मिल सकता है। इन दोनों नामों के माध्यम से बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ और बाल संरक्षण के संदेश को भी नई अभिव्यक्ति मिली।
निरीक्षण के दौरान जिलाधिकारी ने केवल स्वास्थ्य सुविधाओं की समीक्षा तक स्वयं को सीमित नहीं रखा। उन्होंने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिए कि दोनों बच्चियों के संरक्षण, वैधानिक प्रक्रियाओं, आवश्यक दस्तावेजी कार्रवाई तथा बाल कल्याण से जुड़े सभी प्रावधानों को समयबद्ध ढंग से पूरा किया जाए। उन्होंने कहा कि ऐसे प्रत्येक मामले में बच्चे का सर्वोत्तम हित सर्वोच्च प्राथमिकता होना चाहिए। प्रशासन का प्रयास रहेगा कि दोनों बच्चियों को सुरक्षित वातावरण, गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं तथा भविष्य में आवश्यक संरक्षण उपलब्ध कराया जाए।
समाज ने भी दिखाई संवेदना
इन घटनाओं ने यह भी साबित किया कि समाज में संवेदनाएं आज भी जीवित हैं। रेलवे ट्रैक के पास रोती हुई बच्ची की आवाज सुनकर स्थानीय महिला ने बिना देर किए उसे सुरक्षित उठाया और अस्पताल पहुंचाया। यदि कुछ मिनट और देर हो जाती, तो स्थिति गंभीर हो सकती थी। बाद में एक परिवार द्वारा बच्ची को अपनाने की इच्छा जताना भी समाज की सकारात्मक सोच को दर्शाता है। यह केवल एक परिवार का निर्णय नहीं, बल्कि यह संदेश है कि बेटियां किसी की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सौभाग्य हैं।
एक तस्वीर, जिसने हजार शब्द कह दिए
जिला अस्पताल में जब जिलाधिकारी ने दोनों बच्चियों को अपनी गोद में लिया, चिकित्सकों से उनके बारे में चर्चा की और उनके लिए आवश्यक निर्देश दिए, तो वह दृश्य केवल एक प्रशासनिक निरीक्षण नहीं था। वह दृश्य इस बात का प्रतीक था कि शासन और प्रशासन केवल योजनाओं और फाइलों तक सीमित नहीं है, बल्कि जरूरत पड़ने पर सबसे कमजोर और सबसे असहाय जीवन के साथ भी खड़ा होता है। यह तस्वीर आने वाले वर्षों तक शायद इस बात की याद दिलाती रहेगी कि किसी भी समाज की पहचान उसकी सबसे कमजोर और असहाय नागरिक के प्रति उसके व्यवहार से होती है।
इन दोनों बच्चियों की कहानी उस समाज की भी कहानी कहती है, जहां कठिन परिस्थितियों के बीच भी मानवता जीवित है; जहां एक महिला रोती हुई बच्ची को बचाने के लिए आगे आती है; जहां एक परिवार उसे अपनाने की इच्छा जताता है; जहां चिकित्सक दिन-रात उसकी देखभाल करते हैं; और जहां जिला प्रशासन यह सुनिश्चित करता है कि किसी मासूम का भविष्य केवल उसकी जन्म परिस्थितियों से तय न हो। जिलाधिकारी ने इन दोनों बेटियों को केवल दो नाम नहीं दिए, बल्कि यह भरोसा भी दिया है कि उनका भविष्य सुरक्षित, सम्मानजनक और संभावनाओं से भरा होगा।