परम पाखंड देखिए…**
पैदा तुम बिना पंचांग देखे हुए थे, और श्मशान की आग भी कोई ‘शुभ घड़ी’ देखकर नहीं लगाई जाएगी।
लेकिन इन दोनों के बीच की चंद दिनों की ज़िंदगी में ‘शुभ मुहूर्त’ का ऐसा ढोंग पाल रखा है कि बिना चौघड़िया देखे जैसे तुम्हारे कदम ही नहीं उठते!
अगर तुम्हारे पंचांग और ग्रह-नक्षत्रों में सचमुच इतना ही दम होता, तो क्या देश में भूख, बेरोज़गारी, अन्याय, बलात्कार और भ्रष्टाचार भी किसी ‘अशुभ काल’ का इंतज़ार करते?
जब कोई गरीब बिना खाए सोता है या कोई युवा डिग्रियां लेकर ठोकरें खाता है, तब आसमान का कौन सा ग्रह अपनी चाल बिगाड़ता है?
मूर्तियों में प्राण-प्रतिष्ठा के लिए नक्षत्र और घड़ियां ढूंढ़ने वालों! कभी अपने अंदर मर चुकी इंसानियत में प्राण फूंकने का भी कोई मुहूर्त निकाला है?
असल ‘शुभ मुहूर्त’ तो उस दिन होगा, जब धर्म और आडंबर का चश्मा उतारकर किसी भूखे की थाली में रोटी रखोगे, चौराहे पर भीख मांगते बचपन के हाथ में किताब दोगे, और इंसान को कीड़ा समझना बंद करोगे।
पत्थरों को पूजने के लिए पंचांग खंगालने वाली इस खोखली व्यवस्था को, ज़िंदा इंसानों की चीखें सुनने के लिए भी कोई शुभ समय निकालना चाहिए।
दिमाग का जाला साफ करो! इस समाज की सड़ांध और तुम्हारी परेशानियां शनि-मंगल की चाल से नहीं, तुम्हारे खुद के निकम्मे और स्वार्थी कर्मों की देन हैं। पंचांग नहीं, अपनी सोच का शुद्धिकरण करो।
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