सनातन को बाँटने वाले कौन, बोलने वाले या तोड़-मरोड़ करने वाले?कृपया पूरी लेख पढ़ने के बाद इसे यथावत शेयर करें, जिससे यह अधिक-से-अधिक लोगों तक पहुँच सके।
जिन लोगों को हमारे बाँके बिहारी लाल को बाँका ( टेढ़ा ) कहने से आपत्ति हो, वे यह लेख पढ़ें 👇
श्रीवृन्दावन धाम में बहु प्रसिद्ध श्री बांके बिहारी मन्दिर है।
जो कि सम्भवतः सर्वाधिक प्राचीन भी है और वृन्दावन जाने वाले भक्त यदि वृन्दावन जाते हैं तो बिहारी जी के दर्शन करने ही जाते हैं।
अब जो लोग भगवान् श्रीकृष्ण के टेढ़े नाम या टेढ़े खड़े होने पर विलाप करके बागेश्वर धाम सरकार के धीरेन्द्र शास्त्री को कोस रहे हैं वे कृपया पता लगाएँ कि बाँके बिहारी में बाँके शब्द का अर्थ क्या है?
जिन्हें न पता हो उन्हें बता देता हूँ बाँके का मूल अर्थ है टेढ़ा, झुका हुआ, तिरछा।
इसी से इसके दो बड़े अर्थ बनते हैं:-
-कृष्ण के लिए: त्रिभंग मुद्रा में, यानी तीन जगह से टेढ़े खड़े होकर बाँसुरी बजाने वाले कृष्ण को बाँके बिहारी कहा जाता है। बाँका यहाँ उनकी टेढ़ी, मनमोहक मुद्रा के लिए है।
-आदमी / अदा के लिए: छैला, अलबेला, सुंदर और अकड़ वाला जवान। जैसे बाँकी अदा, बाँकी चितवन, बाँका जवान।
तो जहाँ भी बाँके सुनो, समझो बात टेढ़ेपन की नहीं, उस टेढ़ेपन में छिपी सुंदरता और शान की हो रही है।
धीरेन्द्र शास्त्री युवा हैं,,फिर भी विनम्र हैं,,उन्होंने विवाद देखने पर तुरंत क्षमा याचना भी कर ली ( जबकि इस विषय में क्षमा याचना की आवश्यकता नहीं थी ) उसके बाद भी इस विषय पर विवाद।
जिन्हें भी इसमें भगवान् का अपमान लगता है कृपया वे बताएँ कि वे बाँके बिहारी को सीधे बिहारी कहते हैं या बाँके बिहारी ही कहते हैं?
भगवान् की आस्था पर अचानक प्रेम उड़ेलने वाले इन महाशयों से कोई पूछे कि क्या वे मथुरा में भगवान् श्रीकृष्ण जन्मभूमि को मुक्त करने में सहयोग करेंगे? या उनकी आस्था केवल टेढ़े कहने से ही आहत होती है?
पूरे प्रकरण में निम्नलिखित बातें गौर करने योग्य हैं :-*
अहंकार की लड़ाई और ज्ञान की लड़ाई में अक्सर भ्रम होता है।
मैकाले इतना सफल हो चुका है कि भगवान श्रीकृष्ण के प्रति प्रसिद्ध लोकदुलार को कट्टरपंथी समुदायों की तरह ईशनिंदा के स्तर पर जोड़ा जा रहा है। श्रीकृष्ण के लिए श्रीगोपालसहस्त्रनाम में एक नाम ही है – जारचोरशिखामणि। द्वारिकाधीश श्रीकृष्ण राजा रणछोड़ कहे जाते हैं। माखनचोर आदि नाम तो प्रसिद्ध ही हैं। कला, भावना एवं समझ का इतना ह्रास इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ। इसका एक कारण लोकगीतों, परंपरा के ज्ञान एवं रचनाधर्मिता का ह्रास भी है। विदेश से आयातित कचरे को शिक्षा व्यवस्था पर थोपते – थोपते यह ह्रास हुआ है।
खैर ! भगवान परमकृपालु हैं, किसी प्रकार से अनुकूल भाव से याद करो, प्यार करो, कल्याण ही करते हैं।
बोलो बाँके बिहारी लाल की जय 🙏🙌🙇!