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दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) व्यवस्था से हुए विधायी बदलाव को रेखांकित करते हुए कोर्ट ने समझाया कि BNSS की धारा 173(3) अपराधों की कुछ श्रेणियों में FIR के रजिस्ट्रेशन से पहले एक अतिरिक्त प्रक्रियात्मक फिल्टर (छानबीन की प्रक्रिया) लागू करती है।

यह प्रावधान पुलिस को एक सीनियर अधिकारी की पूर्व अनुमति से उन मामलों में प्रारंभिक जांच करने की अनुमति देता है, जिनमें 3 से 7 साल तक की सज़ा हो सकती है, भले ही शिकायत में ऊपरी तौर पर कोई संज्ञेय अपराध ही क्यों न दिखाई दे रहा हो।

CrPC की धारा 154 के विपरीत, जहां यदि कोई संज्ञेय अपराध सामने आता है तो FIR का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य होता है, BNSS की धारा 173(3) आरोपों के केवल बाहरी रूप से परे जाकर उनकी बारीकी से जांच करने की अनुमति देती है, जिससे पुलिस यह आकलन कर पाती है कि क्या वास्तव में कोई प्रथम दृष्टया मामला बनता है।

कोर्ट ने कहा,

“इस प्रकार, धारा 173 की उप-धारा (3) को शामिल करने के पीछे विधायी मंशा उन मामलों में FIR के मशीनी रजिस्ट्रेशन के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करना प्रतीत होती है, जहां आरोप, भले ही संज्ञेय अपराध की भाषा में गढ़े गए हों, लेकिन मूल रूप से अस्पष्ट, अनुमानित या स्वाभाविक रूप से संदिग्ध हो सकते हैं।”

कोर्ट ने कहा कि हालांकि यह तय करने के लिए कोई कठोर और निश्चित मापदंड नहीं है कि ऐसी प्रथम दृष्टया संतुष्टि कब उत्पन्न हो सकती है, “प्रारंभिक जांच की अनुमति देने का मूल उद्देश्य ही तुच्छ या अनुमानित आरोपों के आधार पर आपराधिक कार्यवाही शुरू होने से रोकना है।”

कोर्ट ने राजस्थान पुलिस द्वारा सीनियर मीडिया कार्यकारी के खिलाफ दर्ज की गई FIR रद्द की और शिकायत को “अस्पष्ट और अनुमानित आरोपों पर सावधानीपूर्वक बुनी गई काल्पनिक कहानी” करार दिया।

तथ्यात्मक पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता आशीष दवे ज़ी मीडिया कॉर्पोरेशन लिमिटेड के स्वामित्व वाले चैनलों – ज़ी राजस्थान और ज़ी 24 घंटा – के चैनल हेड के रूप में कार्यरत थे। सितंबर, 2025 में दवे और प्रबंधन के बीच अनबन (मनमुटाव) होने के बाद कंपनी ने जयपुर के अशोक नगर पुलिस स्टेशन में आपराधिक शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में आरोप लगाया गया कि डेव ने बिना इजाज़त के पैसों का लेन-देन किया, अपनी पद का गलत इस्तेमाल किया, बाहर की संस्थाओं से मीडिया में गलत खबरें छपवाने की धमकी देकर पैसों की मांग की और दबाव बनाने के लिए बदनाम करने वाला या डराने-धमकाने वाला कंटेंट फैलाया। यह भी दावा किया गया कि उनके इन कामों से कंपनी की इज्ज़त और पैसों को नुकसान पहुंचा है।

इन आरोपों के आधार पर पुलिस ने ‘भारतीय न्याय संहिता, 2023’ के तहत जबरन वसूली, धोखाधड़ी और आपराधिक धमकी से जुड़ी धाराओं के तहत FIR दर्ज कर ली।

दवे ने ‘BNSS की धारा 528’ के तहत राजस्थान हाईकोर्ट में इस FIR को चुनौती दी। उन्होंने दलील दी कि ये आरोप झूठे और अस्पष्ट हैं। उन्हें नौकरी से निकाले जाने के बाद बदले की भावना से लगाए गए। हालाँकि, हाईकोर्ट ने FIR रद्द करने से मना किया। कोर्ट ने कहा कि शुरुआती दौर में इस मामले की बारीकी से जांच नहीं की जा सकती।

सुप्रीम कोर्ट के निष्कर्ष

अपील को मंज़ूर करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि शिकायत में “बिल्कुल भी ठोस जानकारी नहीं थी”। इसमें किसी भी संज्ञेय अपराध (जिस पर पुलिस बिना वारंट के कार्रवाई कर सकती है) के बुनियादी तत्व भी नहीं बताए गए। कोर्ट ने गौर किया कि शिकायत में किसी एक भी पीड़ित की पहचान नहीं बताई गई, न ही किसी खास घटना का ज़िक्र था, और न ही जबरन वसूली या धमकी के किसी ठोस मामले का हवाला दिया गया। कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्य सरकार की तरफ से दाखिल किया गया जवाब (Counter-Affidavit) भी उतना ही अस्पष्ट था और उसमें भी कोई ठोस जानकारी नहीं थी।

कोर्ट की बेंच ने जिस तरह से FIR दर्ज की गई, उसकी आलोचना की। बेंच ने कहा कि पुलिस ने “असामान्य जल्दबाज़ी” दिखाई और आरोपों की बुनियादी जाँच भी नहीं की। कोर्ट ने कहा कि अगर ऐसी शिकायत किसी आम नागरिक ने की होती, तो शायद FIR दर्ज ही नहीं होती।

आगे कहा गया,

“हमें यह कहना पड़ रहा है कि अगर कोई आम नागरिक ऐसी अस्पष्ट शिकायतों वाली कंप्लेंट लेकर पुलिस के पास जाता तो FIR कभी दर्ज नहीं होती। हालांकि, अशोक नगर पुलिस स्टेशन के अधिकारियों ने जिस तेज़ी से रेस्पोंडेंट नंबर 2-शिकायतकर्ता-कंपनी की कंप्लेंट पर कार्रवाई की और FIR दर्ज की, उससे साफ़ पता चलता है कि शिकायतकर्ता का कितना असर है।”

इस मामले में कोर्ट ने पाया कि सभी कथित अपराधों में तीन से सात साल की सज़ा का प्रावधान था, जिस पर सीधे तौर पर BNSS की धारा 173(3) लागू होता है। इसके बावजूद, पुलिस ने कोई शुरुआती जांच नहीं की और सीधे FIR दर्ज कर ली।

शिकायत में बुनियादी जानकारियों की कमी को देखते हुए कोर्ट ने कहा कि यह तय करने के लिए एक शुरुआती जांच साफ़ तौर पर ज़रूरी थी कि क्या कोई प्रथम दृष्टया मामला बनता है।

कोर्ट ने कहा कि चूंकि शिकायतकर्ता-कंपनी एक जानी-मानी मीडिया कंपनी (Zee Media) थी, इसलिए उस पर यह ज़्यादा ज़िम्मेदारी थी कि वह साफ़ तौर पर ज़रूरी जानकारियां और अहम बातें बताए, जिनसे प्रथम दृष्टया यह साबित हो सके कि अपीलकर्ता ने कथित तौर पर कोई आपराधिक काम किया। कोर्ट ने यह भी पाया कि राजस्थान सरकार की तरफ़ से दायर किया गया काउंटर-एफ़िडेविट भी जानकारियों से खाली था।

यह मानते हुए कि मुक़दमे की कार्रवाई जारी रखना कानून की प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल होगा, सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया और FIR के साथ-साथ दवे के खिलाफ़ चल रही सभी आगे की कार्रवाइयों को भी खत्म कर दिया।

Case Title: ASHISH DAVE Versus THE STATE OF RAJASTHAN AND ANR., SLP(Crl) No. 19369/2025

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