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Boabet: Den ultimate casinoopplevelsen i Norge 📰 बड़ी खबर: 8वें वेतन आयोग (8th CPC) और JCM के बीच पहली ऐतिहासिक बैठक संपन्न!नई दिल्ली | 29 अप्रैल, 2026 केन्द्रीय कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए एक बहुत बड़ी और सकारात्मक खबर निकलकर सामने आ रही है। NC-JCM (Staff Side) की स्टैंडिंग कमेटी और 8वें वेतन आयोग के बीच पहली औपचारिक बैठक कल, 28 अप्रैल 2026 को सफलतापूर्वक संपन्न हुई।इस बैठक में श्री शिव गोपाल मिश्रा (सचिव, NC-JCM) के नेतृत्व में कर्मचारी पक्ष ने 8वें वेतन आयोग के सामने अपनी प्रमुख मांगों का चार्टर रखा है।🚀 बैठक की मुख्य बातें और बड़ी मांगें:💰 न्यूनतम वेतन ₹69,000: कर्मचारी पक्ष ने मांग की है कि वर्तमान न्यूनतम वेतन को बढ़ाकर ₹69,000 किया जाए। इसके लिए 3.833 का फिटमेंट फैक्टर लागू करने का प्रस्ताव दिया गया है।📈 सालाना इंक्रीमेंट 6%: वेतन वृद्धि की रफ्तार बढ़ाने के लिए मौजूदा 3% के बजाय 6% वार्षिक वेतन वृद्धि की मांग की गई है।🏥 भत्तों (Allowances) में 3 गुना वृद्धि: HRA, CEA और रिस्क अलाउंस जैसे सभी भत्तों में 3 गुना बढ़ोतरी की मांग रखी गई है, जिसे महंगाई भत्ते (DA) के साथ जोड़ा जाएगा।🛡️ पुरानी पेंशन (OPS) की बहाली: NPS और UPS को पूरी तरह वापस लेकर Non-Contributory Pension Scheme (पुरानी पेंशन) को बहाल करने पर कड़ा रुख अपनाया गया है।🎖️ प्रमोशन और ACP: 30 साल की सेवा के दौरान कम से कम 5 प्रमोशन की गारंटी या समयबद्ध पदोन्नति की मांग की गई है।📋 अन्य महत्वपूर्ण प्रस्ताव:रिटायरमेंट पर लाभ: EL (अर्जित अवकाश) के नकदीकरण (Encashment) की सीमा को बढ़ाकर 600 दिन करने का प्रस्ताव।नई छुट्टियां: महिलाओं के लिए मेन्स्ट्रुअल लीव और पुरुषों के लिए पैटर्निटी लीव के साथ-साथ विशेष सर्जरी के लिए भी छुट्टियों की मांग।पेंशनभोगियों के लिए OROP: सिविलियन कर्मचारियों के लिए भी One Rank One Pension की तर्ज पर पेंशन संशोधन की मांग।अनुकंपा नियुक्ति: 5% की सीलिंग (सीमा) को हटाकर इसे 100% करने की मांग।⚖️ आयोग का रुख: बैठक की अध्यक्षता कर रहीं माननीय जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई ने कर्मचारी पक्ष की बातों को ध्यान से सुना और आश्वासन दिया कि आयोग विभिन्न विभागों का दौरा करेगा और जमीनी हकीकत को जानकर ही अपनी सिफारिशें देगा। साथ ही, मेमोरेंडम जमा करने की तारीख को 31 मई 2026 तक बढ़ाने के संकेत भी दिए गए हैं।निष्कर्ष: यह बैठक भविष्य के वेतन ढांचे की नींव है। 45 लाख केंद्रीय कर्मचारी और 69 लाख पेंशनभोगी अब एक बेहतर और सम्मानजनक वेतन वृद्धि की उम्मीद कर रहे हैं। सिख धर्म हिन्दू धर्म का अंग नहीं है!!:- गिआनी दित्त सिंघ गर्व से कहो हम हिन्दू हैं कहने वाले शूद्रों ! Viral रामायण व महाभारत के रचयिता क्रमशः वाल्मीकि और व्यास ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि वे जो कहानियां लिख रहे हैं भविष्य में उनके वंशज उन्हें वास्तविक इतिहास के रूप में स्थापित कर देंगे और शूद्र शिक्षित होकर भी हमारे द्वारा कल्पित पात्रों की पूजा अर्चना करेंगे ।मजे की बात यह है कि वाल्मीकि और व्यास ने कभी खुद को इतिहास कार होने का दावा भी नहीं किया ।मनगढ़ंत कहानियों और इतिहास में फर्क करना शूद्र समाज कब सीखेगा ?परशुराम जैसा पात्र जो सतयुग में अपने फरसे से गणेश का एक दाँत तोड़कर एकदंत बना देता है त्रेता की कहानी रामायण में भी जनक के यहाँ रखी उसके गुरु शंकर की धनुष टूटने पर जनक सहित राम लक्ष्मण और अन्य राजाओं को धमकाता है एवं पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रिय विहीन करने की डींग हाँकता है और उस समय भी वही अपना प्रिय हथियार फरसा लहराता है।कथित द्वापर युग की कहानी महाभारत में भी वही पात्र उसी परशुराम नाम से कौरवों पांडवों के दादा भीष्म और सूर्य पुत्र कर्ण को भी धनुवर्विद्या सिखाता है ।उसी परशुराम को ब्राह्मण भगवान का अवतार बताकर भगवान परशुराम कहते हैं और जयंती भी मनाते हैं ।विचारणीय प्रश्न यह है कि जब भगवान का एक अवतार सतयुग से ही मौजूद था तो त्रेता और द्वापर में क्रमशः राम और कृष्ण के रूप में राक्षसों का वध करने के लिए अवतार लेने की आवश्यकता ही क्या थी ?कहानियों में राम, कृष्ण आदि कथित अवतारों को पैदा होना और इंसान की तरह ही मरना बताया गया है किन्तु परशुराम तीनों युगों में एक योद्धा के रूप में ही जीवित रहता है जबकि एक एक युग को हजारों लाखों साल का बताया गया है ।लोहे का आविष्कार अभी चार हजार साल पहले हुआ तो परशुराम को सतयुग, त्रेता, द्वापर में लोहा कहाँ से मिला फरसा बनवाने को ?इससे यही सिद्ध होता है किरामायण महाभारत सभी ब्राह्मणों द्वारा लिखीकाल्पनिक कहानियां हैं वास्तविक इतिहास नहीं इस अकाट्य सत्य को शूद्र समाज जितनी जल्दी समझ ले और इन गप्प ग्रंथों के मकड़जाल से खुद को मुक्त कर ले उतना ही देश ,समाज और भावी पीढ़ियों के हित में होगा ।शूद्र समाज यानी एससी एसटी ओबीसी वर्ग की संख्या 85% होते हुए भी भारत का शासक नहीं 15% सवर्णों द्वारा शासित वर्ग है उसका मुख्य कारण ही यही है कि शूद्र समाज ब्राह्मणों के विराट प्रचार तंत्र का शिकार होकर ब्राह्मणों द्वारा लिखे झूठे व काल्पनिक इतिहास को धर्म मानकर सीने से चिपकाये हुए है ,और शूद्रों के मान सम्मान और मानवीय अधिकारों के लिए आजीवन संघर्ष करनेवाले अपने समता वादी, मानवतावादी वैज्ञानिक विचारधारा वाले महापुरुषों के त्यागमयी और संघर्ष पूर्ण सच्चे इतिहास से अनभिज्ञ है या यों कहें कि शिक्षा व्यवस्था और अन्य सभी प्रचार माध्यमों पर ब्राह्मणों का कब्जा होने के कारण मानवता वादी महापुरुषों के बारे में शूद्रों को जानने ही नहीं दिया।

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