बागपत के 23 राजकीय माध्यमिक विद्यालयों के मिशन लाइफ ईको क्लबों ने शुरू की मंदिरों को अपनाने की पहल
बागपत, 9 अगस्त 2026। मंदिर की घंटियां बज रही हैं। श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं और इसी बीच हाथों में पौधे लिए स्कूली बच्चों की टोली मंदिर की चौखट पर खड़ी है। किसी के हाथ में ‘भक्ति भी, प्रकृति भी… आस्था भी, जिम्मेदारी भी’ की तख्ती है तो कोई श्रद्धालु से पूजा सामग्री और प्लास्टिक के जिम्मेदार इस्तेमाल की बात कर रहा है। दृश्य छोटा है, लेकिन इसके पीछे शुरू हुई पहल बड़ी है। बागपत में श्री परशुरामेश्वर पुरा महादेव से निकली ‘जिम्मेदार आस्था’ की सोच अब गांव-गांव के मंदिरों तक पहुंच रही है।
पुरा महादेव में विकसित जीरो वेस्ट महोत्सव मॉडल से प्रेरित होकर जिले के 23 राजकीय माध्यमिक विद्यालयों के मिशन लाइफ ईको क्लब अपने आसपास के मंदिरों को अपनाने की पहल शुरू कर चुके हैं। जिलाधिकारी अस्मिता लाल के निर्देशन में चल रही इस विशेष पहल में विद्यार्थियों को मंदिर, समाज और पर्यावरण संरक्षण के बीच ऐसी साझेदारी विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ाया जा रहा है, जिसमें शुरुआत बच्चे करें, लेकिन जिम्मेदारी धीरे-धीरे पूरे गांव की बने।
यानी पुरा महादेव में बड़े धार्मिक आयोजन के बीच सामने आई ‘जिम्मेदार आस्था’ अब नई पीढ़ी के हाथों गांवों के छोटे-बड़े मंदिरों तक पहुंच रही है।
पौधा लेकर पहुंचे बच्चे, पहले समझ रहे मंदिर की जरूरत
ईको क्लब के विद्यार्थी अपने चयनित मंदिरों में पहुंचकर वहां की स्थिति को करीब से समझ रहे हैं। कहां प्लास्टिक अधिक इस्तेमाल होता है, पूजा के फूल और अन्य सामग्री का क्या होता है, कचरा कहां जमा होता है, डस्टबिन और पानी की व्यवस्था कैसी है, हरियाली कितनी है और श्रद्धालुओं तक कौन-सा संदेश प्रभावी ढंग से पहुंच सकता है—इन पहलुओं को देखा जा रहा है।
सस्टेनेबिलिटी वॉक के माध्यम से विद्यार्थी मंदिर को सीखने की जगह के रूप में देख रहे हैं। इसके बाद मंदिर प्रबंधन और स्थानीय लोगों के साथ मिलकर जरूरत के अनुसार स्थानीय एक्शन प्लान तैयार किया जाएगा। उद्देश्य कमियां गिनाना नहीं, बल्कि यह समझना है कि “हमारे मंदिर में सबसे जरूरी बदलाव क्या है और उसे मिलकर कैसे किया जा सकता है।”
जिला विद्यालय निरीक्षक राजीव कुमार यादव ने कहा कि इस पहल का उद्देश्य बच्चों को अपने आसपास की वास्तविक समस्याओं को समझने, लोगों से संवाद करने और समाज के साथ मिलकर समाधान निकालने का अवसर देना है। अपने गांव के मंदिर में पुजारी, मंदिर समिति, ग्राम पंचायत, दुकानदार और श्रद्धालुओं से संवाद करते हुए पर्यावरण संरक्षण बच्चों के लिए केवल पाठ्यक्रम का विषय नहीं रहेगा, बल्कि जीवन और समाज से जुड़ा अनुभव बनेगा।
अभियान के नोडल, समग्र शिक्षा (माध्यमिक) के जिला समन्वयक डॉ. सत्यवीर सिंह ने बताया कि विद्यालयों को अपने-अपने मंदिर की वास्तविक स्थिति के आधार पर काम आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। सभी जगह एक जैसी गतिविधि के बजाय स्थानीय समस्या को प्राथमिकता दी जाएगी। कहीं प्लास्टिक कम करना जरूरी है तो उसके विकल्प तलाशे जाएंगे, कहीं फूल और पूजा सामग्री का प्रबंधन प्राथमिकता बनेगा तो कहीं जल संरक्षण या श्रद्धालुओं तक सही संदेश पहुंचाना। हर ईको क्लब को कम से कम एक स्थानीय, उपयोगी और कम लागत वाला समाधान विकसित करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
इस पहल की अवधारणा तैयार करने में माय भारत स्वयंसेवक एवं सत्यार्थी यूथ नेटवर्क के सदस्य अमन कुमार की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने पुरा महादेव के जीरो वेस्ट महोत्सव से मिली सीख को विद्यालय–मंदिर सहभागिता मॉडल के रूप में आगे बढ़ाने की कार्ययोजना तैयार की और ईको क्लबों के लिए विस्तृत हैंडबुक विकसित की। इसमें मंदिर की पर्यावरणीय स्थिति समझने से लेकर स्थानीय एक्शन प्लान, समुदाय की भागीदारी, ग्रीन एंबेसडर, व्यवहार परिवर्तन की पूरी रूपरेखा शामिल है।
किताब से मंदिर तक पहुंची पढ़ाई
मंदिर की चौखट बच्चों के लिए पर्यावरण की खुली कक्षा भी बन रही है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति की अनुभव आधारित सीख की भावना के अनुरूप विद्यार्थी किताब में पढ़े पर्यावरण संरक्षण को अपने गांव में देखकर और करके समझ रहे हैं। प्लास्टिक कहां से आ रहा है, पूजा सामग्री का क्या होता है, पानी कैसे बचाया जाए और लोगों को बदलाव के लिए कैसे जोड़ा जाए—इन सवालों के जवाब वे खुद तलाश रहे हैं। यानी मंदिर बच्चों की दूसरी कक्षा और गांव उनकी प्रयोगशाला बन रहा है। यहां पर्यावरण के साथ संवाद, नेतृत्व, समस्या समाधान, रचनात्मकता और अपनी स्थानीय विरासत को समझने की सीख भी मिल रही है।
बच्चे ग्रीन एंबेसडर, मंदिर समिति बनेगी भागीदार
ईको क्लब के विद्यार्थी ग्रीन एंबेसडर के रूप में लोगों को जोड़ने की भूमिका निभा रहे हैं। मंदिर के पुजारी, प्रबंधन समिति, ग्राम पंचायत, स्थानीय स्वयंसेवक, दुकानदार और श्रद्धालु प्रतिनिधियों के साथ संवाद कर जिम्मेदारियां तय करने की दिशा में काम किया जाएगा। मकसद यह नहीं कि विद्यार्थी खुद हमेशा व्यवस्था संभालें, बल्कि वे ऐसी साझेदारी बनाएं जिसमें ‘हमारा मंदिर–हमारी जिम्मेदारी’ केवल स्लोगन न रहकर सामुदायिक जिम्मेदारी बने।
अभी अभियान की शुरुआत में पौधारोपण, पर्यावरण संदेश, स्वागत संदेश और श्रद्धालुओं से संवाद दिखाई दे रहा है। आगे इन्हीं अनुभवों के आधार पर स्थानीय समाधान सामने आएंगे। इनमें प्लास्टिक मुक्त विकल्प, कचरा पृथक्करण, फूल एवं पूजा सामग्री का प्रबंधन, कम्पोस्ट, जल संरक्षण, पुनः उपयोग और डिजिटल जागरूकता जैसे प्रयोग शामिल हैं।
किसी मंदिर में फूलों से खाद की पहल होगी तो कहीं कपड़े के थैले या पुनः उपयोग योग्य सामग्री को बढ़ावा मिलेगा। कहीं जल संरक्षण प्राथमिकता बनेगा तो कहीं मंदिर के प्रवेश पर बच्चों का संदेश श्रद्धालुओं को नई सोच देगा।
पहल को केवल कांवड़ या श्रावण मेले तक सीमित नहीं रखा जा रहा है। वर्षभर मंदिरों से जुड़े छोटे-छोटे पर्यावरणीय प्रयासों के लिए ग्रीन कैलेंडर की अवधारणा रखी गई है। सावन, नवरात्र, दीपावली, विशेष पूजा और विश्व पर्यावरण दिवस जैसे अवसरों पर मंदिरों को लगातार पर्यावरणीय गतिविधियों से जोड़ने की दिशा में काम होगा।
अभी तस्वीरें छोटी हैं—कुछ बच्चे, कुछ पौधे, कुछ पोस्टर और कुछ संदेश। लेकिन इन्हीं तस्वीरों में बागपत की बड़ी शुरुआत दिखाई दे रही है। पुरा महादेव से निकली ‘भक्ति भी, प्रकृति भी’ की सोच अब नई पीढ़ी के हाथों गांव-गांव पहुंच रही है।
आज बच्चे मंदिर की चौखट पर खड़े होकर प्रकृति की बात कर रहे हैं। आगे यही बच्चे पुजारी, मंदिर समिति, ग्राम पंचायत, दुकानदार और ग्रामीणों को साथ बैठाकर अपने मंदिर की जरूरत के हिसाब से जिम्मेदारियां तय करते दिखाई देंगे। और इस कहानी का सबसे बड़ा पड़ाव तब होगा, जब कुछ महीने बाद बच्चे अभियान चलाने मंदिर पहुंचें ही नहीं—फिर भी वहां व्यवस्था बनी रहे। मंदिर स्वच्छ हो, पौधे सुरक्षित हों, प्लास्टिक कम हो, पूजा सामग्री का सम्मानजनक प्रबंधन चलता रहे और गांव खुद कहे— “यह स्कूल का अभियान नहीं, हमारे मंदिर और हमारे गांव की जिम्मेदारी है।”
सूचना विभाग, बागपत