कलम बिकेगी नहीं, झुकेगी नहीं… क्योंकि मैं पत्रकार हूँ
लेखक:
चौधरी इकरार तोमर
मुख्य संपादक, THE UDAY TIMES
“खबर नहीं, हकीकत”
कलम की सबसे बड़ी ताकत उसकी स्याही नहीं, उसकी नीयत होती है। जब नीयत सच के साथ खड़ी होती है, तब शब्द केवल पंक्तियाँ नहीं रहते—वे इतिहास बन जाते हैं। और जब कलम सत्ता के डर, धन के लालच या भीड़ के दबाव में झुक जाती है, तब सबसे पहले लोकतंत्र घायल होता है।
मैं पत्रकार हूँ।
इसका अर्थ यह नहीं कि मेरे पास हर सवाल का जवाब है। इसका अर्थ यह भी नहीं कि मैं किसी से बड़ा हूँ। इसका अर्थ केवल इतना है कि मैं उन सवालों को उठाने की जिम्मेदारी निभाता हूँ, जिन्हें उठाने से कई लोग डरते हैं।
आज पत्रकारिता का सबसे बड़ा संकट तकनीक नहीं, विश्वास का संकट है। खबरें पहले भी बनती थीं, आज भी बनती हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले खबर सच खोजती थी, आज कई बार सच को खबर बनने के लिए संघर्ष करना पड़ता है।
हर सुबह हजारों पत्रकार कैमरा और नोटबुक लेकर निकलते हैं। कोई दुर्घटना स्थल पर पहुँचता है, कोई अदालत में, कोई गाँव की टूटी सड़क पर, कोई अस्पताल के बाहर रोते परिवार के बीच। वे केवल घटनाएँ नहीं देखते, वे समाज की धड़कन सुनते हैं। लेकिन शाम तक वही पत्रकार यह सुनता है—”तुम किसके आदमी हो?”
यह प्रश्न ही हमारे समय का सबसे बड़ा संकट है।
अब खबर की सच्चाई से पहले उसकी राजनीतिक पहचान पूछी जाती है। तथ्य बाद में देखे जाते हैं, पक्ष पहले तय कर लिया जाता है। अगर सच किसी के पक्ष में चला जाए तो वाहवाही, और यदि उसी सच से किसी की असुविधा हो जाए तो पत्रकार पर सवाल खड़े कर दिए जाते हैं।
पत्रकार का धर्म किसी सरकार को गिराना नहीं, बल्कि उसे जवाबदेह बनाना है। उसका उद्देश्य किसी विपक्ष को जिताना नहीं, बल्कि उसे भी जनता के प्रति जिम्मेदार बनाए रखना है। लोकतंत्र में पत्रकार का स्थान सत्ता के दरबार में नहीं, जनता के बीच होता है।
दुर्भाग्य यह है कि आज ईमानदार पत्रकार से हर कोई अपनी सुविधा का सच लिखवाना चाहता है। सत्ता चाहती है कि उसकी उपलब्धियाँ ही दिखाई जाएँ। विपक्ष चाहता है कि केवल सरकार की विफलताएँ सामने आएँ। विज्ञापनदाता चाहता है कि व्यापार प्रभावित न हो। सोशल मीडिया चाहता है कि हर खबर सनसनी बने। लेकिन पत्रकार यदि सबकी इच्छाएँ पूरी करने लगे, तो सच का स्थान कहाँ बचेगा?
पत्रकारिता की असली परीक्षा स्टूडियो की रोशनी में नहीं, मैदान की धूल में होती है। वहाँ, जहाँ एक स्थानीय पत्रकार बिना सुरक्षा, बिना बड़े संसाधनों और बिना किसी विशेष सुविधा के जनता की आवाज बनकर खड़ा रहता है। वही पत्रकार कभी धमकियाँ झेलता है, कभी मुकदमे, कभी आर्थिक तंगी और कभी सामाजिक उपेक्षा। फिर भी अगले दिन वह फिर कैमरा उठाता है, क्योंकि उसे विश्वास होता है कि किसी न किसी को सच दर्ज करना ही होगा।
यह केवल एक पेशा नहीं, एक सार्वजनिक दायित्व है।
हाँ, पत्रकार से भी गलती हो सकती है। इसलिए पत्रकारिता में आत्मानुशासन, तथ्य-जाँच और नैतिकता अनिवार्य हैं। लेकिन गलती और दबाव में अंतर होता है। गलती सुधारी जा सकती है, पर दबाव में झुकी हुई पत्रकारिता समाज का बहुत बड़ा नुकसान करती है।
यदि कभी किसी पत्रकार की कलम बिक जाती है, तो नुकसान केवल एक खबर का नहीं होता। नुकसान उस भरोसे का होता है, जिसके आधार पर जनता लोकतंत्र को जीवित रखती है।
इसलिए मैं अपने लिए नहीं, हर उस पत्रकार के लिए लिख रहा हूँ जो सीमित साधनों में भी सच का साथ नहीं छोड़ता। जो रात-दिन मेहनत करता है। जो अपनी सुरक्षा से पहले जनता की सूचना का अधिकार समझता है। जो यह मानता है कि पत्रकारिता का सम्मान पुरस्कारों से नहीं, जनता के विश्वास से मिलता है।
THE UDAY TIMES का संकल्प स्पष्ट है—”खबर नहीं, हकीकत।” यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि हमारी संपादकीय नीति है। हम किसी व्यक्ति, दल या विचारधारा के विरोधी नहीं हैं। हम केवल झूठ, अन्याय, भ्रष्टाचार और जनहित की उपेक्षा के विरोधी हैं। जहाँ अच्छा काम होगा, उसकी सराहना भी होगी। जहाँ प्रश्न उठेंगे, वहाँ सवाल भी पूछे जाएँगे। यही निष्पक्ष पत्रकारिता का आधार है।
मैं जानता हूँ कि सच लिखने का रास्ता आसान नहीं है। इसमें मुकदमे भी हैं, धमकियाँ भी, आर्थिक चुनौतियाँ भी और कई बार अकेलापन भी। लेकिन इतिहास गवाह है कि समय बीत जाने के बाद सत्ता नहीं, सत्य याद रखा जाता है।
इसलिए मेरा संकल्प आज भी वही है—
मेरी कलम बिकेगी नहीं।
मेरी आवाज दबेगी नहीं।
मेरे सवाल रुकेंगे नहीं।
और मेरा विश्वास टूटेगा नहीं।
क्योंकि मैं पत्रकार हूँ।
मैं किसी सिंहासन का प्रहरी नहीं, लोकतंत्र का सजग नागरिक हूँ।
मैं किसी व्यक्ति का प्रवक्ता नहीं, जनता की आवाज हूँ।
और जब तक साँस है, कलम है और सच है—THE UDAY TIMES जनता के साथ खड़ा रहेगा।
क्योंकि खबरें केवल बताई नहीं जातीं—उन्हें जिम्मेदारी, ईमानदारी और साहस के साथ जिया भी जाता है।